यह रचना बहुत ही प्रभावशाली और भावनात्मक है। मानसी सिंह द्वारा लिखित यह कविता जातिवाद, सामाजिक नीचता और वीरों के अपमान के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिवाद है। कुछ बिंदुओं पर मैं एक संक्षिप्त प्रतिक्रिया दे रहा हूँ:
- भाव – कविता में पीड़ा, क्रोध और जागरूकता तीनों का समावेश है। यह पाठक को झकझोरने का कार्य करती है और सामाजिक विवेक को जागृत करती है।
- शिल्प – दोहराव और प्रश्नवाचक शैली इसे संवादात्मक बनाते हैं, जिससे पाठक खुद से सवाल करने को प्रेरित होता है।
- संदेश – कविता का अंतिम भाग विशेष रूप से गूंजता है:
“अपनी आन बान शान का सर्टिफिकेट
ऐसे नीच को मत थमाओ आप…”
यह आत्मसम्मान और विवेक की पुकार है। - लेखन शैली – मानसी सिंह की लेखनी में भावों की स्पष्टता है। वह शब्दों से आग की लपटें नहीं, बल्कि चेतना की ज्वाला जलाती हैं।
नीचता से किनारा
उस कायर की भांति जातिवाद फैलाओगे,
बोलो ना नीच के संग रक्तपात मचाओगे,
जिसने खाया जिस थाली में उसी को छेद रहा है,
जो बोलकर घर छोड़ दिया उसके साथ टकराओगे?
कितना गंदा है दिखा दिया महापुरुषों का अपमान करके,
अब बोलो ना इनकी नीचता में तुम भी लिप्त हो जाओगे!
जिसने 80 घाव लेकर भी अपना फर्ज निभाया था,
उसकी वीरता को इन कायरों से सर्टिफिकेट दिलावाओगे।
ऐसी ओछी बातों से हृदय छलनी तो होता है,
पर बोलो ना तुम भी इसके संग नीचता दिखलाओगे।
अब अपनी आँखें खोल दो; द्विमुखियों की तोल लो,
गर आए कभी ऐसी नौबत तो इन्हें उसी हाल में छोड़ दो।
लड़ो नहीं शांत हो जाओ, ना कोई हड़कंप मचाओ,
अपेक्षा ही दुःख का कारण है; ऐसे लोगों से मत लगाओ।
ढाल बनकर जल्लाद बचाकर
जन धन गवांकर क्या पाया?
रक्तपात मचाकर क्या पाया,
जल्लाद बचाकर क्या पाया?
अब तो खुद को संभालो आप
अपनी पीढ़ियां बचा लो आप?
नीच से अपेक्षा के आदि
अब तो होश में आओ आप।
सुनो, शांत हो जाओ!
अपनी आन बान शान का सर्टिफिकेट
ऐसे नीच को मत थमाओ आप…!!
Author: AK
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