पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की NSA के तहत गिरफ्तारी को उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई 6 अक्तूबर को होगी।
Ladakh Violence: Supreme Court Hearing on Sonam Wangchuk’s NSA Detention
परिचय
लद्दाख में हाल ही में भड़की हिंसा और उसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) की गिरफ्तारी ने देशभर में बहस छेड़ दी है। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने इस गिरफ्तारी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत अवैध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शीर्ष अदालत इस मामले की सुनवाई 6 अक्तूबर को करने वाली है। इस बीच, लद्दाख के लोग और देशभर के नागरिक इस फैसले पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।


सोनम वांगचुक कौन हैं?
पर्यावरण कार्यकर्ता और इंजीनियर
सोनम वांगचुक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक पर्यावरण कार्यकर्ता और नवाचार करने वाले इंजीनियर के रूप में जाना जाता है।
- उन्होंने लद्दाख की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में टिकाऊ विकास और शिक्षा के क्षेत्र में कई प्रयोग किए।
- उनका “आइस स्तूप” प्रोजेक्ट जल संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण माना जाता है।
- उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
समाज और राजनीति से जुड़ाव
वांगचुक लंबे समय से लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग का समर्थन करते रहे हैं। इस वजह से वे जनता के बीच लोकप्रिय और सरकार की नजरों में असहज शख्सियत बन गए हैं।
26 सितंबर को हुई गिरफ्तारी
लद्दाख में हिंसक झड़प
सितंबर के अंतिम हफ्ते में लद्दाख में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।
- इन प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत हो गई और करीब 90 लोग घायल हुए।
- प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग थी कि लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया जाए और इसे छठी अनुसूची में शामिल किया जाए।
NSA के तहत हिरासत
इसी पृष्ठभूमि में 26 सितंबर को सोनम वांगचुक को हिरासत में लिया गया।
- उन पर सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया।
- वर्तमान में वह राजस्थान की जोधपुर जेल में बंद हैं।
- इस कदम की देशभर में आलोचना हो रही है।

गीतांजलि आंगमो की याचिका
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका
2 अक्तूबर को वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
- याचिका में गिरफ्तारी को असंवैधानिक बताया गया।
- उन्होंने तत्काल रिहाई की मांग की।
- आंगमो का कहना है कि अब तक उन्हें हिरासत आदेश की प्रति नहीं दी गई है, जो नियमों का उल्लंघन है।
लगाए गए आरोप
- गीतांजलि ने इस गिरफ्तारी को “सोची-समझी साजिश” करार दिया।
- उनका कहना है कि पुलिस और प्रशासन ने मनमानी करते हुए सोनम को बलि का बकरा बनाया।
- उन्होंने सवाल उठाया कि गोली चलाने का आदेश किसने दिया, जबकि उस समय वांगचुक शांतिपूर्ण भूख हड़ताल पर बैठे थे।
पुलिस और प्रशासन का पक्ष
सुरक्षा का तर्क
लद्दाख पुलिस का कहना है कि वांगचुक की गतिविधियों से कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी।
- प्रशासन ने सुरक्षा को खतरा बताते हुए NSA लागू किया।
- उनका दावा है कि वांगचुक की मौजूदगी से लोगों को भड़काया जा सकता था।
विवाद और आलोचना
हालांकि, विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों का कहना है कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।
- उनका कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए कठोर कानून का इस्तेमाल किया गया है।
- यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
लद्दाख में अचानक क्यों भड़की हिंसा?
अनुच्छेद 370 के बाद का बदलाव
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन हुआ।
- जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
- लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया गया।
बढ़ती मांगें
- लद्दाख के लोगों ने इसे लेकर नाराजगी जताई।
- वे चाहते हैं कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले।
- साथ ही इसे छठी अनुसूची में शामिल किया जाए ताकि उनकी संस्कृति और अधिकारों की रक्षा हो सके।
हालिया आंदोलन
इन्हीं मांगों को लेकर लद्दाख में लगातार प्रदर्शन हो रहे थे।
- सितंबर में हुआ प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया।
- इसी के बाद प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का महत्व
6 अक्तूबर की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल हैं, इस मामले की सुनवाई करेगी।
- यह सुनवाई तय करेगी कि वांगचुक की हिरासत कानूनी है या नहीं।
- अगर कोर्ट हिरासत को अवैध मानता है तो वांगचुक की रिहाई संभव है।
व्यापक असर
- इस केस का असर सिर्फ वांगचुक तक सीमित नहीं रहेगा।
- यह देश में लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शनों की सीमा को भी परिभाषित करेगा।
निष्कर्ष
लद्दाख की हालिया हिंसा और सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार सुरक्षा का हवाला दे रही है, तो दूसरी ओर जनता इसे अधिकारों का हनन बता रही है। अब सबकी निगाहें 6 अक्तूबर को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की असली परीक्षा है।
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Author: AK
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