
न्यायपालिका भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया भर में निष्पक्षता के रूप में पहचानी जाती है। जब आम नागरिक हर जगह से हार जाता है तब न्यायपालिका ही उसकी आखिरी उम्मीद रह जाती है। भारत में अदालत के तीन प्रकार की होती हैं। पहली निचली अदालत, जिन्हें जिला कोर्ट बोला जाता है दूसरा हाईकोर्ट और तीसरे नंबर पर सुप्रीम कोर्ट। तीनों ही अदालत में छोटे-बड़े सभी केस में जज फैसला सुनाते हैं। बहुत कम ऐसे मौके होते हैं जब जज ही विवादों में आ जाए। कुछ दिनों से इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर यादव अपने बयान के बाद देशभर में चर्चा में आ गए हैं।
जज शेखर यादव के बयान पर राजनीति भी गर्माई हुई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस दिया गया है। जिसमें कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, विवेक तन्खा सहित 55 विपक्षी दलों के सांसदों के हस्ताक्षर है। आरोप है कि जस्टिस शेखर ने संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का उल्लंघन किया है। महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में 100, जबकि राज्यसभा में 50 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
जस्टिस शेखर यादव 8 दिसंबर को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम शामिल हुए थे। उन्होंने कहा था, मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यह हिंदुस्तान है और यह देश यहां रहने वाले बहुसंख्यकों की इच्छा से चलेगा। यह जो कठमुल्ला है, यह सही शब्द नहीं है, लेकिन कहने में परहेज नहीं है, क्योंकि वह देश के लिए बुरा है, घातक है। देश के खिलाफ है। नोटिस में कहा गया है कि न्यायाधीश की सार्वजनिक टिप्पणियां भड़काऊ व पूर्वाग्रह से ग्रसित है।
इस दौरान उन्होंने अल्पसंख्यकों पर सीधा निशाना साधा है और कहा कि न्यायाधीश यादव ने अपने व्याख्यान में जोर देकर यह कहा था कि देश बहुसंख्यकों की इच्छा के अनुसार काम करेगा। नोटिस में कहा गया है, हम माननीय सभापति से अनुरोध करते हैं कि वह इस प्रस्ताव को स्वीकार करें और इसे न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार भारत के माननीय राष्ट्रपति को भेजें और नफरत फैलाने वाले भाषण, सांप्रदायिक वैमनस्य और न्यायिक नैतिकता के उल्लंघन के आरोपों की जांच के लिए एक जांच समिति का गठन करें। विपक्षी सांसदों ने यह भी मांग की कि यदि आरोप साबित हो जाएं तो सभापति न्यायमूर्ति यादव को पद से हटाने के लिए उचित कार्यवाही शुरू करें।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को न्यायमूर्ति यादव के कथित विवादास्पद बयानों पर समाचार रिपोर्टों का संज्ञान लिया। कोर्ट ने इस मुद्दे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जानकारी मांगी।इससे पहले 2011 में कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। राज्यसभा में इस पर चर्चा भी हुई थी और वे अपनी सफाई देने के लिए पेश भी हुए थे लेकिन प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व ही उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दिया था।
अब तक चार जजों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव आया है। तीन अन्य में 1993 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था लेकिन वह पारित नहीं हो पाया था। 2015 में गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस जेबी पादरीवाला के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस राज्यसभा में दिया गया था, लेकिन पादरीवाला ने अपने फैसले से आपत्तिजनक टिप्पणी को हटा दिया था। सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस पीडी दिनाकरण के खिलाफ भी 2011 में महाभियोग लाने का नोटिस राज्यसभा में दिया गया था, लेकिन इससे पहले ही उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
Author: AK
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