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बिहार की पार्टी का दक्षिण में दबदबा, कैसे केरल में मिली RJD को सीट

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बिहार की RJD का केरल में विधायक कैसे बना? जानिए समाजवादी राजनीति, विलय और चुनावी रणनीति की पूरी कहानी। How RJD Reached Kerala Politics Explained प्रस्तावना भारतीय राजनीति अक्सर ऐसे दिलचस्प मोड़ लेती है, जो पहली नजर में असंभव लगते हैं। बिहार की क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का केरल जैसे दूरस्थ दक्षिण भारतीय … Read more

How RJD Reached Kerala Politics Explained

बिहार की RJD का केरल में विधायक कैसे बना? जानिए समाजवादी राजनीति, विलय और चुनावी रणनीति की पूरी कहानी।

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How RJD Reached Kerala Politics Explained


प्रस्तावना

भारतीय राजनीति अक्सर ऐसे दिलचस्प मोड़ लेती है, जो पहली नजर में असंभव लगते हैं। बिहार की क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का केरल जैसे दूरस्थ दक्षिण भारतीय राज्य में अस्तित्व होना और वहां विधायक जीतना ऐसी ही एक कहानी है। यह केवल चुनावी सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि दशकों पुराने राजनीतिक संबंधों, विचारधाराओं और गठबंधन की राजनीति का नतीजा है।

जब लोग यह सुनते हैं कि लालू प्रसाद यादव की पार्टी का केरल में विधायक है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ। क्या यह अचानक हुआ या इसके पीछे लंबी राजनीतिक यात्रा छिपी है? इस लेख में हम इसी दिलचस्प कहानी को सरल भाषा में समझेंगे।


RJD और केरल: पहली नजर में असंभव संबंध

भौगोलिक दूरी, राजनीतिक जुड़ाव

बिहार और केरल भले ही देश के दो छोर पर स्थित हैं, लेकिन राजनीतिक विचारधारा और समाजवादी आंदोलन ने इन दोनों राज्यों को जोड़ने का काम किया।

RJD मूल रूप से बिहार की राजनीति में जमीनी पकड़ रखने वाली पार्टी रही है, जबकि केरल में वामपंथी और क्षेत्रीय दलों का दबदबा रहा है। ऐसे में RJD का वहां पहुंचना एक अलग ही कहानी बयां करता है।


समाजवादी आंदोलन से शुरू हुई कहानी

1970 के दशक की राजनीति

इस कहानी की शुरुआत 1970 के दशक से होती है, जब देश में समाजवादी राजनीति का प्रभाव बढ़ रहा था। उसी दौर में केरल के एक प्रमुख नेता एम.पी. वीरेन्द्र कुमार समाजवादी आंदोलन से जुड़े।

वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे, जिसका मजबूत आधार बिहार में था। यही कारण था कि उनका बिहार के नेताओं से गहरा संबंध बना।

इमरजेंसी और संघर्ष

इमरजेंसी के दौरान कई समाजवादी नेताओं की तरह वीरेन्द्र कुमार को भी जेल जाना पड़ा। इस संघर्ष ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और बिहार के नेताओं के साथ उनके रिश्ते और मजबूत हुए।


जनता दल और लालू यादव से नजदीकी

1990 का दशक

जब जनता दल का गठन हुआ, तब वीरेन्द्र कुमार भी इसमें शामिल हुए। 1996 में वे केरल के कोझिकोड से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उस समय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव थे।

यही वह दौर था जब दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंध मजबूत हुए।

केंद्र की राजनीति में भूमिका

वीरेन्द्र कुमार को देवगौड़ा और गुजराल सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला। इस दौरान वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे और बिहार के नेताओं के साथ उनका संपर्क बना रहा।


दलों का विभाजन और नई दिशा

जनता दल का टूटना

समय के साथ जनता दल कई हिस्सों में बंट गया। RJD और JDU जैसे दल इसी प्रक्रिया से निकले।

वीरेन्द्र कुमार ने भी अपनी अलग पार्टी बनाई, जिसे बाद में विभिन्न गठबंधनों में शामिल किया गया।

शरद यादव के साथ सफर

2014 में उन्होंने अपनी पार्टी का विलय JDU में कर लिया, जो शरद यादव के नेतृत्व में थी। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ उन्होंने फिर अलग रास्ता चुना।


लोकतांत्रिक जनता दल और नया मोड़

नई पार्टी का गठन

शरद यादव के अलग होने के बाद लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) का गठन हुआ, जिसमें वीरेन्द्र कुमार भी शामिल थे।

नेतृत्व में बदलाव

2020 में वीरेन्द्र कुमार के निधन के बाद उनके पुत्र एम.वी. श्रेयम्स कुमार ने पार्टी की कमान संभाली।


RJD में विलय और केरल में एंट्री

लालू यादव की रणनीति

शरद यादव के निधन के बाद लालू यादव ने पुराने संबंधों का हवाला देकर LJD को RJD में शामिल होने का प्रस्ताव दिया।

2023 का ऐतिहासिक विलय

अक्टूबर 2023 में एक बड़े कार्यक्रम के दौरान LJD का RJD में विलय हो गया। इस कार्यक्रम में तेजस्वी यादव सहित कई बड़े नेता मौजूद थे।

इस विलय का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि RJD को केरल में सीधे एक विधायक मिल गया।


केरल में RJD का विधायक कैसे बना?

कुथुपरम्बा सीट की कहानी

LJD के विधायक केपी मोहनन कुथुपरम्बा सीट से जीतकर आए थे। जब LJD का विलय RJD में हुआ, तो यह सीट RJD के खाते में आ गई।

2026 चुनाव में प्रदर्शन

2026 के विधानसभा चुनाव में RJD ने केरल में तीन सीटों पर चुनाव लड़ा। इनमें से एक सीट पर जीत हासिल हुई, जिससे पार्टी ने अपनी मौजूदगी बरकरार रखी।


गठबंधन की राजनीति का प्रभाव

केरल में अलग समीकरण

केरल में RJD वामपंथी गठबंधन (LDF) का हिस्सा है, जबकि बिहार में यह कांग्रेस के साथ गठबंधन में रहती है।

यह दिखाता है कि भारतीय राजनीति में राज्य के अनुसार गठबंधन बदलते रहते हैं।

रणनीतिक लचीलापन

RJD का यह कदम बताता है कि पार्टी केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही है।


क्या है इसका राजनीतिक महत्व?

राष्ट्रीय विस्तार की कोशिश

केरल में RJD की मौजूदगी यह संकेत देती है कि पार्टी अपने दायरे को बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

नए अवसर

यह विस्तार पार्टी को भविष्य में और राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका दे सकता है।


उदाहरण से समझें

मान लीजिए कोई कंपनी केवल एक राज्य में काम करती है और फिर वह दूसरे राज्य में अपनी शाखा खोलती है। इससे उसका बाजार बढ़ता है। ठीक उसी तरह RJD का केरल में विस्तार भी एक राजनीतिक विस्तार है।


चुनौतियां भी कम नहीं

स्थानीय राजनीति का दबदबा

केरल में पहले से ही मजबूत क्षेत्रीय और वामपंथी दल मौजूद हैं। ऐसे में RJD के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं होगा।

पहचान की चुनौती

पार्टी को वहां के मतदाताओं के बीच अपनी पहचान मजबूत करनी होगी।


भविष्य की संभावनाएं

नई रणनीति

अगर RJD सही रणनीति अपनाती है, तो वह दक्षिण भारत में भी अपनी पकड़ बना सकती है।

युवा नेतृत्व की भूमिका

तेजस्वी यादव जैसे युवा नेताओं की सक्रियता इस विस्तार में अहम भूमिका निभा सकती है।


निष्कर्ष

बिहार की RJD का केरल तक पहुंचना कोई संयोग नहीं, बल्कि दशकों पुराने राजनीतिक संबंधों, विचारधाराओं और रणनीतिक फैसलों का परिणाम है।

यह कहानी दिखाती है कि भारतीय राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। सही समय पर सही निर्णय लेने से एक क्षेत्रीय पार्टी भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकती है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि RJD इस मौके का कितना फायदा उठाती है और क्या वह दक्षिण भारत में अपनी मजबूत उपस्थिति बना पाती है।

कुल मिलाकर, यह कहानी केवल एक विधायक जीतने की नहीं, बल्कि राजनीति के बदलते स्वरूप और संभावनाओं की है।

AK
Author: AK

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