पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का निधन दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में हुआ। जानिए उनके संघर्षपूर्ण और बेबाक राजनीतिक जीवन की पूरी कहानी।
Satyapal Malik Passes Away at Delhi’s RML Hospital
परिचय: एक बेबाक और विचारशील नेता का अंत
भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सत्ता के साथ-साथ जनमत के पक्षधर भी होते हैं। सत्यपाल मलिक एक ऐसे ही राजनेता थे, जो अक्सर अपने बेबाक बयानों और स्पष्ट विचारों के लिए जाने जाते थे। 5 अगस्त 2025 को दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में उनका निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और दोपहर 1 बजकर 12 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके सहयोगी कंवर सिंह राणा ने उनके निधन की पुष्टि की।
सत्यपाल मलिक का जीवन संघर्ष, सिद्धांत और साहस का प्रतीक रहा। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों में रहते हुए भी कभी अपने विचारों से समझौता नहीं किया।
आरंभिक जीवन और शिक्षा
सत्यपाल मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए मेरठ कॉलेज गए। यहीं से उनका राजनीतिक जीवन शुरू हुआ। वर्ष 1965 में उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा और 1966-67 में मेरठ कॉलेज के पहले छात्रसंघ अध्यक्ष बने। छात्र जीवन में ही उन्होंने नेतृत्व क्षमता और जनसंपर्क का जो कौशल विकसित किया, वही आगे चलकर उनकी पहचान बना।
चरण सिंह से लेकर विधानसभा तक का सफर
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक जीवन तब नया मोड़ लेता है जब वह पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के संपर्क में आते हैं। चौधरी चरण सिंह द्वारा स्थापित भारतीय क्रांति दल (BKD) से जुड़े मलिक ने 1974 में बागपत सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बने।
1975 में जब लोकदल का गठन हुआ, तो मलिक को पार्टी का अखिल भारतीय महामंत्री बनाया गया। यह वह दौर था जब उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पहचान बनानी शुरू की।
राज्यसभा सदस्य और कांग्रेस में प्रवेश
1980 में मलिक को लोकदल की ओर से राज्यसभा भेजा गया। हालांकि, लोकदल में आंतरिक कलह के चलते 1984 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस की ओर से वह 1986 में फिर राज्यसभा पहुंचे और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री नियुक्त किए गए।
लेकिन 1987 में बोफोर्स घोटाले से आहत होकर उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस छोड़ दी। यह उनके सिद्धांतवादी सोच का परिचायक था।
जनमोर्चा और जनता दल में सक्रिय भूमिका
राजनीति में बेबाकी के लिए पहचाने जाने वाले मलिक ने 1988 में जनता दल का हिस्सा बनकर अपनी सक्रियता को और विस्तार दिया। 1989 में वह जनता दल के टिकट पर अलीगढ़ से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 1991 तक वे पार्टी के प्रवक्ता और राष्ट्रीय सचिव रहे।
इस अवधि में उन्होंने सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास और किसान हितों से जुड़े मुद्दों को संसद और सार्वजनिक मंचों पर मजबूती से उठाया।
भाजपा में प्रवेश और संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ
वर्ष 2004 में मलिक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और बागपत से लोकसभा चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें 2005-06 में उत्तर प्रदेश भाजपा का उपाध्यक्ष बनाया।
2009 में वह भाजपा किसान मोर्चा के अखिल भारतीय प्रभारी बनाए गए। 2014 में उन्हें पार्टी के उपाध्यक्ष और चुनावी घोषणा पत्र की कृषि उपसमिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
राज्यपाल के रूप में कार्यकाल
सत्यपाल मलिक को अक्टूबर 2017 में बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय जैसे राज्यों में भी राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया।
विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में उनके कार्यकाल को राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने घाटी में प्रशासनिक पारदर्शिता, युवाओं के मुद्दों और भ्रष्टाचार पर खुलकर अपनी राय रखी, जिसकी वजह से वे अक्सर चर्चा में रहते थे।
बेबाक बयान और वैचारिक दृढ़ता
राज्यपाल रहते हुए भी मलिक ने कई बार केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। किसानों के आंदोलन के दौरान उन्होंने खुलकर किसानों का समर्थन किया और सरकार को सलाह दी कि वह किसानों की बात सुने। उनके इन बयानों को जहां कुछ लोगों ने असहज माना, वहीं आम जनता में उन्हें एक निडर और ईमानदार नेता के रूप में देखा गया।
सत्यपाल मलिक का योगदान और विरासत
सत्यपाल मलिक का जीवन राजनीतिक अवसरवादिता के विपरीत सच्चाई और सिद्धांतों का उदाहरण रहा। उन्होंने कभी पद की लालसा में अपने विचारों से समझौता नहीं किया। चाहे वह राज्यसभा से इस्तीफा देना हो या किसानों के मुद्दों पर केंद्र सरकार की आलोचना करना, मलिक हमेशा जनता के पक्ष में खड़े नजर आए।
उनकी मृत्यु केवल एक राजनेता का अंत नहीं है, बल्कि एक ऐसे विचारशील नेता की कमी है जो सत्ता में रहते हुए भी सत्य कहने का साहस रखता था।
निष्कर्ष
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक सफर अनेक मोड़ों और चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति में अपने सिद्धांतों को सर्वोपरि रखा। वे उन चंद नेताओं में से एक थे, जिनकी आवाज सत्ता में रहते हुए भी विपक्ष जैसी सुनाई देती थी। उनका निधन भारतीय राजनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
आज जब देश विचारधारात्मक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, सत्यपाल मलिक जैसे नेताओं की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि राजनीति केवल पद प्राप्ति नहीं, बल्कि जनसेवा और सच्चाई की राह पर चलने का माध्यम भी हो सकती है।
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Author: AK
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