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Election Commission of India: बिहार SIR से 5 राज्यों के चुनाव तक ECI में मतभेद

बिहार SIR से शुरू हुआ ECI विवाद अब चुनावी फैसलों तक पहुंच गया है। 10 महीनों में 14 आपत्तियों की रिपोर्ट से आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। ECI Rift: Gyanesh Kumar and Two ECs नई दिल्ली: चुनाव आयोग यानी Election Commission of India के भीतर सब कुछ सामान्य है या पिछले करीब एक साल … Read more

ECI Rift: Gyanesh Kumar and Two ECs

बिहार SIR से शुरू हुआ ECI विवाद अब चुनावी फैसलों तक पहुंच गया है। 10 महीनों में 14 आपत्तियों की रिपोर्ट से आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे।

ECI Rift: Gyanesh Kumar and Two ECs

नई दिल्ली: चुनाव आयोग यानी Election Commission of India के भीतर सब कुछ सामान्य है या पिछले करीब एक साल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच मतभेद बढ़े हैं? यह सवाल इन दिनों इसलिए चर्चा में है क्योंकि एक रिपोर्ट में आयोग के भीतर दर्ज की गई 14 औपचारिक आपत्तियों का ब्योरा सामने आया है।

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द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कई फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की। इनमें बिहार से शुरू हुआ Special Intensive Revision यानी SIR, नए मतदाताओं के लिए Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटा के केंद्रीकरण और कुछ राज्यों में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े फैसले शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने एक दिन में चार बार भी आपत्तियां दर्ज की थीं।

हालांकि, इस पूरी रिपोर्ट के बाद Election Commission ने अपना पक्ष भी रखा है। आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय और टिप्पणियां किसी भी संस्थान में निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक पिछले एक साल में लिए गए महत्वपूर्ण फैसले पूरी आयोग यानी तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

बिहार SIR से शुरू हुआ मामला

बिहार में Special Intensive Revision यानी SIR की प्रक्रिया जून 2025 में शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य मतदाता सूची की समीक्षा करना और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना था। बाद में इसी प्रक्रिया का विस्तार दूसरे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक किया गया।

SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाता रिकॉर्ड की जांच हुई। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया के दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर हुए। इनमें से हर नाम को स्थायी रूप से हटाया गया हो, ऐसा नहीं है। कई मामलों में आपत्ति, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया भी मौजूद रही।

यही प्रक्रिया आगे चलकर Election Commission के भीतर भी चर्चा और आपत्तियों का विषय बनी।

SIR को लेकर क्या था विवाद?

SIR में पुराने मतदाता रिकॉर्ड से मौजूदा मतदाता सूची का मिलान किया गया। ऐसे मामलों में जहां रिकॉर्ड में अंतर या अन्य विसंगति मिली, वहां मतदाताओं से दस्तावेज और जानकारी मांगी गई।

रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के भीतर सवाल इस बात को लेकर उठे कि नए मतदाताओं के पंजीकरण और मौजूदा मतदाताओं के नाम हटाने या बहाल करने की प्रक्रिया किस तरीके से लागू की जा रही है।

यहीं से मामला केवल बिहार तक सीमित नहीं रहा। मतदाता सूची से जुड़े IT सिस्टम, स्थानीय अधिकारियों की भूमिका और केंद्रीय स्तर पर डेटा प्रबंधन जैसे मुद्दे भी सामने आने लगे।

Form 6 में बदलाव पर क्यों हुई आपत्ति?

नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए Form 6 महत्वपूर्ण है। 18 साल की उम्र पूरी करने वाला नागरिक इसी प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, SIR से जुड़े एक नए सवाल को Form 6 में शामिल किया गया। इसमें आवेदक से पूछा गया कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद था या नहीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की। दोनों ने इसे लेकर प्रक्रिया और कानूनी आधार से जुड़े सवाल उठाए।

संधू की आपत्ति में यह भी कहा गया कि नए और युवा मतदाताओं के लिए इस तरह की अतिरिक्त जानकारी मांगने से प्रक्रिया कठिन हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने Form 6 में किए गए बदलाव को हटाने की मांग की थी।

युवाओं के लिए Form 6 क्यों अहम है?

Form 6 सिर्फ एक सरकारी फॉर्म नहीं है। यह पहली बार वोट देने जा रहे नागरिकों के लिए मतदाता बनने का प्रमुख रास्ता है।

मान लीजिए कोई युवा 18 साल की उम्र पूरी करने के बाद पहली बार वोटर बनने के लिए आवेदन करता है। उसके लिए सबसे जरूरी चीज यह है कि आवेदन की प्रक्रिया स्पष्ट हो और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी आसानी से मिल सके।

इसी वजह से Form 6 में किसी भी नए सवाल या घोषणा को लेकर सवाल उठना महत्वपूर्ण माना जाता है। रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियां भी इसी संदर्भ में देखी जा रही हैं।

मतदाता डेटा को लेकर भी सवाल

ECI विवाद का दूसरा बड़ा हिस्सा चुनावी डेटा और IT सिस्टम से जुड़ा बताया गया है।

मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में Electoral Registration Officers यानी EROs की अहम भूमिका होती है। स्थानीय स्तर पर ये अधिकारी मतदाता के दस्तावेज देखते हैं और पात्रता से जुड़े फैसले लेते हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई। सवाल यह था कि क्या राज्य और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की भूमिका और डेटा तक उनकी पहुंच पर्याप्त बनी हुई है।

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी प्रक्रिया में डिजिटल सिस्टम की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अगर किसी स्थानीय अधिकारी के पास किसी मामले पर फैसला लेने की वैधानिक शक्ति है, तो उस फैसले को डिजिटल सिस्टम में दर्ज करने की तकनीकी सुविधा भी जरूरी हो जाती है।

गोवा का 97 मतदाताओं वाला मामला

रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया है, जिसने IT सिस्टम और स्थानीय चुनाव अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 97 मतदाताओं के मामलों में Electoral Registration Officers ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर उन्हें पात्र माना। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय स्तर पर संचालित सॉफ्टवेयर में उन फैसलों को दर्ज करने की सुविधा नहीं थी।

इस तरह का मामला एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या अंतिम फैसला स्थानीय अधिकारी का होगा या डिजिटल सिस्टम में उपलब्ध विकल्प प्रक्रिया को नियंत्रित करेगा?

हालांकि, इस पूरे मामले के कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं को समझने के लिए चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के जवाब भी महत्वपूर्ण हैं।

पश्चिम बंगाल में अपील को लेकर सवाल

पश्चिम बंगाल से जुड़ा मामला भी इस विवाद का हिस्सा बना।

रिपोर्ट के मुताबिक, SIR से जुड़े मामलों में कुछ मतदाताओं को बहाल करने के बाद उनके खिलाफ अपील दायर किए जाने की प्रक्रिया पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया।

उन्होंने कथित तौर पर पूछा कि Election Commission की ओर से ऐसी अपील दाखिल करने के लिए किसे अधिकृत किया गया था और इस फैसले की जानकारी आयोग के अन्य सदस्यों को किस स्तर पर दी गई थी।

यह सवाल सीधे आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया से जुड़ता है। अगर किसी संवैधानिक संस्था के नाम से कोई कानूनी कदम उठाया जाता है तो उसके लिए अधिकार और प्रक्रिया स्पष्ट होना जरूरी होता है।

10 महीनों में 14 आपत्तियां क्यों चर्चा में हैं?

किसी संस्थान में अलग-अलग राय होना असामान्य नहीं है। खासकर Election Commission जैसे संवैधानिक संस्थान में अलग-अलग सदस्यों की राय दर्ज होना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन मौजूदा विवाद इसलिए चर्चा में है क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन आपत्तियों में चार एक ही दिन दर्ज की गई थीं।

इन आपत्तियों से जुड़े प्रमुख मुद्दे थे:

  • नए मतदाताओं के लिए Form 6 में बदलाव
  • मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया
  • SIR से जुड़े फैसले
  • Electoral Roll के IT सिस्टम की निगरानी
  • मतदाता डेटा के केंद्रीकरण का सवाल
  • स्थानीय ERO के फैसलों और सॉफ्टवेयर के बीच तालमेल
  • कुछ मामलों में अपील दाखिल करने की प्रक्रिया

यानी सवाल केवल किसी एक फैसले पर नहीं थे, बल्कि चुनावी प्रक्रिया के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े थे।

5 राज्यों के चुनाव की घोषणा के दौरान क्या हुआ?

2026 में असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा भी आयोग के लिए एक महत्वपूर्ण चरण था।

इस दौरान तीनों चुनाव आयुक्त सार्वजनिक रूप से एक साथ नजर आए। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, जिस अवधि में 14 आपत्तियां दर्ज की गईं, उसी दौरान आयोग ने कई संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग भी कीं। रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग ने पांच संयुक्त ब्रीफिंग कीं और International Conference on Democracy and Election Management भी आयोजित किया।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि कथित आंतरिक मतभेदों के बावजूद आयोग ने सार्वजनिक रूप से एक संयुक्त संस्थान के रूप में काम किया।

यही कारण है कि पूरे मामले को समझते समय लिखित आपत्तियों और सार्वजनिक रूप से आयोग की संयुक्त गतिविधियों—दोनों को देखना जरूरी है।

आयोग ने क्या कहा?

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद Election Commission ने अपना जवाब दिया।

आयोग ने कहा कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां किसी भी संस्थान में सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार हर अधिकारी को चुनावी व्यवस्था में सुधार के लिए सुझाव देने का अधिकार है।

ECI ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में आयोग ने करीब 40 नई पहल और कई चुनावी सुधार किए हैं। उसके मुताबिक इन फैसलों को केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग ने स्पष्ट किया कि पिछले एक साल के महत्वपूर्ण फैसले पूरी आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए।

यानी रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों और आयोग के आधिकारिक जवाब के बीच मुख्य अंतर यही है कि आपत्तियां अलग-अलग मुद्दों पर दर्ज हुईं, लेकिन आयोग का कहना है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए।

19 फरवरी 2025 के बाद क्या बदला?

मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 19 फरवरी 2025 से शुरू हुआ। इससे पहले वह चुनाव आयुक्त के तौर पर आयोग का हिस्सा थे।

मौजूदा रिपोर्टों में उनके कार्यकाल के दौरान आयोग की कार्यप्रणाली में बदलावों को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। इनमें बैठक के एजेंडे, IT सिस्टम, डेटा प्रबंधन और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

हालांकि, इन बदलावों को लेकर जो बातें सामने आई हैं, उनमें से कई सूत्रों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में देखने के बजाय रिपोर्ट किए गए दावों के रूप में समझना जरूरी है।

क्या सच में आयोग के भीतर दूरी बढ़ी?

यह इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है।

रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से लगातार लिखित आपत्तियों की बात सामने आई है। इससे यह जरूर पता चलता है कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके और आयोग के फैसलों के बीच मतभेद थे।

लेकिन दूसरी तरफ, तीनों आयुक्तों ने कई मौकों पर साथ काम किया, संयुक्त ब्रीफिंग की और आयोग ने कहा कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। India Today ने भी अपनी रिपोर्ट में 14 आपत्तियों के साथ छह संयुक्त सार्वजनिक कार्यक्रमों का जिक्र किया है।

इसलिए ‘दूरी’ या ‘आंतरिक टूट’ जैसे निष्कर्षों को लेकर उपलब्ध तथ्यों और रिपोर्ट किए गए दावों के बीच अंतर रखना जरूरी है।

राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बढ़ा विवाद

24 सितंबर को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने SIR और चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपने आरोप दोहराए और CEC के इस्तीफे की मांग की। इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया।

BJP ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि SIR की प्रक्रिया कानूनी है और आयोग के फैसले बहुमत/सहमति की प्रक्रिया के तहत लिए गए।

इस तरह अब मामला सिर्फ आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों तक सीमित नहीं है। यह राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बन गया है।

आगे क्या देखना होगा?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन 14 आपत्तियों पर आयोग के भीतर क्या प्रक्रिया अपनाई गई, अंतिम फैसले कैसे हुए और संबंधित अधिकारियों की भूमिका क्या थी।

SIR जैसी प्रक्रिया सीधे मतदाता सूची से जुड़ी है। इसलिए इसमें नाम जोड़ने, नाम हटाने, नाम बहाल करने और अपील की व्यवस्था का पारदर्शी होना बेहद महत्वपूर्ण है।

इसी तरह, चुनावी व्यवस्था में IT सिस्टम की भूमिका बढ़ने के साथ यह भी जरूरी है कि स्थानीय ERO के वैधानिक अधिकार और केंद्रीय डिजिटल सिस्टम के बीच स्पष्ट तालमेल रहे।

फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों से इतना सामने आता है कि पिछले 10 महीनों में ECI के भीतर कई मुद्दों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज हुईं। लेकिन Election Commission ने इन आपत्तियों को संस्थागत विभाजन का प्रमाण मानने से इनकार किया है और कहा है कि अंतिम महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

आने वाले दिनों में आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड, अदालतों में चल रही कार्यवाही और संबंधित अधिकारियों के जवाब इस विवाद की तस्वीर को और स्पष्ट कर सकते हैं। फिलहाल बिहार SIR से शुरू हुई बहस अब Election Commission की निर्णय प्रक्रिया, मतदाता डेटा और पांच राज्यों के चुनावों तक पहुंच चुकी है।

AK
Author: AK

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