शशि थरूर फिर पीएम मोदी के करीब दिखे। ऑपरेशन सिंदूर के बाद विदेश यात्रा और मुलाकातों से बदले राजनीतिक समीकरण चर्चा में।
Is Shashi Tharoor Getting Closer to BJP? Seen Again with PM Modi
शशि थरूर और पीएम मोदी की नज़दीकियां: क्या बदल रहा है राजनीतिक समीकरण?
भारतीय राजनीति में अक्सर कुछ घटनाएं अचानक ध्यान खींच लेती हैं। ऐसा ही एक मामला हाल ही में देखने को मिला, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के और करीब नज़र आए। इनकी यह नज़दीकी न केवल मीडिया में चर्चा का विषय बनी, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भीतर भी असहजता पैदा कर गई।
देश की विदेश नीति, आतंकवाद पर भारत का रुख और ऑपरेशन सिंदूर जैसे मुद्दों पर शशि थरूर का बदला हुआ रुख अब भाजपा के नेताओं को भी पसंद आने लगा है। इस लेख में हम इसी घटनाक्रम का विश्लेषण करेंगे।
ऑपरेशन सिंदूर और बदले राजनीतिक संकेत
ऑपरेशन सिंदूर क्या था?
22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद, केंद्र सरकार ने पाकिस्तान की धरती पर मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाकर एक सख्त सैन्य कार्रवाई की। इस कार्रवाई को ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया गया। सरकार ने इसे आतंकवाद के खिलाफ भारत की निर्णायक नीति का हिस्सा बताया।
थरूर के बयान से भाजपा खुश क्यों?
ऑपरेशन सिंदूर के बाद शशि थरूर ने सार्वजनिक रूप से इस कार्रवाई की तारीफ की और आतंकवाद पर भारत के सख्त रुख का समर्थन किया। उनके बयान में यह स्पष्ट झलक मिली कि वे पार्टी लाइन से हटकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही बात भाजपा के लिए अनपेक्षित लेकिन स्वागतयोग्य थी।
विदेश डेलिगेशन में शशि थरूर की भूमिका
प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने की कहानी
हाल ही में भारत सरकार ने सात अलग-अलग डेलिगेशन विदेश भेजे, जिनमें विभिन्न दलों के सांसद शामिल थे। इन डेलिगेशनों का मकसद था भारत की आतंकवाद विरोधी नीति को वैश्विक मंचों पर रखना और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना।
हालांकि कांग्रेस ने इन प्रतिनिधिमंडलों में अपने सांसदों को भेजने में झिझक दिखाई, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने व्यक्तिगत तौर पर शशि थरूर का नाम शामिल कराया। थरूर को अमेरिका जाने वाले डेलिगेशन का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी दी गई।
अमेरिका में थरूर का प्रदर्शन
अमेरिका में शशि थरूर ने भारतीय नीति का प्रभावशाली तरीके से बचाव किया। उन्होंने पाकिस्तान को आतंकवाद का समर्थक बताया और भारत की कार्रवाई को जायज ठहराया। इस दौरान उन्होंने कई अमेरिकी नेताओं और संगठनों से मुलाकात की और भारतीय पक्ष को मजबूती से रखा।
पीएम मोदी से मुलाकात: क्या यह सिर्फ एक औपचारिकता थी?
विदेश यात्रा से लौटने के बाद, सभी डेलिगेशन के सदस्य प्रधानमंत्री से मिले और उन्होंने अपनी यात्रा की रिपोर्ट दी। इस बैठक के दौरान शशि थरूर और नरेंद्र मोदी एक-दूसरे के करीब बैठे और सौहार्दपूर्ण चर्चा की। मीडिया में यह तस्वीरें और खबरें वायरल हो गईं।
प्रधानमंत्री ने सभी सांसदों की सराहना की, लेकिन विशेष रूप से शशि थरूर के योगदान की तारीफ की गई। मोदी ने कहा कि थरूर ने अमेरिका में भारत का पक्ष बहुत कुशलता से रखा।
कांग्रेस की बेचैनी और भीतरखाने की चर्चाएं
क्या कांग्रेस में असहजता है?
शशि थरूर का यह बदला रुख कांग्रेस पार्टी के अंदर चर्चा और असहजता का कारण बन गया है। पहले भी थरूर अपने बयानों से पार्टी लाइन से अलग जाते रहे हैं। चाहे मोदी की कुछ नीतियों की सराहना हो या भाजपा नेताओं के साथ मंच साझा करना, थरूर की स्वतंत्र सोच कांग्रेस नेतृत्व को खटकती रही है।
थरूर की सफाई
मीडिया से बातचीत में थरूर ने स्पष्ट किया कि उनका मकसद भारत की छवि को वैश्विक मंच पर मज़बूत करना था। उन्होंने कहा, “मैं भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा था, कांग्रेस का नहीं। राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है।”
भाजपा की रणनीति में थरूर की भूमिका?
क्या यह राजनीतिक संदेश है?
भाजपा के भीतर यह चर्चा है कि यदि कांग्रेस थरूर को लगातार नजरअंदाज करती रही, तो भविष्य में वे पार्टी बदल सकते हैं। हालांकि थरूर ने अभी तक भाजपा में शामिल होने की कोई मंशा नहीं जताई है, लेकिन भाजपा की ओर से उनका स्वागत किए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
विपक्ष में दरार की कोशिश?
भाजपा की यह रणनीति भी मानी जा रही है कि वह कांग्रेस के भीतर के प्रभावशाली और प्रगतिशील चेहरों को अलग-थलग कर विपक्ष को कमजोर करना चाहती है। शशि थरूर जैसे लोकप्रिय नेता को अपने पक्ष में लाना भाजपा के लिए एक राजनीतिक उपलब्धि हो सकती है।
निष्कर्ष: बदलते समीकरण और भविष्य की राह
शशि थरूर और पीएम मोदी की हालिया मुलाकातें और विचारों की समानता इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि भारतीय राजनीति में कुछ नया घटित हो रहा है। यह संभव है कि शशि थरूर राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर सभी दलों के साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं।
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगा कि वे भाजपा में शामिल होंगे, लेकिन इतना तो तय है कि उनकी भूमिका आने वाले समय में और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
देश की राजनीति में ऐसे नेताओं की जरूरत है जो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें। शशि थरूर का वर्तमान रुख शायद उसी सोच का प्रतिबिंब है।
संभावित निष्कर्ष:
शशि थरूर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नज़दीकी न केवल मीडिया में सुर्खियां बटोर रही है, बल्कि यह आने वाले समय की राजनीति का संकेत भी हो सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस पर क्या रुख अपनाती है और थरूर किस ओर जाते हैं – पार्टी के अनुशासन की राह या व्यक्तिगत राजनीतिक स्वतंत्रता की।
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Author: AK
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