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Mamata Banerjee News: ऋतब्रत खेमे में दरार? ममता के समर्थन में उतरे 3 विधायक

बंगाल की राजनीति में TMC के भीतर खेमेबाजी की चर्चा तेज है। ममता बनर्जी के समर्थन में तीन विधायकों के उतरने से सियासी समीकरण बदलने के संकेत। TMC Rift? 3 MLAs Back Mamata Against Attack पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खेमेबाजी को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हो … Read more

TMC Rift? 3 MLAs Back Mamata Against Attack

बंगाल की राजनीति में TMC के भीतर खेमेबाजी की चर्चा तेज है। ममता बनर्जी के समर्थन में तीन विधायकों के उतरने से सियासी समीकरण बदलने के संकेत।

TMC Rift? 3 MLAs Back Mamata Against Attack


पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खेमेबाजी को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विधानसभा परिसर में सोमवार को दिखाई दी एक तस्वीर ने राजनीतिक हलकों में नई अटकलों को जन्म दे दिया। ममता बनर्जी के काफिले पर हालीशहर में हुए हमले के विरोध में आयोजित प्रदर्शन में ऋतब्रत बनर्जी खेमे से जुड़े तीन विधायक भी ममता बनर्जी के समर्थन में दिखाई दिए।

सवाल उठने लगा कि क्या तृणमूल कांग्रेस के भीतर खेमों की राजनीति बदल रही है? क्या ऋतब्रत बनर्जी के साथ खड़े माने जाने वाले विधायक अब ममता बनर्जी के करीब आ रहे हैं? हालांकि, ऋतब्रत बनर्जी ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा है कि इसे उनके खेमे में दरार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

पूरे घटनाक्रम ने West Bengal Politics में नई बहस जरूर छेड़ दी है।

ममता के समर्थन में प्रदर्शन में पहुंचे तीन विधायक

विधानसभा परिसर में बदला नजर आया सियासी माहौल

ममता बनर्जी के काफिले पर हालीशहर में हुए हमले के विरोध में कालीघाट तृणमूल की ओर से प्रदर्शन आयोजित किया गया। प्रदर्शन में पार्टी के कई प्रमुख नेता और विधायक भाजपा विरोधी पोस्टर लेकर नजर आए।

शोभनदेव चट्टोपाध्याय, कुणाल घोष, अलीफा अहमद और नयना बनर्जी सहित कई नेताओं ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया। इसी दौरान ऋतब्रत बनर्जी के खेमे से जुड़े माने जाने वाले तीन विधायक भी वहां पहुंचे।

इनमें मटियाब्रुज के अब्दुल खालेक मोल्ला, बशीरहाट उत्तर के तौसिफुर रहमान और बारुईपुर पूर्व के विभास सरदार शामिल थे।

तीनों विधायकों की मौजूदगी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी में लंबे समय से अलग-अलग राजनीतिक समूहों के बीच समीकरणों की चर्चा होती रही है।

विधायकों ने साफ किया अपना रुख

प्रदर्शन में शामिल होने के बाद तीनों विधायकों ने ममता बनर्जी को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की।

अब्दुल खालेक मोल्ला ने कहा कि ममता बनर्जी उनकी नेता हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में हैं और आगे भी उसी के साथ बने रहेंगे।

यह बयान अपने आप में पार्टी के अंदर चल रहे राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि किसी विधायक का किसी विशेष खेमे से जुड़ाव होने का मतलब जरूरी नहीं कि वह ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ हो।

वहीं विभास सरदार ने ममता बनर्जी को सर्वमान्य नेता बताया और उनके काफिले पर हुए हमले की निंदा की।

तौसिफुर रहमान ने भी कहा कि उन्हें पहले गलत तरीके से समझाया गया था और अब वह स्पष्ट रूप से ममता बनर्जी को ही अपना नेता मानते हैं।

इन बयानों के बाद TMC Rift को लेकर चल रही चर्चाओं को और हवा मिली।

ऋतब्रत बनर्जी ने खेमे में दरार से किया इनकार

कहा- सभी विधायक अपनी जिम्मेदारी पर फैसले लेते हैं

इन तीन विधायकों के प्रदर्शन में शामिल होने के बाद राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में टूट की शुरुआत हो गई है?

ऋतब्रत बनर्जी ने इस संभावना को खारिज किया।

उन्होंने कहा कि वह विभास सरदार और तौसिफुर रहमान की राजनीतिक स्थिति की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, लेकिन अब्दुल खालेक मोल्ला को उन्होंने अपने खेमे के साथ बताया।

ऋतब्रत का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने इसके साथ अपने समर्थक विधायकों की संख्या को लेकर भी बड़ा दावा किया।

उन्होंने कहा कि उनके साथ अब भी 65 विधायक हैं और यदि फ्लोर टेस्ट कराया गया तो उनका समूह बहुमत साबित कर सकता है।

अगर यह दावा सही साबित होता है तो इससे बंगाल की राजनीति में एक अलग ही तस्वीर सामने आ सकती है। हालांकि, किसी भी संख्या के राजनीतिक रूप से निर्णायक होने के लिए सदन में वास्तविक शक्ति परीक्षण और आधिकारिक आंकड़ों की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।

फ्लोर टेस्ट का दावा क्यों अहम?

बहुमत की संख्या पर राजनीतिक नजर

राज्य की राजनीति में फ्लोर टेस्ट हमेशा बेहद महत्वपूर्ण होता है। यह वह प्रक्रिया है जिसके जरिए विधानसभा में किसी सरकार या राजनीतिक समूह के पास मौजूद वास्तविक बहुमत का परीक्षण किया जाता है।

ऋतब्रत बनर्जी द्वारा फ्लोर टेस्ट की चुनौती दिए जाने के बाद यह मामला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। उनके 65 विधायकों के दावे ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।

हालांकि, केवल किसी नेता के दावे के आधार पर विधानसभा की वास्तविक स्थिति तय नहीं की जा सकती। इसके लिए विधायकों की आधिकारिक स्थिति, पार्टी व्हिप, समर्थन और सदन में होने वाली प्रक्रिया को देखना जरूरी होता है।

फिलहाल इस बयान ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर राजनीतिक शक्ति संतुलन को लेकर खींचतान जारी है।

ममता बनर्जी के काफिले पर हमला बना नया मुद्दा

ममता बनर्जी के काफिले पर हालीशहर में हुए हमले ने इस पूरे राजनीतिक विवाद को नया मोड़ दिया है।

कालीघाट तृणमूल ने इस मामले में न्यायिक जांच की मांग की है। पार्टी नेताओं ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग भी की है।

तृणमूल कांग्रेस के लिए ममता बनर्जी केवल पार्टी की प्रमुख नेता नहीं बल्कि बंगाल की राजनीति में पार्टी की सबसे बड़ी पहचान हैं। इसलिए उनके काफिले पर किसी भी तरह की घटना को पार्टी के भीतर गंभीरता से लिया जाना स्वाभाविक है।

यही वजह है कि ममता के समर्थन में आयोजित प्रदर्शन में पार्टी के विभिन्न समूहों से जुड़े नेताओं और विधायकों की मौजूदगी को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

कुणाल घोष के बयान पर विवाद

प्रदर्शन के दौरान कुणाल घोष ने तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि इस संकट के समय यदि कोई कथित अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाता है तो वही असली गद्दार है।

उनके इस बयान पर ऋतब्रत बनर्जी ने पलटवार किया।

ऋतब्रत ने कहा कि वह किसी फासीवादी बयान पर टिप्पणी नहीं करेंगे।

दोनों नेताओं के बयानों ने यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर राजनीतिक मतभेद केवल बंद कमरे की चर्चा तक सीमित नहीं हैं। अब सार्वजनिक मंचों पर भी अलग-अलग समूहों के नेता एक-दूसरे पर राजनीतिक हमला कर रहे हैं।

यह स्थिति Mamata Banerjee News के साथ-साथ पूरे बंगाल के राजनीतिक विमर्श के लिए महत्वपूर्ण बन गई है।

कालीघाट खेमे की सक्रियता बढ़ी

तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में कालीघाट का नाम ममता बनर्जी के राजनीतिक केंद्र के तौर पर लंबे समय से लिया जाता है।

ममता बनर्जी के समर्थन में आयोजित प्रदर्शन में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी का एक बड़ा वर्ग उनके नेतृत्व के पीछे मजबूती से खड़ा है।

प्रदर्शन में भाजपा विरोधी पोस्टरों का इस्तेमाल भी किया गया। इसका मतलब यह है कि पार्टी के भीतर चल रहे मतभेद के बावजूद भाजपा विरोध का मुद्दा अभी भी तृणमूल की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

तीन विधायकों की मौजूदगी ने इस पूरे राजनीतिक संदेश को और महत्वपूर्ण बना दिया।

हाजरा प्रदर्शन में पुलिस कार्रवाई

ममता बनर्जी के समर्थन में चल रहे विरोध प्रदर्शन का असर केवल विधानसभा परिसर तक सीमित नहीं रहा।

हाजरा में भी प्रदर्शन किया गया, जहां पुलिस ने कुछ नेताओं को हिरासत में लिया।

इस कार्रवाई के बाद राजनीतिक विवाद और बढ़ सकता है। विपक्ष या प्रदर्शनकारी समूह पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठा सकते हैं, जबकि प्रशासन कानून-व्यवस्था के आधार पर अपना पक्ष रख सकता है।

ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से हो और प्रशासन भी कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करे।

क्या TMC में सचमुच टूट की स्थिति है?

अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन तीन विधायकों का ममता बनर्जी के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल होना तृणमूल कांग्रेस के भीतर किसी बड़े बदलाव का संकेत है?

इसका सीधा जवाब अभी देना जल्दबाजी होगा।

किसी राजनीतिक खेमे में दरार साबित करने के लिए केवल एक प्रदर्शन में नेताओं की मौजूदगी पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए लगातार राजनीतिक बयान, सदन में मतदान का व्यवहार, पार्टी बैठकों में उपस्थिति और नेतृत्व के साथ संबंध जैसे कई संकेतकों को देखना पड़ता है।

अब्दुल खालेक मोल्ला ने खुद कहा है कि वह ऋतब्रत खेमे में हैं और वहीं रहेंगे। ऐसे में उनकी ममता के समर्थन में मौजूदगी को पार्टी नेतृत्व के प्रति समर्थन और खेमे के प्रति राजनीतिक निष्ठा के बीच संतुलन के रूप में भी देखा जा सकता है।

तौसिफुर रहमान और विभास सरदार के बयान जरूर राजनीतिक समीकरणों में संभावित बदलाव की ओर संकेत करते हैं, लेकिन इसे किसी बड़े बदलाव का प्रमाण मानना अभी जल्दबाजी होगी।

बंगाल की राजनीति में इसका क्या असर हो सकता है?

यदि तृणमूल कांग्रेस के भीतर अलग-अलग समूहों के नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व के मुद्दे पर एकजुट होते हैं, तो पार्टी नेतृत्व के लिए यह सकारात्मक संकेत हो सकता है।

वहीं यदि खेमेबाजी बढ़ती है और विधायकों के बीच संख्या बल को लेकर खुली चुनौती शुरू होती है, तो इससे पार्टी के भीतर तनाव बढ़ सकता है।

West Bengal Politics में विधानसभा की संख्या और विधायकों का समर्थन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का सीधा असर सरकार की स्थिरता पर पड़ सकता है।

ऋतब्रत बनर्जी का 65 विधायकों का दावा इसी वजह से राजनीतिक चर्चा में है। लेकिन इस दावे की वास्तविक स्थिति तभी स्पष्ट होगी जब सदन में औपचारिक तौर पर शक्ति परीक्षण की स्थिति बने।

ममता बनर्जी के लिए संदेश क्या है?

पूरे घटनाक्रम में ममता बनर्जी के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्टी के विभिन्न समूहों से जुड़े विधायक सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना नेता बता रहे हैं।

यह पार्टी नेतृत्व के लिए एक तरह का राजनीतिक समर्थन है।

हालांकि, दूसरी तरफ खेमेबाजी की खबरें बताती हैं कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर सत्ता और प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा मौजूद है।

ममता बनर्जी के सामने चुनौती यह होगी कि पार्टी के अलग-अलग समूहों को एक साथ रखा जाए और आंतरिक मतभेदों को संगठनात्मक संकट में बदलने से रोका जाए।

आगे की राजनीति पर रहेगी नजर

आने वाले दिनों में इस पूरे घटनाक्रम पर सबकी नजर रहेगी। खासकर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रदर्शन में शामिल हुए तीनों विधायक आगे किस तरह की राजनीतिक भूमिका निभाते हैं।

क्या वे लगातार ममता बनर्जी के समर्थन में दिखाई देंगे? क्या ऋतब्रत बनर्जी का खेमा उन्हें अपने साथ बनाए रख पाएगा? और क्या 65 विधायकों के समर्थन का दावा किसी औपचारिक राजनीतिक प्रक्रिया में सामने आता है?

इन सवालों के जवाब आने वाले समय में बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।

निष्कर्ष

तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खेमेबाजी के बीच ममता बनर्जी के समर्थन में तीन विधायकों की सार्वजनिक मौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को जरूर तेज कर दिया है। हालांकि ऋतब्रत बनर्जी ने खेमे में किसी दरार से इनकार किया है और अपने समर्थकों की संख्या को लेकर बड़ा दावा किया है।

ममता बनर्जी के काफिले पर हमले के विरोध में प्रदर्शन ने पार्टी के भीतर अलग-अलग राजनीतिक समूहों को एक मंच पर ला दिया। इससे यह भी सामने आया कि आंतरिक मतभेदों के बावजूद ममता का नेतृत्व कई नेताओं के लिए अब भी केंद्रीय मुद्दा है।

फिलहाल इसे TMC Rift की शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी समीकरणों पर नजर रखने वालों के लिए यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है।

AK
Author: AK

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