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इतिहास में आज की तारीख एक ऐसे खतरनाक विस्फोट की याद दिलाती है जिसने दुनिया में तबाही मचाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिसे ‘डायनामाइट’ कहा जाता है। महान वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल ने 25 नवंबर 1867 को दुनिया का खतरनाक विस्फोटक डायनामाइट का पता लगाया था। डायनामाइट को बारूद भी कहा जाता है। यह अल्फ्रेड नोबेल वही हैं जिनके नाम पर दुनिया का सबसे बड़ा प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार दिया जाता है। नाइट्रोग्लिसरीन एक खतरनाक विस्फोटक था, लेकिन इसे लाने-ले जाने में काफी दिक्कत होती थी। इसलिए अल्फ्रेड और उनके पिता ने नाइट्रोग्लिसरीन पर काम शुरू किया। एक दिन जब अल्फ्रेड उस पर एक्सपेरिमेंट कर रहे थे, तभी उसमें विस्फोट हो गया और उनके भाई एमिल की मौत हो गई। 1866 में अल्फ्रेड ने एक्सपेरिमेंट के दौरान पाया कि एक महीन रेत, जिसे किएसेल्गुर्ह कहते हैं, उसे अगर नाइट्रोग्लिसरीन में मिलाया जाए, तो इससे वह लिक्विड सॉलिड पेस्ट में बदल जाता है। बस यहीं से बना डायनामाइट। उन्होंने 25 नवंबर 1867 को डायनामाइट का पेटेंट कराया। शुरुआती दौर में डायनामाइट का इस्तेमाल सुरंग को तोड़ने, बिल्डिंग को ध्वस्त करने और पत्थर के टुकड़े करने में इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका गलत इस्तेमाल होने लगा। इससे कई लोगों को नुकसान पहुंचा। एक दिन एक अखबार ने अल्फ्रेड की आलोचना करते हुए उन्हें मौत का सौदागर तक बता डाला। इस घटना ने उन्हें बहुत परेशान कर दिया। इसके बाद उन्होंने ऐसे काम करने शुरू किए जो शांति के लिए जाने गए। उन्होंने अपनी मौत के एक साल पहले वसीयत लिखी। वसीयत में लिखा कि उनकी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा ट्रस्ट को दिया जाए। उन्होंने अपनी वसीयत में सम्पत्ति में से पुरस्कार देने की इच्छा जताई, 10 दिसंबर 1896 को उनकी मौत हुई और 1901 नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हुई। पुरस्कार किसे मिलेगा इसके चयन के लिए नोबेल फाउंडेशन की टीम नाम तय करती है, लेकिन अंतिम फैसला स्वीडन का किंग ऑफ काउंसिल करता है। नोबेल विजेता को स्वर्ण पदक, प्रमाण पत्र और नौ लाख डॉलर यानी 7 करोड़ 36 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी जाती है।



















