शुक्र, अप्रैल 17, 2026

Pakistan as US Base: पाकिस्तान पर अमेरिकी दांव, चीन-ईरान को साधने की नई रणनीति

Pakistan as US Base: Trump’s Strategic Move Against China and Iran

अमेरिका ने चीन और ईरान पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान को फिर से रणनीतिक अड्डा बनाने की कोशिशें शुरू कीं। ट्रंप की नई सैन्य नीति चर्चा में।


Pakistan as US Base: Trump’s Strategic Move Against China and Iran


प्रस्तावना

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पाकिस्तान हमेशा से एक रणनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल होता रहा है। कभी अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिका के लिए गेटवे की भूमिका निभाने वाला पाकिस्तान, चीन और ईरान के करीब जाकर वॉशिंगटन से दूरी बना चुका था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने एक बार फिर पाकिस्तान को अपने पक्ष में लाने की कवायद तेज कर दी है। इसका मकसद साफ है—चीन और ईरान पर दबाव बढ़ाना और ज़रूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई के लिए पाकिस्तान को आधार बनाना।


अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों का उतार-चढ़ाव

  • अफगानिस्तान युद्ध (2001–2021): अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक मदद देकर अपने लिए सहयोगी बनाए रखा।
  • मिशन खत्म होने के बाद: अमेरिका ने पाकिस्तान को महत्व कम दिया, जिससे पाकिस्तान चीन की ओर झुक गया।
  • वर्तमान परिदृश्य: ट्रंप फिर से पाकिस्तान को सैन्य दृष्टिकोण से अपने लिए अहम मान रहे हैं।

यह उतार-चढ़ाव दिखाता है कि पाकिस्तान की अहमियत अमेरिका के लिए केवल रणनीतिक जरूरत पर आधारित रही है।


ट्रंप की रणनीति: पाकिस्तान क्यों अहम?

ट्रंप प्रशासन का लक्ष्य है कि अमेरिका की सैन्य पहुंच उसके विरोधियों—चीन, ईरान और रूस—के ज्यादा करीब हो।

  • भौगोलिक स्थिति: पाकिस्तान की स्थिति अफगानिस्तान, ईरान और चीन के नज़दीक है।
  • सैन्य ठिकाना: पाकिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति होने पर वॉशिंगटन को तेज और सीधा एक्शन करने की सुविधा मिलेगी।
  • राजनीतिक दबाव: चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) से चीन को मिली बढ़त को रोकना भी एक बड़ा कारण है।

बगराम एयर बेस की पृष्ठभूमि

अफगानिस्तान का बगराम एयर बेस अमेरिकी सेना का सबसे बड़ा ठिकाना था।

  • 2021 में अमेरिका की वापसी के बाद यह बेस तालिबान के कब्जे में चला गया।
  • ट्रंप प्रशासन को आशंका है कि इसे वापस पाना कठिन होगा।
  • यही वजह है कि वे पाकिस्तान को विकल्प के रूप में देख रहे हैं।

इस स्थिति ने पाकिस्तान की रणनीतिक अहमियत को और बढ़ा दिया है।


पाकिस्तान का रुख: मजबूरी या अवसर?

पाकिस्तान आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है।

  • IMF की मदद और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की ज़रूरत है।
  • अमेरिका से रिश्ते सुधारकर पाकिस्तान आर्थिक सहूलियतें हासिल कर सकता है।
  • सेना की भूमिका अहम है—इसलिए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ सेना प्रमुख असीम मुनीर भी ट्रंप से मुलाकात में शामिल हुए।

यह संकेत देता है कि पाकिस्तान अपने राष्ट्रीय हित और सैन्य नेतृत्व को ध्यान में रखते हुए अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने को तैयार है।


अमेरिकी सैन्य नीति में बदलाव

प्रोफेसर पाल पोस्ट (शिकागो यूनिवर्सिटी) के अनुसार:

  • ट्रंप प्रशासन ने रक्षा विभाग को युद्ध विभाग का दर्जा देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि विदेश नीति से पहले सैन्य नीति को प्राथमिकता दी जाएगी।
  • पाकिस्तान को अब कूटनीतिक सहयोगी नहीं, बल्कि सैन्य समर्थक के रूप में देखा जा रहा है।
  • इसका सीधा मतलब है कि पाकिस्तान अमेरिका के लिए एक सैन्य ठिकाने की भूमिका निभाएगा।

ट्रंप और टैरिफ पॉलिसी

डोनाल्ड ट्रंप को “टैरिफ मैन” कहलाना पसंद है।

  • वे चीन, यूरोप और भारत जैसे देशों को रूस से तेल खरीदते देखकर नाखुश हैं।
  • उनका मानना है कि ये देश यूक्रेन युद्ध में रूस को अप्रत्यक्ष रूप से ताकत दे रहे हैं।
  • भारत ने रूस से सस्ते तेल खरीदकर व्यावहारिक राजनीति दिखाई, जो ट्रंप की रणनीति से टकराती है।

इस संदर्भ में पाकिस्तान को अपने पक्ष में लाना ट्रंप की बहुआयामी रणनीति का हिस्सा है।


चीन और ईरान पर अमेरिकी दबाव

  1. चीन:
    • पाकिस्तान में चीन भारी निवेश कर रहा है।
    • ग्वादर पोर्ट और CPEC से चीन को हिंद महासागर तक पहुंच मिली है।
    • अमेरिका पाकिस्तान के जरिए इस प्रभाव को संतुलित करना चाहता है।
  2. ईरान:
    • अमेरिका और ईरान के रिश्ते दशकों से तनावपूर्ण हैं।
    • पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति ईरान पर निगरानी और दबाव दोनों के लिए आदर्श है।

अंतरराष्ट्रीय समीकरण

  • भारत: रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर रहा है।
  • रूस: यूक्रेन युद्ध में पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से जूझ रहा है।
  • चीन: पाकिस्तान में रणनीतिक निवेश कर अमेरिका की चुनौती बढ़ा रहा है।
  • यूरोप: ऊर्जा संकट के बीच अमेरिका की नीतियों पर निर्भर होता जा रहा है।

इस जटिल समीकरण में पाकिस्तान अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण मोहरा है।


पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों की चुनौतियाँ

  1. चीन का दबाव: पाकिस्तान चीन से दूरी नहीं बना सकता क्योंकि आर्थिक मदद उसी पर निर्भर है।
  2. आंतरिक अस्थिरता: राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट पाकिस्तान की विदेश नीति को सीमित करते हैं।
  3. जनता की राय: पाकिस्तान की जनता अमेरिका की नीतियों को संदेह की नजर से देखती है।
  4. सैन्य प्राथमिकता: अमेरिका की केवल सैन्य दृष्टिकोण वाली नीति लंबे समय तक टिक पाएगी या नहीं, यह भी सवाल है।

भविष्य की संभावनाएँ

  • यदि अमेरिका पाकिस्तान को आर्थिक मदद और कूटनीतिक सहारा देता है, तो यह साझेदारी मजबूत हो सकती है।
  • लेकिन यदि पाकिस्तान केवल सैन्य ठिकाना बनकर रह गया, तो उसकी आंतरिक राजनीति और बाहरी रिश्तों में और तनाव बढ़ सकता है।
  • आने वाले समय में पाकिस्तान को संतुलन साधना होगा—अमेरिका के साथ भी और चीन के साथ भी।

निष्कर्ष

अमेरिका की नई रणनीति में पाकिस्तान की भूमिका एक बार फिर अहम हो गई है। ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान को चीन और ईरान पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। लेकिन यह रिश्ता केवल तभी स्थायी हो सकेगा जब पाकिस्तान इसे महज़ मजबूरी नहीं, बल्कि अवसर के रूप में ले और अमेरिका भी केवल सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक व कूटनीतिक समर्थन दे।

आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान वाकई अमेरिका का स्थायी साझेदार बन पाएगा या एक बार फिर केवल अस्थायी ठिकाना साबित होगा।


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Author: AK

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