उपराष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना के साथ ही नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। विपक्ष और एनडीए की रणनीति से सियासी पारा चढ़ा।
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उपराष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी: सियासी रणनीतियों का नया अध्याय
भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रक्रिया अब औपचारिक रूप से शुरू हो चुकी है। चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के साथ ही नामांकन दाखिल करने का रास्ता साफ हो गया है। यह चुनाव केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा राजनीतिक संकेत भी है।
अधिसूचना जारी, नामांकन की प्रक्रिया आरंभ
चुनाव आयोग ने 9 सितंबर को होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए 6 अगस्त को अधिसूचना जारी कर दी है। इसके तहत नामांकन की अंतिम तिथि 21 अगस्त तय की गई है। नामांकन पत्रों की जांच 22 अगस्त को होगी, जबकि नाम वापस लेने की अंतिम तारीख 25 अगस्त रखी गई है।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफे के बाद यह पद 21 जुलाई को रिक्त हो गया था। उनका कार्यकाल अगस्त 2027 तक था, लेकिन असमय इस्तीफे ने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है।
विपक्ष और एनडीए में उम्मीदवार चयन को लेकर हलचल
राहुल गांधी की डिनर डिप्लोमेसी
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 7 अगस्त को अपने निवास पर विपक्षी दलों की बैठक बुलाई है। यह बैठक एक औपचारिक डिनर के रूप में रखी गई है, लेकिन इसके पीछे की रणनीति उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर है। माना जा रहा है कि इसी बैठक में संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार के नाम पर अंतिम मुहर लगेगी।
INDIA गठबंधन के नेता इस बार 2022 जैसी गलती नहीं दोहराना चाहते। उस चुनाव में मार्गरेट अल्वा को जगदीप धनखड़ से करारी शिकस्त मिली थी। अब विपक्ष ऐसे चेहरे की तलाश में है जो सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो—खासतौर पर पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और किसानों के बीच।
बीजेपी की रणनीतिक बैठकों का दौर
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी भी इस चुनाव को हल्के में नहीं ले रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में वरिष्ठ नेताओं की एक बैठक हो चुकी है। इसमें न केवल नए उम्मीदवार के नाम पर चर्चा हुई, बल्कि गैर-एनडीए दलों से समर्थन जुटाने की रणनीति भी बनाई गई।
बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह जगदीप धनखड़ जैसा प्रभावशाली चेहरा सामने लाए और विपक्ष को फिर से करारी शिकस्त दे।
2022 के चुनाव से सबक
2022 के उपराष्ट्रपति चुनाव में कुल 725 मत डाले गए थे। इनमें से धनखड़ को 528 वोट और अल्वा को केवल 182 वोट मिले थे। 15 वोट अवैध रहे थे। इस तरह विपक्ष की हार का अंतर 346 वोटों का था। इस बार विपक्ष किसी भी हाल में इतनी बड़ी हार नहीं चाहता।
संवैधानिक पहलू और कार्यकाल की शर्तें
संविधान के अनुच्छेद 68(2) के अनुसार, उपराष्ट्रपति के पद पर रिक्ति की स्थिति में नया चुनाव यथाशीघ्र कराया जाना चाहिए। नया निर्वाचित उपराष्ट्रपति अपने पदभार ग्रहण करने की तिथि से पांच वर्ष तक कार्य करेगा।
हालांकि, संविधान यह स्पष्ट नहीं करता कि अगर उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे या राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन कर रहा हो, तो उस दौरान राज्यसभा का सभापति कौन होगा। इस स्थिति में राज्यसभा के उपसभापति या राष्ट्रपति द्वारा अधिकृत कोई अन्य सदस्य सभापति के कार्य करेगा।
उपराष्ट्रपति का संवैधानिक दर्जा
उपराष्ट्रपति देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है। उनका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, लेकिन तब तक पद पर बने रह सकते हैं जब तक उत्तराधिकारी कार्यभार न संभाल ले। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन अध्यक्ष होते हैं और उन्हें कोई अन्य लाभ का पद स्वीकार नहीं होता।
जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन करता है, तो उस दौरान वे राज्यसभा की अध्यक्षता नहीं कर सकते और ना ही उन्हें इसके लिए वेतन या भत्ते मिलते हैं।
बिहार चुनाव की पृष्ठभूमि में उपराष्ट्रपति चुनाव
इस चुनाव की एक खास बात यह भी है कि यह बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हो रहा है। बिहार की राजनीति में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच पहले से ही तल्खी बढ़ी हुई है। ऐसे में उपराष्ट्रपति चुनाव एक राजनीतिक माइक्रोस्कोप बन गया है, जिसमें दोनों पक्षों की रणनीतियों को नज़दीक से देखा जा रहा है।
निष्कर्ष: विपक्ष की एकजुटता बनाम सत्ता पक्ष की स्थिरता
9 सितंबर को होने वाला उपराष्ट्रपति चुनाव केवल एक संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि 2025 की राजनीति का भविष्य तय करने वाली एक अहम कड़ी बन चुका है। विपक्ष जहां एकजुट होकर एक नया सियासी संदेश देने की कोशिश में है, वहीं एनडीए इसे अपनी स्थिरता और शक्ति के प्रदर्शन के रूप में देख रहा है।
राहुल गांधी की डिनर डिप्लोमेसी हो या बीजेपी की रणनीतिक बैठकें—दोनों तरफ से इस चुनाव को गंभीरता से लिया जा रहा है। अगले कुछ हफ्तों में साफ हो जाएगा कि यह लड़ाई किसके पक्ष में जाती है और इसका क्या असर बिहार सहित देश की आगामी राजनीति पर पड़ेगा।
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Author: AK
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