मां, एक ऐसा शब्द जिसमें संपूर्ण सृष्टि समाई है। उसी मां के जीवन के गहरे संघर्ष, त्याग और आत्मबल को स्वर देती एक हृदयस्पर्शी कविता “क्योंकि मां हूं” इन दिनों चर्चा में है। यह रचना मगध विश्वविद्यालय, बोधगया (बिहार) के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की अनुसंधायिका मानसी सिंह द्वारा लिखी गई है।
इस कविता में मां की उस जुझारू प्रवृत्ति को दर्शाया गया है, जो न थकती है, न झुकती है, और न ही टूटती है। वह कमजोर होते हुए भी दूसरों का संबल बनती है। सामाजिक कटाक्ष, तिरस्कार, गालियाँ और यहां तक कि उपेक्षा भी उसकी सहनशक्ति को तोड़ नहीं पाते। मां, जो खुद खंडहर हो जाए, फिर भी अपने टूटे अस्तित्व से दूसरों को छांव देने की कोशिश करती है।
मानसी सिंह ने कविता के माध्यम से उन स्त्रियों की आवाज़ बुलंद की है, जो समाज में मां होने के नाते तमाम विषमताएं सहती हैं पर अपने आत्मसम्मान और कर्तव्य को नहीं छोड़तीं। यह कविता न केवल एक साहित्यिक अभिव्यक्ति है, बल्कि आज की सामाजिक संरचना पर गहरा प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है।
कविता का एक अंश —
“हिम्मत नहीं तिनके हटाए, पर चट्टानों से टकराती है
एक मां हूं सोचकर कई दफा, वो ऐसा कर जाती है।”
क्योंकि मां हूं
हिम्मत नहीं खड़ा होने की
फिर भी दौड़ लगाती है,
क्यूंकि एक मां हूं ऐसा सोचकर
फिर आगे बढ़ जाती है।
हिम्मत नहीं तिनके हटाए
पर चट्टानों से टकराती है
एक मां हूं सोचकर कई दफा
वो ऐसा कर जाती है ।
कड़वे शब्द भी चुभ जाते हैं
गाली;मार तक खा जाती है
एक मां हूं सोचकर कई दफा
सब सहन कर जाती है।
तिरछी नजरें भी भाती नहीं,
वो लांछन तक सह जाती है,
क्योंकि एक मां हूं ऐसा सोचकर
खून का घूंट पी जाती है।
जिनकी कोई औकात नहीं
बराबरी की कोई बात नहीं
बिन बैसाखी खड़े भी रह लें,
जिनकी ऐसी हालात नहीं।
एक मां हूं सोचकर इसीलिए,
उन जैसों को झेल जाती है।
वो कहती है मुझमें ख़ुद्दारी है
खून में वफादारी है
इसीलिए इन छलियों संग भी
अपना जीवन बिताती है।
मैं एक मां हूं ऐसा सोचकर
हर दर्द सहन कर जाती है।
जब हो कोई बुलंद ईमारत
फिर कौन उससे टकराता है,
पर टूटे घरों का एक-एक ईंट भी
कोई उठा ले जाता है।
है चीखता खंडहर मुझे बचा लो;
कौन बचाने जाता है…?
किसको कितना दोष दे कोई
शायद ईश्वर का ही लीला है,
कोई दुःख देकर भी सुखी है तो
कोई भला करके भी
किस्मत पर पछताता है।
है कलयुग का खेल निराला,
जो जितना करता उतना पछताता
एक बेसहारा रहती इस जग मे,
हैं कौन उसका; जो दर्द पढ़ पाता…!
यह पंक्तियाँ मां की उस भावना को दर्शाती हैं, जिसमें वो स्वयं को कमज़ोर मानते हुए भी अपने बच्चों, परिवार और समाज के लिए हर मोर्चे पर डटी रहती है।
मानसी सिंह की यह रचना न केवल पाठकों को झकझोरती है बल्कि उन्हें मां के उस अज्ञात दर्द से भी परिचित कराती है, जो अक्सर समाज की आपाधापी में अनदेखा रह जाता है।
Author: AK
! Let us live and strive for freedom ! Freelance Journalist ! Politics ! News Junky !












