
इतिहास साक्षी रहा है युद्ध से किसी भी देश का भला नहीं हुआ। इसका उदाहरण हम पहले और दूसरे विश्व युद्ध में देख चुके हैं। इसके साथ संघर्ष, लड़ाई और जंग छिड़ना किन्हीं दो देशों के बीच आंतरिक मामला भी नहीं रहती। दो देशों के बीच शुरू हुई लड़ाई की आग में कई देश झुलस जाते हैं। ऐसे ही इन दिनों पश्चिमी एशिया के देशों (मिडिल ईस्ट) में हो रहा है। इजराइल लेबनान में हिजबुल्लाह, गाजा में हमास, ईरान और यमन में हूतियों से लड़ाई लड़ रहा है। मौजूदा समय में इजरायल ईरान युद्ध के कगार पर खड़े होने से भारत समेत दुनिया के तमाम देशों की चिंताएं भी बढ़ा रहा है। दोनों देशों के बीच जंग की आहट से भारत पर भी व्यापारिक और आर्थिक असर दिखाई देने लगा है।क्योंकि भारत एशिया में इजराइल का दूसरा बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत द्वारा पश्चिम एशियाई देशों को निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में बासमती, कपड़े, रत्न-आभूषण, सूती धागा और कपड़े शामिल हैं। हालांकि, द्विपक्षीय व्यापार में मुख्य रूप से हीरे, पेट्रोलियम उत्पादों और रसायनों का वर्चस्व है। पश्चिम एशियाई क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने से तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि जैसे क्षेत्रों में व्यापार को नुकसान के अलावा पहले से ही ऊंची रसद लागत बढ़ने की आशंका है। युद्ध में सीधे तौर पर शामिल देशों को निर्यात के लिए बीमा लागत भी बढ़ सकती है, जिसका असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ेगा। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन ने कहा, यह संघर्ष विश्व व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका से लेकर भारत तक के शेयर बाजार इसका उदाहरण हैं। कच्चे तेल के दाम में आए इजाफे ने चिंता और भी बढ़ा दी है। भारत की बात करें, तो इजरायल, ईरान के बीच जंग बढ़ने के संकेतों से कई भारतीय दिग्गज कंपनियां बेचैन हैं, क्योंकि इनका इजरायल में बड़ा कारोबार फैला हुआ है। दरअसल पश्चिम एशिया में लम्बे समय से तनाव बना हुआ है। इसकी वजह से भारत के इजरायल और ईरान के साथ द्विपक्षीय व्यापार घटता जा रहा है। अब इस ताजा संकट की वजह से भारत के इजरायल और ईरान के बीच आर्थिक संबंध कमजोर होने की आशंका है। कच्चा तेल कुछ और महंगा हो गया। इसकी वजह से भारत का ऑयल इम्पोर्ट बिल 9 से 10 बिलियन डॉलर तक बढ़ने की आशंका बढ़ रही है। ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगने पर कच्चा तेल सात डॉलर प्रति बैरल तक महंगा हो सकता है। वहीं, अगर ईरान के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर इजरायल हमला करता है तो कच्चा तेल 13 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा हो सकता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए आपूर्ति बाधित होने पर कच्चा तेल 13 से 28 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा हो सकता है।महंगा होता कच्चा तेल भारत के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक अक्टूबर को इजरायल पर ईरान के हमले से पहले अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल फ्यूचर्स की कीमत 70.78 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी। तीन अक्टूबर को ट्रेंडिंग के दौरान ब्रेंट क्रूड ऑयल फ्यूचर्स की कीमत एक समय बढ़कर 77.58 डॉलर/बैरल तक पहुंच गई थी। पिछले दो दिनों में कच्चा तेल 6 से 7 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा हुआ है। भारत अपनी जरूरत का 80% से 85% तक कच्चे तेल का आयात करता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018-19 तक ईरान भारत का तीसरा बड़ा तेल सप्लॉयर था, लेकिन जून 2019 में जब अमेरिका ने ईरान पर परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रतिबंध लगाए तो भारत को भी ईरान से तेल आयात छूट खत्म हो गई। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस हमारा सबसे बड़ा कच्चे तेल का सप्लॉयर रूस है। भारत रूस से करीब 40 फीसद, जबकि इराक से करीब 20 फीसद आयात करता है। वहीं इस जंग के दायरे में भारत की करीब 14 कंपनियां हैं, जो सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आ रही हैं। इनमें टाटा ग्रुप की कंपनी से लेकर गौतम अडानी तक की कंपनियां हैं। जंग का असर इन कंपनियों के शेयरों पर पहले से ही पड़ने लगा है।भारतीय कंपनियों में 14 से अधिक शेयर मार्केट में लिस्टेड बड़े नाम हैं। इनमें अडानी ग्रुप की कंपनी अडानी पोर्ट, फार्मा सेक्टर की कंपनी सनफार्मा, ज्वेलरी सेक्टर की कंपनी कल्याण ज्वेलर्स से लेकर टाटा ग्रुप की टाइटन तक के नाम शामिल हैं। इसके अलावा टीसीएस, विप्रो से लेकर टेक महिंद्रा तक का इजरायल में बड़ा कारोबार फैला हुआ है।वहीं इजरायल पर ईरान के बड़े मिसाइल हमले और इजरायल द्वारा लेबनान में सैन्य कार्रवाई की वजह से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर ग्लोबल ट्रेड और अर्थव्यवस्था पर गहराता जा रहा है। यह संकट ऐसे समय पर खड़ा हुआ है जब पश्चिम एशिया में लम्बे समय से जारी अनिश्चितता की वजह से भारत-इजरायल और भारत-ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले से ही कमजोर पड़ चुका है।
Author: AK
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