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कवयित्री मानसी सिंह की रचना ने भावुक किया पाठकों को, शब्दों में छलका यथार्थ का स्याह सच

कवयित्री मानसी सिंह की रचना ने भावुक किया पाठकों को, शब्दों में छलका यथार्थ का स्याह सच
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जहानाबाद (बिहार): मगध विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की स्नातकोत्तर छात्रा एवं ‘शब्दाक्षर प्रदेश साहित्य मंत्री’ कवयित्री मानसी सिंह की नवीनतम कविता “कभी-कभी” ने साहित्यप्रेमियों के हृदय को गहराई से छू लिया है। सोशल मीडिया और साहित्यिक मंचों पर यह रचना तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

इस कविता में कवयित्री ने अपनेपन के दिखावे, विश्वास के टूटने, और जीवन के कठोर यथार्थ को बड़ी ही सहज, लेकिन गहरी भाषा में अभिव्यक्त किया है। कविता की पंक्तियाँ –
“कभी-कभी बुरे वक्त का आना बहुत जरूरी है,
कभी-कभी अपनों को आजमाना बहुत जरूरी है…”

ने पाठकों को आत्मचिंतन पर विवश कर दिया।

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मानसी सिंह की रचना न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में आत्मनिरीक्षण और आत्मबल की आवश्यकता को भी दर्शाती है। उन्होंने कविता में दर्शाया कि तन्हाई की पीड़ा, झूठे अपनेपन की तुलना में कहीं अधिक सुकूनदायक होती है।

कविता का अंतिम भाग –
“जब प्रेम प्रकृति; नेह का बंधन कोई साथ नहीं जाता
ऐसे में सपोलों का क्या पालना बहुत जरूरी है…!!”
एक प्रहार है उन रिश्तों पर, जो केवल दिखावे के लिए होते हैं।

कभी-कभी

कभी-कभी बुरे वक्त का आना बहुत जरूरी है
कभी-कभी अपनों को आजमाना बहुत जरूरी है।
वैसे तो अपनों पर विश्वास बहुत जरूरी है,
पर कभी-कभी आंखें खोलकर देख लेना बहुत जरूरी है।
क्योंकि कभी-कभी अपनों के भी आप से खास होते हैं,
वैसे में अंतर्मन को समझाना बहुत जरूरी है।

यूं तो बहुत जरूरी है प्रकृति में बदलाव मगर,
पर इन जैसों अपनों को छंट जाना बहुत जरूरी है।
यूं तो तन्हाई आपको तोड़ देता है बहुत अकेले में,
पर इन जैसों के साथ से तो भली कहीं तन्हाई है।

ऊपर-ऊपर हरा भरा; भीतर खालीपन लगता हो,
तब जेहन से अपनों का मिट जाना बहुत जरूरी है।
अपना वो; जो अपना साया की भांति डटा रहे,
बादलों की भांति दोस्तों का ‘ना’ होना बहुत जरूरी है।

वो पेंडुलम घड़ियां दीवारों पर खूब फबती हैं,
इंसानों का आईना सा मन हीं सबका मन लुभाती है।
अपनेपन का ढोंग करे और साथ खड़ा हो गैरों के,
उन जैसों का अपने दिल में जगह गैर जरूरी है।

सावधानी गैरों से तो सदियों से बरती जाती है,
पर अब अपनों पर समयानुसार संदेह बहुत जरूरी है।
जब सांसे भी हैं मोहताज; फिर किसी पर ऐतबार!
इस ऐतबारी अटूट विश्वास का टूटना बहुत जरूरी है।

अग्नि जल पावक गगन समीर जब सारे    छूट जाते हैं,
और अपना मां-बाप; भाई-बंधु जब  यहीं रह जाते हैं,
जब प्रेम प्रकृति; नेह का बंधन कोई साथ नहीं जाता,
ऐसे में सपोलों का क्या पालना बहुत जरूरी है…!!?
          

कविता को मिल रही सराहना
साहित्यिक मंचों पर इस रचना को युवाओं, विद्यार्थियों और कवि समुदाय से विशेष सराहना मिल रही है। कई पाठकों ने इसे “आत्मचेतना की आवाज़” बताया है। यह कविता वर्तमान सामाजिक संदर्भ में रिश्तों की असलियत और आत्मबल की महत्ता को गहराई से रेखांकित करती है।

कवयित्री मानसी सिंह, जिन्होंने यह रचना साझा की है, न केवल साहित्य में सक्रिय हैं, बल्कि समकालीन विषयों पर अपनी पैनी दृष्टि और भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए भी जानी जाती हैं।

AK
Author: AK

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