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Climate Change Health Impact: गर्म रातों ने छीनी लोगों की नींद, भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्म रातों से लोगों की नींद प्रभावित हो रही है। नई रिपोर्ट में भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल बताया गया है। Hot Nights Causing Sleep Loss, India Among Worst Affected गर्म रातों ने छीनी लोगों की नींद, भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल जलवायु परिवर्तन का असर … Read more

Hot Nights Causing Sleep Loss, India Among Worst Affected

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्म रातों से लोगों की नींद प्रभावित हो रही है। नई रिपोर्ट में भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल बताया गया है।

Hot Nights Causing Sleep Loss, India Among Worst Affected


गर्म रातों ने छीनी लोगों की नींद, भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल तापमान बढ़ने या मौसम में बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है। इसका प्रभाव लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। हाल ही में सामने आई एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में बढ़ती गर्म रातों के कारण लोग पहले की तुलना में कम सो पा रहे हैं। यह समस्या अब वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता बनती जा रही है।

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क्लाइमेट सेंट्रल की नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की वजह से रात का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे दुनिया भर के लोगों की औसतन 56 घंटे की वार्षिक नींद कम हो रही है। रिपोर्ट में भारत को उन देशों में शामिल किया गया है, जहां इस समस्या का प्रभाव सबसे अधिक देखा गया है। विशेष रूप से दक्षिण भारत और तटीय शहरों के लोग हर साल 90 घंटे से भी अधिक नींद खो रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार गर्म रहने वाली रातें शरीर के प्राकृतिक तापमान नियंत्रण को प्रभावित करती हैं। इसका असर नींद की गुणवत्ता, मानसिक स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और कई गंभीर बीमारियों के जोखिम पर भी पड़ सकता है।

क्या कहती है क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट?

क्लाइमेट सेंट्रल ने दुनिया के 1,338 शहरों का विस्तृत अध्ययन किया। इस अध्ययन में विभिन्न देशों के तापमान के आंकड़ों और रात के न्यूनतम तापमान में हुए बदलावों का विश्लेषण किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1970 के दशक की तुलना में वर्तमान समय में गर्म रातों के कारण होने वाली नींद की कमी लगभग दोगुनी हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान है।

रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के करोड़ों लोग अब ऐसी रातों का सामना कर रहे हैं, जिनमें शरीर को पर्याप्त ठंडक नहीं मिल पाती और गहरी नींद लेना कठिन हो जाता है।

गर्म रातें क्यों बन रही हैं चिंता का विषय?

दिन के समय बढ़ती गर्मी से बचने के लिए लोग छाया, पंखे या एयर कंडीशनर का सहारा ले सकते हैं, लेकिन रात के समय शरीर को स्वाभाविक रूप से ठंडा होना जरूरी होता है।

शरीर का तापमान और नींद

सोते समय शरीर का तापमान थोड़ा कम होना चाहिए। यही प्रक्रिया गहरी और आरामदायक नींद के लिए आवश्यक होती है।

जब रात का तापमान अधिक रहता है, तो शरीर पर्याप्त रूप से ठंडा नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप—

  • नींद आने में अधिक समय लगता है।
  • बार-बार नींद खुलती है।
  • गहरी नींद की अवधि कम हो जाती है।
  • सुबह थकान महसूस होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार ऐसी स्थिति बने रहने पर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

किन क्षेत्रों में सबसे अधिक असर?

रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे गर्म क्षेत्रों में रहने वाले लोग इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—

  • मध्य पूर्व
  • दक्षिण एशिया
  • दक्षिण-पूर्व एशिया
  • पश्चिम अफ्रीका

इन क्षेत्रों में रात का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे लोगों की नींद पर गंभीर असर पड़ रहा है।

भारत पर सबसे ज्यादा प्रभाव क्यों?

रिपोर्ट में भारत को सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल किया गया है।

भारत के दक्षिणी और तटीय क्षेत्रों में पहले से ही आर्द्रता अधिक रहती है। जब तापमान और नमी दोनों बढ़ जाते हैं, तब शरीर से गर्मी निकलना और भी कठिन हो जाता है। यही कारण है कि यहां के लोगों को गर्म रातों में अधिक परेशानी होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कई शहरों में लोगों को हर वर्ष 90 घंटे तक कम नींद मिल रही है।

भारत के सबसे अधिक प्रभावित शहर

रिपोर्ट में कई भारतीय शहरों का विशेष उल्लेख किया गया है।

सबसे अधिक प्रभावित शहरों में शामिल हैं—

  • चेन्नई
  • नेल्लोर
  • पुडुचेरी
  • तिरुचिरापल्ली
  • कोच्चि
  • कोझिकोड
  • गुंटूर

इन शहरों में रहने वाले लोगों को हर साल लगभग 90 से 93 घंटे तक नींद का नुकसान हो रहा है।

इसके अलावा—

  • मुंबई में लगभग 84 घंटे
  • विशाखापत्तनम में लगभग 87 घंटे

की औसत वार्षिक नींद की कमी दर्ज की गई है।

इसके विपरीत अपेक्षाकृत ठंडे क्षेत्रों में यह प्रभाव कम दिखाई देता है। उदाहरण के लिए श्रीनगर में प्रति वर्ष लगभग 27 घंटे की नींद की कमी दर्ज की गई।

भारत में रातें क्यों हो रही हैं अधिक गर्म?

विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ दशकों में भारत में रात के न्यूनतम तापमान में लगातार वृद्धि हुई है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—

  • वर्ष 1991 से 2020 के बीच औसत न्यूनतम रात का तापमान लगभग 19.3 डिग्री सेल्सियस था।
  • वर्ष 2024 में यह बढ़कर लगभग 20.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

यह पिछले एक सदी से भी अधिक समय में दर्ज सबसे अधिक औसत रात का तापमान माना जा रहा है।

इसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, कंक्रीट संरचनाओं की बढ़ती संख्या और हरित क्षेत्रों में कमी से जोड़ा जा रहा है।

कम नींद का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार कम नींद लेने से शरीर और दिमाग दोनों प्रभावित होते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य

पर्याप्त नींद न मिलने से—

  • तनाव बढ़ सकता है।
  • चिंता और अवसाद का खतरा बढ़ सकता है।
  • एकाग्रता कमजोर हो सकती है।

शारीरिक स्वास्थ्य

लंबे समय तक कम नींद लेने से—

  • उच्च रक्तचाप
  • मधुमेह
  • हृदय रोग
  • मोटापा
  • कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली

जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।

बच्चों और बुजुर्गों पर अधिक असर

बच्चे, बुजुर्ग और पहले से बीमार लोग गर्म रातों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इन वर्गों में पर्याप्त नींद न मिलने का असर स्वास्थ्य पर अधिक गंभीर हो सकता है।

शहरी क्षेत्रों में समस्या ज्यादा क्यों?

बड़े शहरों में “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।

कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें, वाहनों से निकलने वाली गर्मी और हरियाली की कमी के कारण शहर दिनभर गर्म रहते हैं और रात में भी जल्दी ठंडे नहीं हो पाते।

इसी वजह से महानगरों में रहने वाले लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म रातों का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञ क्या सलाह देते हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि व्यक्तिगत स्तर पर कुछ सावधानियां अपनाकर गर्म रातों के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

इनमें शामिल हैं—

  • सोने से पहले कमरे को ठंडा रखने का प्रयास करें।
  • पर्याप्त पानी पीते रहें।
  • हल्के और सूती कपड़े पहनें।
  • सोने से पहले भारी भोजन से बचें।
  • कमरे में उचित वेंटिलेशन बनाए रखें।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह केवल अस्थायी उपाय हैं। स्थायी समाधान जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने और शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने से ही संभव होगा।

जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बड़ी चेतावनी

यह रिपोर्ट केवल नींद की समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन अब मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को भी प्रभावित करने लगा है।

यदि वैश्विक तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में गर्म रातों की संख्या और अधिक बढ़ सकती है। इसका प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं, कार्यक्षमता, उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता पर भी दिखाई देगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारों, वैज्ञानिकों और समाज को मिलकर ऐसे उपाय करने होंगे, जिनसे कार्बन उत्सर्जन कम हो, शहर अधिक हरित बनें और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सीमित किया जा सके।

निष्कर्ष

क्लाइमेट सेंट्रल की नई रिपोर्ट यह स्पष्ट संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे मानव स्वास्थ्य और जीवनशैली को प्रभावित कर रहा है। गर्म रातों के कारण लोगों की नींद कम हो रही है और भारत इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है। विशेष रूप से दक्षिण और तटीय शहरों में रहने वाले लोगों के लिए यह चिंता का विषय बन चुका है।

भविष्य में इस समस्या से निपटने के लिए केवल व्यक्तिगत उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी नियंत्रण, टिकाऊ शहरी विकास, अधिक हरियाली और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। तभी आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ वातावरण और बेहतर जीवन गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकेगी।

AK
Author: AK

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