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Jehanabad News: जिन बेटों ने छोड़ा, उनकी मांओं ने ‘बेटे’ के लिए रखा जितिया व्रत

Jehanabad News: जिन बेटों ने छोड़ा, उनकी मांओं ने ‘बेटे’ के लिए रखा जितिया व्रत
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वृद्धाश्रम में बुजुर्ग माताओं ने संचालक अरविंद कुमार के लिए रखा उपवास, बोलीं- बच्चों से दूर हैं तो क्या, यहां हमें बेटे का प्यार मिलता है

जहानाबाद। जितिया का पर्व मां और संतान के बीच अटूट प्रेम, ममता और संतान की लंबी उम्र की कामना का प्रतीक माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। लेकिन जहानाबाद के एक वृद्धाश्रम में इस बार जितिया की कहानी कुछ अलग थी। यहां उन बुजुर्ग माताओं ने अपने बच्चों के लिए नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के लिए व्रत रखा, जो उनके बुढ़ापे में बेटे की तरह सहारा बना हुआ है।

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वृद्धाश्रम में रहने वाली बुजुर्ग माताओं ने आश्रम के संचालक अरविंद कुमार के लिए जितिया व्रत रखा। किसी मां के हाथ में पूजा की थाली थी तो किसी की आंखों में अपने बच्चों की याद। लेकिन इन सबके बीच एक संतोष भी था कि जिन अपनों ने उनका साथ छोड़ दिया, उनके जीवन में अरविंद कुमार ने बेटे की तरह जगह बनाई है।

अरविंद कुमार बताते हैं कि इस आश्रम में रहने वाली कई बुजुर्ग महिलाओं को उनके अपने बच्चे किसी न किसी कारण से यहां छोड़ गए हैं। कुछ बुजुर्ग ऐसी भी हैं, जिन्हें बेसहारा हालत में सड़क पर भटकते हुए देखा गया और उन्हें आश्रम में लाकर रहने और भोजन की व्यवस्था की गई। आज यही महिलाएं आश्रम को अपना घर और यहां के लोगों को अपना परिवार मानती हैं।

मां ने जन्म दिया, इन मांओं ने जीवन का अर्थ समझाया

अरविंद कुमार कहते हैं कि उनकी अपनी मां भी उनके लिए जितिया का व्रत रखा करती थीं। मां के उस स्नेह और ममता को वह आज भी याद करते हैं। लेकिन समय ने उन्हें ऐसी माताओं की सेवा करने का अवसर दिया, जिन्हें उनके अपने बच्चों ने अकेला छोड़ दिया।

उन्होंने कहा कि मेरे लिए इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है कि जिन मांओं के बच्चों ने उनका साथ छोड़ दिया, उन्हीं मांओं की सेवा करने का मौका मुझे मिला। ये महिलाएं मुझे बेटे की तरह स्नेह देती हैं और मैं भी उन्हें अपनी मां की तरह सम्मान देने की कोशिश करता हूं।

अरविंद कुमार के मुताबिक, इस बार जब आश्रम की माताओं ने उनके लिए जितिया का व्रत रखा तो यह उनके लिए भावुक कर देने वाला क्षण था। उन्होंने कहा कि उनकी मां जब जीवित थीं, तब उनके लिए जितिया रखती थीं। आज वही ममता उन्हें इन बुजुर्ग माताओं में दिखाई देती है।

बच्चों से दूर, लेकिन ममता से नहीं

वृद्धाश्रम में रहने वाली महिलाओं के लिए जितिया सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि अपने बच्चों से जुड़े रिश्तों और पुरानी यादों को महसूस करने का दिन भी रहा। कई माताओं के मन में अपने बच्चों की कमी जरूर है, लेकिन आश्रम में उन्हें मिलने वाला अपनापन उनके दर्द को कुछ कम करता है। इन माताओं का कहना है कि जिंदगी के इस पड़ाव पर उन्हें किसी बड़े सहारे की जरूरत नहीं, बस सम्मान, अपनापन और दो शब्द प्यार के चाहिए। आश्रम में उन्हें यही मिलता है। संचालक और वहां के लोग जिस तरह उनका ख्याल रखते हैं, उससे उन्हें लगता है कि वे अकेली नहीं हैं। जितिया के अवसर पर आश्रम में पूजा-अर्चना और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच एक ऐसा रिश्ता भी दिखाई दिया, जो खून का नहीं, बल्कि सेवा, सम्मान और ममता का है। जिन मांओं ने अपने बच्चों से दूर होकर जीवन का कठिन दौर देखा, उन्हीं मांओं ने अपने ‘बेटे’ की लंबी उम्र के लिए व्रत रखकर यह संदेश दिया कि मां की ममता किसी रिश्ते या खून की पहचान की मोहताज नहीं होती।इस जितिया ने वृद्धाश्रम में रहने वाली माताओं और संचालक के रिश्ते को एक नया अर्थ दे दिया। यहां इस बार किसी बेटे के लिए उसकी जन्म देने वाली मां ने नहीं, बल्कि कई ऐसी मांओं ने व्रत रखा, जिन्हें उनके अपने बच्चों ने कभी पीछे छोड़ दिया था।

Jehanabad News: Mothers abandoned by their sons observed the Jitiya fast for the sake of a ‘son’.

Barun Kumar
Author: Barun Kumar

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