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पाकिस्तान-म्यांमार की तरह बांग्लादेश में भी सेना का लोकतंत्र की चुनी हुई सरकारों के प्रति दामन कभी साफ नहीं रहा

भारत समेत कई देशों की निगाहें अब बांग्लादेश में बनने वाली अंतरिम सरकार की ओर लगी हुई है। सोमवार, 5 अगस्त को हुए शेख हसीना के तख्ता पलट के बाद एक बार फिर बांग्लादेश में सेना की भूमिका को भी संदेश के रूप में देखा जा रहा है। उसके बड़ी वजह यह है कि किसी भी देश में सेना के पास सबसे ज्यादा ताकत होती है। भारत के पड़ोसी पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में लोकतंत्र की चुनी हुई सरकारों के प्रति सेना का कभी भी दामन साफ नहीं रहा। इन तीनों देशों में सेना ने लोकतंत्र की कई बार हत्या की। इस बार भी बांग्लादेश में शीर्ष सेना अधिकारी समय रहते हिंसा पर काबू नहीं पा सके। प्रदर्शनकारियों के आगे बांग्लादेश में सेना  मूकदर्शक बनी रही। सोमवार दोपहर करीब 2 बजे हजारों की संख्या में गुस्साए कट्टरपंथियों और प्रदर्शनकारियों ने जब ढाका में पीएम हाउस पर कब्जा कर लिया तब शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। हालांकि उस दौरान बांग्लादेश आर्मी प्रमुख ने शेख हसीना के भागने में मदद भी की। उसके कुछ देर बाद ही आर्मी चीफ जनरल वकार-उज-जमान ने बताया कि ‘हसीना ने इस्तीफा दे दिया है। अब देश हम संभालेंगे।’ मौजूदा सेना प्रमुख की नियुक्ति शेख हसीना ने की है। हसीना अपनी बहन शेख रिहाना के साथ हिंडन के सेफ हाउस में हैं। करीब 50 साल पहले 1975 में बांग्लादेश में सैन्य तख्ता पलट होने के बाद भी ये दोनों बहनें भारत आईं थी। तब शेख हसीना ने दिल्ली में 6 साल तक पनाह ली थी। उस समय केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी। इंदिरा गांधी ने ही शेख हसीना का दिल्ली में रहने का पूरा इंतजाम किया था। बता दें कि जनवरी 2024 के बाद इस तख्तापलट की कहानी लिखनी शुरू हो गई थी। इस दौरान जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश सेना के कई बड़े अधिकारियों की आपस में बैठकें भी हुईं, जिसका पता शेख हसीना की खुफिया विंग नहीं लगा पाई। इसी साजिश के तहत बाहरी देशों ने अपने एजेंडे के तहत सेना और जमात-ए-इस्लामी के जरिए अपना निशाना साधा। छात्रों ने रिजर्वेशन के नाम पर जो दंगा फसाद शुरू किया था, संभवत उन्हें भी यह नहीं पता रहा होगा कि इसका अंत शेख हसीना की सरकार के तख्तापलट से होगा। इस आंदोलन में धीरे-धीरे आतंकवादी संगठन शामिल होते चले गए और आंदोलन की कमान इन आतंकवादी संगठनों ने ही संभाल ली जिन्हें बाहरी देशों से लगातार पैसा मिल रहा था। सेना ने शेख हसीना को यह कहकर समझाया कि हम अपने ही लोगों पर गोली नहीं चलाएंगे और इस गोलीबारी से शेख हसीना की सरकार पलट सकती है क्योंकि गोलीबारी में सैकड़ो लोग मारे जाएंगे। संभवत शेख हसीना को भी यह विश्वास नहीं रहा होगा की फौज के जिन अफसरों की बात पर वह विश्वास करती चली आ रही हैं, वह उन्हें भी धोखा देंगे। उल्लेखनीय है कि 1971 में पाकिस्तान विभाजन के बाद बांग्लादेश बना। आजादी की लड़ाई लड़ने वाली मुक्ति बाहिनी ही बांग्लादेश आर्मी बनी। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखें, तो बांग्लादेश बनने के बाद से अगले 15 सालों तक सेना का देश की राजनीति में हस्तक्षेप रहा। सेना ने 3 बार तख्तापलट किया। बांग्लादेश में आगे क्या होगा, इसमें सेना की भूमिका सबसे बड़ी है। वो शेख हसीना की वापसी का रास्ता बनाएंगे, खुद सत्ता चलाएंगे या चुनाव कराकर नई सरकार बनवाएंगे।

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Author: AK

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