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Election 2024: अपनी खोई राजनीतिक जमीन तलाशती बसपा

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लोकसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दल तैयारियों में जुटे हुए है, राजनीतिक दलों के कार्यालयों में ताबड़तोड़ बैठके चल रही है नई नई चुनावी रणनीतियां बन रही है, हर राजनीतिक दल इस आम चुनाव में कुछ खास करने की चाहत में जुट गया है..ऐसे में प्रदेश में पिछले कुछ चुनावों में लचर प्रदर्शन कर रही बहुजन समाजवादी पार्टी की सुप्रीमों मायावती ने भी कई बार अपनी टीम को मीटिंग बुलाई और निकाय चुनाव के बाद समीक्षा बैठक भी की

साल दर साल गिरा बसपा का ग्राफ:

बहुजन समाजवादी पार्टी ने आखिर बार साल 2007-2012 में यूपी में अपनी सरकार चलाई थी इसके बाद से यूपी से जुड़े हर चुनाव में मुँह की खानी पड़ी साल 2012 विधानसभा चुनाव में बसपा की सरकार गयी वही 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लहर में सभी राजनीतिक दलों के वोट प्रतिशत में गिरावट देखने को मिली, इसके बाद साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रदेश में बहुमत मिला. इसके बाद साल 2019 का लोकसभा चुनाव, 2017 का निकाय चुनाव, 2022 विधानसभा चुनाव और 2023 निकाय चुनाव में बहुजन समाजवादी पार्टी ने आने इतिहास का सबसे कमजोर प्रदर्शन किया।
कभी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रखने वाली बसपा आज सिर्फ 12.7 फीसदी वोट पर आकर अटक गई है जबकि बहुजन समाजवादी पार्टी का प्रदेश में लगभग 14 प्रतिशत तक का वोट बैंक माना जाता है।

क्या भाजपा की बी टीम है बसपा?

बसपा के इस गिरते हुए ग्राफ ने अगर सबसे ज्यादा किसी को फायदा पहुचाया है तो सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को. साल 2014 के बाद से बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपने वोट प्रतिशत लागातर बढ़ाये रखा वही साल 2017 में बीजेपी ने सालों से चले रहे है सरकार बनाने के सूखे को भी खत्म किया।

उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा ने कई बार मायावती पर बीजेपी की बी टीम होने के आरोप लगाए है. वही बसपा सुप्रीमों ने कई मुद्दों पर केंद्र सरकार का समर्थन भी किया जैसे EWS आरक्षण और नए संसद भवन का उद्घाटन. इसके अलावा विधानसभा चुनाव 2022 से लेकर निकाय चुनाव 2023 में बसपा ने कई सीटों पर ऐसे प्रत्याशी उतारे जिन्होंने सपा का खेल गड़बड़ा दिया. इस निकाय चुनाव में कुल 17 मेयर की सीटों पर बसपा ने 11 मुस्लिम कैंडिडेट उतारे जिसका नतीजा था कि भारतीय जनता पार्टी के सभी 17 उम्मीदवार इस सीट से विजयी हुए।

2019 में एक हुए बुआ- बबुआ

साल 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान एक अजीब संयोग देखने को मिला जब दो धुर विरोधी पार्टी सपा-बसपा ने भाजपा के खिलाफ गठबंधन कर लिया. आखिर गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा का यह निर्णय उसके राजनीतिक मजबूरी को स्पष्ट तौर पर दर्शा रहा था. लेकिन यह गठबंधन ज्यादा दिन तक टिक नही सका और दोनों पार्टियों को साझे में 15 सीटें ही मिली. जहां समाजवादी पार्टी सिर्फ अपने परिवार तक ही सीमित रह गयी वही बसपा के खाते में कुल 10 लोकसभा की सीटें आयी. इस गठबंधन का फायदा सिर्फ बसपा को हुआ जबकि सपा के सिर्फ परिवार के सदस्यों की ही सीटें निकल पाई।

24 के लिए मायावती का जोर: लोकसभा चुनाव 2024 के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने अब जोर लगाना शुरू कर दिया है. राजधानी लखनऊ में वो 3 बार समीक्षा बैठक कर चुकी है वही निकाय चुनाव के बाद पहली समीक्षा बैठक में प्रदेश के 18 मंडल सभी 75 जिलाध्यक्ष और नेशनल कॉर्डिनेटर की मौजूदगी में बसपा सुप्रीमों ने पार्टी को आगे ले जाने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की।

मायावती पिछले कुछ से राजनीति में जमीन पर सक्रिय नही है साल 2022 का विधानसभा चुनाव और 2023 के स्थानीय नगरीय निकाय चुनाव इसका उदाहरण है. एक तरफ विधानसभा चुनाव में उन्होंने गिनी चुनी रैलियां की तो वही इस निकाय चुनाव में उन्होंने कोई भी रैली या जनसम्पर्क नही किया. बसपा सुप्रीमों को अगर अपनी साख बचानी है तो उन्हें जमीन पर उतरना होगा कार्यकर्ताओ से मिलना होगा और छोटे दलों के नेताओं को अपनी तरफ खींचना भी होगा

AK
Author: AK

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