जहानाबाद सदर अस्पताल में मरीजों को मुफ्त और अन्य लोगों को मात्र 15 रुपये में पौष्टिक खाना मिल रहा है। जानिए ‘दीदी की रसोई’ की खासियत।
Jehanabad’s Rs 15 Meal Scheme: Free Food for Patients
परिचय: जब भूख लगे और जेब में हो सिर्फ 15 रुपये
भारत में ऐसे कई लोग हैं जो अस्पतालों में इलाज करवाने के लिए दूर-दराज से आते हैं और खाने-पीने की परेशानी से जूझते हैं। बिहार के जहानाबाद जिले में एक ऐसी पहल की गई है जो मानवता और सेवा का अनूठा उदाहरण बन गई है। यहां के सदर अस्पताल में मरीजों को मुफ्त भोजन और अन्य आगंतुकों को मात्र 15 रुपये में पौष्टिक खाना दिया जाता है। इस व्यवस्था का नाम है – “दीदी की रसोई”, जो पिछले चार वर्षों से लगातार लोगों की भूख मिटा रही है।
दीदी की रसोई: एक प्रेरणादायक पहल
क्या है दीदी की रसोई?
‘दीदी की रसोई’ बिहार सरकार और जीविका मिशन की एक संयुक्त योजना है, जिसे खासकर ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने और मरीजों की सुविधा के लिए शुरू किया गया था। इस योजना के अंतर्गत जीविका समूह की महिलाएं, जिन्हें आमतौर पर ‘जीविका दीदी’ कहा जाता है, अस्पताल परिसर में एक छोटी सी कैंटीन चलाती हैं, जहां मरीजों और उनके साथ आए परिजनों को घर जैसा खाना मिलता है।
15 रुपये में क्या-क्या मिलता है?
सुबह का नाश्ता
सुबह 7 बजे से 9 बजे तक यहां पराठा, चटनी, इडली, सांभर आदि व्यंजन उपलब्ध होते हैं। एक प्लेट नाश्ता केवल 15 रुपये में।
दोपहर और रात का भोजन
मरीजों को दिन में तीन बार मुफ्त खाना दिया जाता है। इसमें चावल, दाल, सब्जी और जरूरत के अनुसार नॉन वेज विकल्प भी दिया जाता है।
अन्य लोग भी केवल 15 से 30 रुपये में पूरा खाना प्राप्त कर सकते हैं।
मरीजों और परिजनों को राहत
क्यों है ये सुविधा ज़रूरी?
अस्पतालों में इलाज करवाने आए मरीजों के परिजन अक्सर महंगे होटलों या भोजनालयों में खाना लेने को मजबूर होते हैं। इससे ना केवल आर्थिक बोझ बढ़ता है, बल्कि बीमार व्यक्ति के लिए घर का खाना न मिल पाना परेशानी बन जाता है। ऐसे में ‘दीदी की रसोई’ एक बड़ी राहत साबित हो रही है।
एक महिला परिजन बताती हैं,
“पहले खाना लाने के लिए अस्पताल से बाहर जाना पड़ता था। अब यहीं अच्छा और सस्ता खाना मिल रहा है, जिससे समय और पैसा दोनों बचता है।”
जीविका दीदियों की मेहनत
कैसे चुनी जाती हैं रसोई में काम करने वाली महिलाएं?
रसोई में काम करने वाली सभी महिलाएं जीविका समूह से जुड़ी होती हैं। इन्हें किचन में काम करने के लिए पहले स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाता है। चयन प्रक्रिया में उन्हें लिखित परीक्षा और साक्षात्कार देना पड़ता है।
संगीता देवी, जो 6 महीनों से इस रसोई में काम कर रही हैं, बताती हैं –
“यह काम मेरे लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम है। जब लोग खाना खाकर संतुष्ट होते हैं, तो हमें बहुत संतोष मिलता है।”
क्या कहते हैं अस्पताल प्रशासन?
नीरज कुमार, जो इस रसोई की देखरेख करते हैं, कहते हैं –
“यह योजना बेहद सफल रही है। हर दिन करीब 200 से अधिक लोग यहां खाना खाते हैं। मरीजों के लिए यह मुफ्त है, जबकि सामान्य लोगों को कम कीमत पर खाना दिया जाता है। हर चीज का पूरा हिसाब रखा जाता है और साफ-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाता है।”
स्वाद और स्वच्छता का संगम
क्या है रसोई की खासियत?
- घरेलू स्वाद: यहां का खाना बाजार जैसा नहीं, बल्कि घर जैसा लगता है।
- स्वच्छता: खाने को तैयार करने और परोसने में पूरी स्वच्छता बरती जाती है।
- हर किसी के लिए खुला: मरीज, परिजन, अस्पताल कर्मचारी या कोई आम नागरिक – सभी यहां भोजन कर सकते हैं।
- वेरायटी: हर दिन अलग-अलग व्यंजन मिलते हैं, जिससे भोजन उबाऊ नहीं होता।
सामाजिक प्रभाव और महिलाओं का सशक्तिकरण
‘दीदी की रसोई’ केवल खाना परोसने की जगह नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का एक सशक्त उदाहरण भी है। यहां काम कर रही महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं, और उनका आत्मविश्वास लगातार बढ़ रहा है।
एक रसोई दीदी कहती हैं,
“पहले हम केवल घर के कामों तक सीमित थे, लेकिन अब हम परिवार की आय में योगदान दे रहे हैं।”
भविष्य की संभावनाएं
इस मॉडल को देखकर अन्य जिलों में भी ऐसी रसोइयों की मांग की जा रही है। सरकार अगर इसे हर जिला अस्पताल में लागू करे, तो यह एक राष्ट्रीय स्तर की मॉडल योजना बन सकती है।
निष्कर्ष: मानवता और सेवा का मेल
जहानाबाद की ‘दीदी की रसोई’ न केवल भूख मिटा रही है, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की कहानी भी लिख रही है। केवल 15 रुपये में स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना उपलब्ध कराना, और मरीजों को मुफ्त भोजन सेवा देना, इस योजना को खास बनाता है। यह उदाहरण दिखाता है कि अगर सही सोच और नीति हो, तो बदलाव लाना मुश्किल नहीं।
तो अगली बार अगर आप जहानाबाद सदर अस्पताल में हों और जेब में ज्यादा पैसे न हों, तो चिंता छोड़िए — दीदी की रसोई है ना!
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Author: AK
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