मणिपुर के इंफाल में हजारों लोगों ने रैली निकालकर SoO समझौता खत्म करने, विस्थापितों की सुरक्षित वापसी और मूल निवासियों की सुरक्षा की मांग उठाई।
Manipur Protests: Thousands Demand Peace and Security

मणिपुर में फिर सड़कों पर उतरे हजारों लोग, आखिर क्या हैं इनकी मांगें?
मणिपुर में शांति बहाली की उम्मीदों के बीच एक बार फिर विरोध प्रदर्शनों ने जोर पकड़ लिया है। राज्य की राजधानी इंफाल में हजारों लोग सड़कों पर उतरे और अपनी सुरक्षा, विस्थापित परिवारों की वापसी तथा उग्रवादी संगठनों के साथ हुए समझौते को समाप्त करने की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक राज्य में हिंसा प्रभावित लोगों को सुरक्षा और न्याय नहीं मिलता, तब तक सामान्य जीवन बहाल करना मुश्किल होगा। मणिपुर इंटीग्रिटी पर समन्वय समिति (COCOMI) की ओर से आयोजित इस रैली में अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों ने हिस्सा लिया। इस प्रदर्शन में पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों से जुड़े संगठनों की भागीदारी भी चर्चा का विषय रही।
मणिपुर में मई 2023 से जारी जातीय संघर्ष ने राज्य की सामाजिक व्यवस्था, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया है। हजारों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं। कई इलाकों में लोगों की आवाजाही सीमित हुई है और समुदायों के बीच विश्वास की कमी बनी हुई है। ऐसे में इंफाल में हुई ताजा रैली को राज्य में जारी असंतोष और शांति प्रक्रिया से जुड़ी मांगों के रूप में देखा जा रहा है।
इंफाल में क्यों निकाली गई बड़ी रैली?
रविवार को इंफाल में आयोजित रैली का मुख्य उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान मणिपुर की सुरक्षा स्थिति और विस्थापित लोगों की समस्याओं की ओर आकर्षित करना था। इस रैली का आयोजन COCOMI ने किया। प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर मार्च करते हुए कई मांगें उठाईं।
इनमें सबसे प्रमुख मांग कुकी-जो उग्रवादी संगठनों के साथ हुए सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस यानी SoO समझौते को समाप्त करने की थी। इसके अलावा लोगों ने हिंसा के कारण अपने घरों से विस्थापित हुए परिवारों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने की मांग भी की।
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने राज्य की मूल आबादी की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया। उनका कहना था कि लंबे समय से जारी तनाव के कारण आम नागरिकों का जीवन प्रभावित हुआ है और सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
#WATCH | Manipur | People in large numbers participated in the rally organised by the Coordinating Committee on Manipur Integrity (COCOMI) in Imphal
— ANI (@ANI) October 31, 2026
Representatives from different communities, including people from both the hills and the valley, marched and raised slogans… pic.twitter.com/XdjEvnOl7L
COCOMI की क्या है भूमिका?
COCOMI यानी Coordinating Committee on Manipur Integrity मणिपुर का एक नागरिक संगठन है। यह संगठन राज्य की क्षेत्रीय अखंडता, सुरक्षा और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखता रहा है।
मणिपुर में जारी जातीय संघर्ष के दौरान COCOMI ने कई बार अपनी चिंताएं सार्वजनिक की हैं। संगठन का कहना है कि राज्य की सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के लिए उग्रवादी गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।
हालांकि, मणिपुर के विभिन्न समुदायों और संगठनों के बीच सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक समाधान और शांति प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद हैं। इसलिए राज्य में स्थायी शांति के लिए सभी पक्षों के बीच बातचीत और भरोसा कायम करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चंदेल और सेनापति में भी हुआ विरोध प्रदर्शन
इंफाल के अलावा मणिपुर के अन्य जिलों में भी रैलियां और मार्च आयोजित किए गए। चंदेल और सेनापति जैसे जिलों में नागरिक संगठनों और नगा समुदाय से जुड़े संगठनों ने प्रदर्शनकारियों की मांगों का समर्थन किया।
इन संगठनों ने भी SoO समझौते को समाप्त करने की मांग उठाई। उनका आरोप है कि कुकी-जो सशस्त्र समूहों से जुड़ी गतिविधियों के कारण क्षेत्र में सुरक्षा की स्थिति प्रभावित हुई है। हालांकि, किसी भी समुदाय को सामूहिक रूप से हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। इस संघर्ष में अलग-अलग पक्षों की शिकायतों और आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
रैली में पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों के लोगों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मणिपुर में लंबे समय से समुदायों के बीच दूरी बनी हुई है। ऐसे में अलग-अलग नागरिक संगठनों का एक मंच पर आना राज्य की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने के लिहाज से अहम है।
क्या है Suspension of Operations यानी SoO समझौता?
मणिपुर में जारी विवाद को समझने के लिए SoO समझौते की पृष्ठभूमि जानना जरूरी है।
SoO का पूरा नाम Suspension of Operations है। यह केंद्र सरकार, मणिपुर सरकार और कुछ कुकी-जो सशस्त्र संगठनों के बीच संघर्षविराम से जुड़ी व्यवस्था रही है। इसका उद्देश्य सशस्त्र गतिविधियों को रोकना और बातचीत के जरिए राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना था।
इस व्यवस्था के तहत संबंधित संगठनों के सदस्यों की गतिविधियों और निर्धारित शिविरों को लेकर कुछ नियम बनाए गए थे। समझौते का मकसद हिंसा कम करना और बातचीत के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना था।
SoO समझौते को लेकर विवाद क्यों है?
मणिपुर के कुछ नागरिक संगठनों का आरोप है कि इस समझौते के बावजूद हिंसा और सशस्त्र गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया। उनका कहना है कि यदि समझौते के नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार संगठनों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
दूसरी ओर, शांति प्रक्रिया के समर्थकों के लिए संघर्षविराम जैसी व्यवस्था बातचीत का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकती है। इसे समाप्त करने से राजनीतिक संवाद और सुरक्षा व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, यह भी विचार का विषय है।
रैली में प्रदर्शनकारियों ने SoO समझौते को आगे नहीं बढ़ाने, निर्धारित शिविरों को बंद करने और समझौते के तहत रखे गए हथियारों का हिसाब सुनिश्चित करने की मांग उठाई।
मणिपुर में 2023 से जारी जातीय संघर्ष कितना गंभीर?
मणिपुर में जातीय हिंसा की शुरुआत 3 मई 2023 को हुई थी। उस समय पहाड़ी जिलों में आयोजित एक जनजातीय एकजुटता मार्च के बाद मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच तनाव हिंसक संघर्ष में बदल गया।
मैतेई समुदाय मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहता है, जबकि कुकी-जो सहित कई जनजातीय समुदायों की आबादी पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक है। भूमि, आरक्षण, प्रशासनिक अधिकार और पहचान से जुड़े मुद्दों ने इस विवाद को और जटिल बनाया।
हिंसा के दौरान घरों, दुकानों और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचा। कई स्थानों पर आगजनी और हमलों की घटनाएं हुईं। हजारों परिवारों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में रहना पड़ा।
306 लोगों की मौत, हजारों परिवार विस्थापित
मई 2023 से शुरू हुए जातीय संघर्ष में अब तक कम से कम 306 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा कई लोग लापता हैं और बड़ी संख्या में परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं।
इस हिंसा का असर केवल जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका, शिक्षा और सामाजिक जीवन भी प्रभावित हुआ है। कई बच्चे लंबे समय तक स्कूल नहीं जा सके, जबकि छोटे कारोबार और स्थानीय रोजगार के साधन भी प्रभावित हुए हैं।
राज्य में राहत शिविरों में रहने वाले परिवारों के सामने भोजन, स्वास्थ्य सुविधाओं, रोजगार और स्थायी आवास जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।
नगा और कुकी-जो समुदायों के बीच भी बढ़ा तनाव
मणिपुर की मौजूदा स्थिति केवल मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच पुराने संघर्ष तक सीमित नहीं रह गई है। वर्ष 2026 में नगा और कुकी-जो समुदायों के बीच भी कई हिंसक घटनाएं सामने आई हैं।
फरवरी 2026 से पहाड़ी क्षेत्रों में दोनों समुदायों के बीच तनाव और झड़पों की खबरें आती रही हैं। इन घटनाओं ने राज्य की सुरक्षा चुनौतियों को और बढ़ा दिया है।
इस नए तनाव ने शांति बहाली की प्रक्रिया को और कठिन बना दिया है। अब सरकार के सामने चुनौती केवल पुराने संघर्ष को समाप्त करने की नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच बढ़ रहे नए विवादों को रोकने की भी है।
14 मैतेई युवकों पर हमले के बाद फिर भड़का गुस्सा
मणिपुर में ताजा विरोध प्रदर्शनों के पीछे हाल की एक हिंसक घटना भी बड़ी वजह बताई जा रही है। खबरों के मुताबिक, उग्रवादियों ने कथित तौर पर 14 मैतेई पुरुषों पर घात लगाकर हमला किया था। इस घटना में तीन लोगों की मौत हो गई।
इस हमले के बाद राज्य के कई हिस्सों में नाराजगी देखने को मिली। स्थानीय संगठनों और नागरिक समूहों ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए और सरकार से दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
इस घटना ने पहले से तनावपूर्ण माहौल को और संवेदनशील बना दिया। लोगों में यह चिंता बढ़ी है कि यदि समय रहते सुरक्षा के प्रभावी इंतजाम नहीं किए गए, तो हिंसा की नई घटनाएं सामने आ सकती हैं।
इसी पृष्ठभूमि में COCOMI और अन्य संगठनों ने रैली आयोजित कर सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं।
विस्थापित परिवारों की घर वापसी सबसे बड़ी चुनौती
मणिपुर संकट का सबसे गंभीर मानवीय पहलू हजारों विस्थापित परिवारों की स्थिति है। जिन लोगों को हिंसा के कारण अपने घर छोड़ने पड़े, उनके सामने आज भी कई तरह की समस्याएं हैं।
राहत शिविरों में रहने वाले परिवारों को आवास, भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। कई परिवार ऐसे हैं जिनकी आजीविका का साधन उनके गांव और स्थानीय बाजार थे।
घर वापसी के लिए क्या कदम जरूरी हैं?
विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी के लिए सिर्फ घरों का पुनर्निर्माण करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए कई स्तरों पर काम करना जरूरी है।
- प्रभावित क्षेत्रों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए।
- जिन परिवारों के घर नष्ट हुए हैं, उन्हें पुनर्वास सहायता मिलनी चाहिए।
- विस्थापित लोगों की संपत्ति और जमीन से जुड़े विवादों का समाधान होना चाहिए।
- बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सामान्य बनाया जाना चाहिए।
- लोगों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर फिर से तैयार करने होंगे।
- अलग-अलग समुदायों के बीच विश्वास बहाल करने के प्रयास होने चाहिए।
प्रदर्शनकारियों की सुरक्षित वापसी की मांग इसी व्यापक समस्या से जुड़ी है। जब तक लोग अपने घरों में बिना डर के रहने की स्थिति में नहीं पहुंचते, तब तक सामान्य स्थिति बहाल होने का दावा अधूरा रहेगा।
सरकार के सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
मणिपुर की मौजूदा स्थिति सरकार के लिए कई स्तरों पर चुनौती पेश कर रही है। सबसे पहले राज्य में कानून-व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। इसके साथ ही सभी समुदायों को सुरक्षा का भरोसा दिलाना भी महत्वपूर्ण है।
दूसरी बड़ी चुनौती राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने की है। अलग-अलग समुदायों की मांगों और शिकायतों को समझे बिना किसी स्थायी समाधान तक पहुंचना मुश्किल होगा।
तीसरी चुनौती विस्थापित लोगों का पुनर्वास है। राहत शिविरों में लंबे समय तक रहने से लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति कमजोर होती है। इसलिए पुनर्वास की प्रक्रिया को समयबद्ध और प्रभावी बनाना जरूरी है।
इसके अलावा SoO समझौते का भविष्य भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। सरकार को इस व्यवस्था के नियमों के पालन, हथियारों की निगरानी और संबंधित संगठनों की जवाबदेही पर स्पष्ट रुख अपनाना होगा।
मणिपुर में शांति बहाली के लिए आगे क्या जरूरी?
मणिपुर में लंबे समय से जारी हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सुरक्षा बलों की तैनाती से स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती। सुरक्षा व्यवस्था के साथ राजनीतिक बातचीत, न्याय और सामाजिक विश्वास की बहाली भी जरूरी है।
राज्य के सभी समुदायों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी जान-माल, पहचान और अधिकार सुरक्षित हैं। हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसके साथ ही नागरिक संगठनों, महिला समूहों, युवाओं और स्थानीय प्रतिनिधियों को शांति प्रक्रिया में शामिल करना उपयोगी हो सकता है। स्थानीय स्तर पर संवाद के मंच तैयार करने से गलतफहमियां कम करने में मदद मिल सकती है।
मणिपुर में अलग-अलग समुदायों की अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चिंताएं हैं। इन सभी को समझना और बातचीत के जरिए समाधान तलाशना जरूरी है।
निष्कर्ष: क्या मणिपुर में लौट पाएगी स्थायी शांति?
इंफाल में हजारों लोगों की रैली ने एक बार फिर मणिपुर के संकट को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। प्रदर्शनकारियों ने SoO समझौता समाप्त करने, विस्थापित परिवारों की सुरक्षित वापसी और स्थानीय आबादी की सुरक्षा जैसी मांगें उठाई हैं।
चंदेल, सेनापति और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में हुए प्रदर्शनों से भी पता चलता है कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में असंतोष बना हुआ है।
हालांकि, मणिपुर की समस्या का समाधान किसी एक समुदाय या संगठन की मांगों तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए सभी प्रभावित समुदायों की भागीदारी, निष्पक्ष प्रशासन और जवाबदेही जरूरी है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि आम नागरिकों को दोबारा हिंसा का सामना न करना पड़े और विस्थापित परिवार सम्मान के साथ अपने घर लौट सकें।
मणिपुर में शांति केवल सड़कों पर सामान्य आवाजाही शुरू होने से नहीं आएगी। असली शांति तब होगी, जब अलग-अलग समुदायों के लोग बिना डर के एक-दूसरे के साथ रह सकें, बच्चों की पढ़ाई सामान्य हो और परिवारों को अपना भविष्य सुरक्षित नजर आए।
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Author: AK
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