बिहार के मढ़ौरा में बना डीजल रेल इंजन अब अफ्रीकी देश गिनी को भेजा जाएगा। यह पहली बार है जब राज्य से होगा लोकोमोटिव का वैश्विक निर्यात।
Bihar-Made Rail Engine to Be Exported to Guinea on June 20
बिहार में बना रेल इंजन अब दौड़ेगा अफ्रीका में: पहली बार गिनी को होगा निर्यात
देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास के साथ-साथ अब बिहार भी वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने को तैयार है। बिहार के छपरा जिले के मढ़ौरा स्थित वेबटेक डीजल लोकोमोटिव फैक्ट्री से तैयार हुआ रेल इंजन अब पश्चिम अफ्रीकी देश गिनी को निर्यात किया जाएगा। यह ऐतिहासिक क्षण 20 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इंजन की पहली खेप को रवाना करने के साथ दर्ज होगा।
यह केवल एक लोकोमोटिव का निर्यात नहीं है, बल्कि यह “मेक इन इंडिया” को “मेक इन बिहार – मेक फॉर द वर्ल्ड” के नारे में बदलने का प्रतीक भी है। इस परियोजना से बिहार की नई औद्योगिक पहचान उभर कर सामने आ रही है।
मेक इन बिहार की नई उड़ान
मढ़ौरा बना औद्योगिक क्रांति का केंद्र
छपरा जिले के मढ़ौरा में स्थित यह लोकोमोटिव फैक्ट्री वेबटेक इंक (Wabtec Inc) और भारतीय रेलवे के संयुक्त उपक्रम से संचालित होती है। वर्ष 2018 में स्थापित इस संयंत्र में अब तक 729 आधुनिक डीजल इंजन का निर्माण हो चुका है।
- इनमें 4500 हॉर्सपावर के 545 इंजन और
- 6000 हॉर्सपावर के 184 इंजन शामिल हैं।
इस फैक्ट्री की ताकत और गुणवत्ता अब देश के भीतर ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में पहचानी जाने लगी है।
पहली बार भारत से वैश्विक बाजार में लोकोमोटिव निर्यात
यह पहली बार है जब भारत के किसी राज्य से वैश्विक बाजार के लिए इस पैमाने पर लोकोमोटिव इंजनों का निर्माण और निर्यात किया जा रहा है। यह बिहार के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है और इससे राज्य के औद्योगिक विकास को नई दिशा मिलेगी।
गिनी के साथ 3000 करोड़ की डील
26 मई को गिनी के तीन मंत्रियों ने मढ़ौरा स्थित संयंत्र का दौरा किया था। इस दौरान 140 लोकोमोटिव इंजनों की एक महत्वपूर्ण डील पर मुहर लगी, जिसे ‘कोमो’ नाम दिया गया है। इस डील की अनुमानित लागत लगभग 3000 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
इस डील के तहत गिनी को अगले कुछ वर्षों में आधुनिक, शक्तिशाली और टिकाऊ डीजल रेल इंजन भेजे जाएंगे।
संयंत्र की तकनीकी क्षमता और वैश्विकरण
संयंत्र की विस्तारित क्षमता और गुणवत्ता
226 एकड़ में फैला यह संयंत्र तकनीकी दृष्टि से अत्याधुनिक है। यहां उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले लगभग 40 से 50 प्रतिशत पार्ट्स देश के अलग-अलग राज्यों से आते हैं जैसे:
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- तमिलनाडु
- दिल्ली
- झारखंड (जमशेदपुर)
कुछ विशेष उपकरण अमेरिका से भी मंगाए जाते हैं। लेकिन अब निर्यात के बढ़ते दबाव को देखते हुए संयंत्र ग्लोबल स्टैंडर्ड गेज इंजनों का उत्पादन और क्षमता विस्तार तेजी से कर रहा है।
बिहार को मिलेगा औद्योगिक मानचित्र पर नया स्थान
स्थानीय विकास और रोजगार के अवसर
यह फैक्ट्री केवल मशीनों का निर्माण नहीं कर रही, बल्कि यह बिहार के युवाओं को तकनीकी और व्यावसायिक रोजगार भी उपलब्ध करा रही है। हजारों स्थानीय श्रमिक, इंजीनियर, तकनीशियन और सप्लायर्स इस परियोजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
इस संयंत्र से जुड़े कुछ प्रमुख लाभ:
- स्थानीय युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण और नौकरी
- स्थानीय सप्लाई चेन और MSME को मजबूती
- बिहार में निवेश और बुनियादी ढांचे को प्रोत्साहन
- अंतरराष्ट्रीय निर्यात से भारत को विदेशी मुद्रा की आमद
मेक इन इंडिया और विकसित बिहार का संयुक्त विजन
केंद्र और राज्य सरकार की भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मेक इन इंडिया” विजन को इस परियोजना से बिहार में जमीन मिली है, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के “विकसित बिहार” के सपने को भी इससे गति मिल रही है। दोनों ही सरकारें इस संयंत्र को वैश्विक हब बनाने के लिए आवश्यक नीतिगत समर्थन और बुनियादी ढांचा दे रही हैं।
सरकार की मुख्य पहल:
- रेल मंत्रालय और राज्य सरकार की संयुक्त निगरानी
- इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार और सड़क संपर्क
- भूमि, बिजली और तकनीकी सहयोग
- औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन
गिनी को निर्यात किए जा रहे इंजन केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि यह भारत की निर्माण क्षमता, तकनीकी गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में हिस्सेदारी का भी प्रतीक हैं। इस निर्यात के माध्यम से भारत, विशेषकर बिहार, अब ‘मैन्युफैक्चरिंग फॉर द वर्ल्ड’ की राह पर आगे बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
बिहार का मढ़ौरा संयंत्र आज देश की औद्योगिक पहचान बन चुका है। पहली बार बिहार जैसे राज्य से इतने बड़े स्तर पर किसी अफ्रीकी देश को रेल इंजन का निर्यात हो रहा है। यह न केवल भारत के तकनीकी कौशल का परिचायक है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि छोटे शहर और राज्य भी वैश्विक विकास की दौड़ में भागीदार बन सकते हैं।
20 जून को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली खेप को रवाना करेंगे, तो यह सिर्फ एक इंजन की डिलीवरी नहीं होगी, बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम होगा — एक ऐसा कदम जो भविष्य में भारत और बिहार दोनों को वैश्विक विनिर्माण मानचित्र पर स्थापित करेगा।
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Author: AK
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