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Supreme Court Calls Homemakers ‘Nation Builders: गृहिणियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- 30 हजार रुपये महीने की है घर संभालने की कीमत

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ बताते हुए उनके घरेलू कार्य का न्यूनतम मूल्य 30 हजार रुपये प्रतिमाह माना। जानिए फैसले का महत्व। Supreme Court Calls Homemakers ‘Nation Builders’, Fixes ₹30,000 Monthly Value गृहिणियों के सम्मान में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में गृहिणियों की भूमिका … Read more

Supreme Court Calls Homemakers ‘Nation Builders’, Fixes ₹30,000 Monthly Value

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ बताते हुए उनके घरेलू कार्य का न्यूनतम मूल्य 30 हजार रुपये प्रतिमाह माना। जानिए फैसले का महत्व।

Supreme Court Calls Homemakers ‘Nation Builders’, Fixes ₹30,000 Monthly Value

Supreme Court Calls Homemakers ‘Nation Builders’, Fixes ₹30,000 Monthly Value

गृहिणियों के सम्मान में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में गृहिणियों की भूमिका को नई पहचान देते हुए उन्हें “राष्ट्र निर्माता” बताया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि घर और परिवार की देखभाल करने वाली महिलाओं के योगदान को केवल भावनात्मक या सामाजिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता, बल्कि उनके श्रम का आर्थिक मूल्य भी है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी गृहिणी की घरेलू सेवाओं का मूल्यांकन कम से कम 30 हजार रुपये प्रतिमाह के आधार पर किया जाना चाहिए।

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यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि समाज में गृहिणियों के योगदान को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि घर संभालने वाली महिलाओं के काम को आर्थिक दृष्टि से क्यों नहीं आंका जाता। अब सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी ने इस विषय को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला पंजाब में वर्ष 2001 में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा था। दुर्घटना में एक महिला की मृत्यु हो गई थी। महिला के पति और तीन बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण के समक्ष मुआवजे की मांग की थी।

शुरुआत में न्यायाधिकरण ने परिवार को लगभग 2.42 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। बाद में हाई कोर्ट ने इस राशि को बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दिया और उस पर ब्याज देने का भी निर्देश दिया। हालांकि परिवार इस राशि से संतुष्ट नहीं था और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने केवल मुआवजे की राशि पर ही विचार नहीं किया, बल्कि एक व्यापक प्रश्न उठाया कि गृहिणी के कार्य का वास्तविक आर्थिक मूल्य क्या है और उसे कैसे आंका जाना चाहिए।

गृहिणियों को बताया ‘राष्ट्र निर्माता’

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि गृहिणियां केवल घर का काम नहीं करतीं, बल्कि वे समाज और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बच्चों के पालन-पोषण, परिवार के संचालन और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

अदालत ने कहा कि किसी भी परिवार की सफलता और स्थिरता के पीछे गृहिणी की भूमिका सबसे अहम होती है। इसलिए उन्हें केवल “हाउसवाइफ” या “होममेकर” कहकर सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें “राष्ट्र निर्माता” के रूप में सम्मान दिया जाना चाहिए।

क्यों महत्वपूर्ण है यह शब्द?

“राष्ट्र निर्माता” शब्द का उपयोग केवल सम्मान देने के लिए नहीं किया गया है। इसके पीछे यह विचार है कि देश के भविष्य का निर्माण बच्चों और परिवारों के माध्यम से होता है और इस प्रक्रिया में गृहिणियों की भूमिका केंद्रीय होती है।

जब कोई महिला अपने परिवार की देखभाल करती है, बच्चों को संस्कार देती है और घर का संचालन करती है, तब वह अप्रत्यक्ष रूप से देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में योगदान दे रही होती है।

घरेलू काम को आर्थिक मूल्य क्यों मिलना चाहिए?

घर संभालना भी फुल-टाइम जॉब

बहुत से लोग यह मानते हैं कि गृहिणियां घर पर रहती हैं और कोई नौकरी नहीं करतीं। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। सुबह से रात तक घर के काम, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, भोजन तैयार करना, घर का बजट संभालना और कई अन्य जिम्मेदारियां एक गृहिणी निभाती है।

यदि इन सभी कामों के लिए अलग-अलग लोगों को नियुक्त किया जाए तो उसका खर्च हजारों नहीं बल्कि लाखों रुपये तक पहुंच सकता है।

बिना वेतन के काम करती हैं करोड़ों महिलाएं

भारत में करोड़ों महिलाएं ऐसी हैं जो किसी वेतन या आर्थिक लाभ के बिना पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभालती हैं। उनके काम का मूल्यांकन अक्सर नहीं किया जाता क्योंकि यह औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं माना जाता।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी मानसिकता को चुनौती देते हुए कहा कि गृहिणियों के श्रम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

GDP में भी है बड़ा योगदान

अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका

अदालत ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अवैतनिक देखभाल कार्य भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि घरेलू कामकाज और देखभाल संबंधी सेवाओं को आर्थिक मूल्य में बदला जाए तो यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 15 से 17 प्रतिशत तक योगदान कर सकता है।

इसके बावजूद यह श्रम अदृश्य बना रहता है क्योंकि इसके बदले कोई वेतन नहीं दिया जाता।

अदृश्य श्रम की पहचान

गृहिणियों के काम को अक्सर परिवार का कर्तव्य मान लिया जाता है। लेकिन यह श्रम समय, ऊर्जा और कौशल की मांग करता है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में अब घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्य पर गंभीर चर्चा हो रही है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मुआवजा मामलों पर क्या असर पड़ेगा?

नया मानक तय

अब तक सड़क दुर्घटनाओं में मृत गृहिणियों के मामलों में मुआवजा तय करते समय न्यूनतम मजदूरी को आधार बनाया जाता था। कई बार उन्हें अकुशल श्रमिकों की श्रेणी में रखकर उनकी काल्पनिक आय निर्धारित की जाती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि गृहिणियों के योगदान का मूल्यांकन अधिक सम्मानजनक और वास्तविक आधार पर होना चाहिए।

इसीलिए अदालत ने न्यूनतम 30 हजार रुपये प्रतिमाह का मानक निर्धारित करने की बात कही।

परिवारों को मिलेगा लाभ

इस फैसले का सीधा लाभ उन परिवारों को मिलेगा जो सड़क दुर्घटनाओं या अन्य मामलों में अपनी गृहिणी सदस्य को खो देते हैं। अब मुआवजे की गणना करते समय उनके योगदान को अधिक गंभीरता से लिया जाएगा।

इससे न्याय प्रक्रिया अधिक संवेदनशील और वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप बन सकेगी।

समाज के लिए क्या संदेश?

सोच बदलने की जरूरत

यह फैसला केवल अदालत तक सीमित नहीं है। इसका एक बड़ा सामाजिक संदेश भी है। वर्षों से घर संभालने वाली महिलाओं के काम को कमतर आंका जाता रहा है। कई बार उन्हें “काम नहीं करने वाली” महिला कहा जाता है, जबकि वे पूरे परिवार की रीढ़ होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस सोच को बदलने की दिशा में एक मजबूत संदेश देती है।

महिलाओं को मिलेगा सम्मान

गृहिणियों को आर्थिक मूल्य और सामाजिक सम्मान देना लैंगिक समानता की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। इससे समाज में महिलाओं की भूमिका को अधिक गंभीरता से समझने में मदद मिलेगी।

मोटर दुर्घटना मामलों में देरी पर भी चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने पर भी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही विभिन्न उच्च न्यायालयों को निर्देश दिए गए कि वे लंबित मामलों की नियमित निगरानी करें और जल्द सुनवाई सुनिश्चित करें।

अदालत का मानना है कि दुर्घटना पीड़ित परिवार पहले ही कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं, इसलिए उन्हें न्याय के लिए वर्षों तक इंतजार नहीं करना चाहिए।

महिलाओं के योगदान को नई पहचान

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल कानूनी दृष्टि से नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी ऐतिहासिक माना जा रहा है। पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि गृहिणियां राष्ट्र निर्माण में प्रत्यक्ष भूमिका निभाती हैं और उनके श्रम का सम्मान होना चाहिए।

यह निर्णय उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है जो वर्षों से बिना किसी आर्थिक पहचान के अपने परिवारों की जिम्मेदारी निभा रही हैं।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” की संज्ञा देना भारतीय न्यायपालिका की एक दूरदर्शी पहल है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि घर संभालना कोई साधारण काम नहीं, बल्कि एक पूर्णकालिक जिम्मेदारी है जिसका आर्थिक और सामाजिक महत्व दोनों हैं।

गृहिणियों के योगदान को न्यूनतम 30 हजार रुपये प्रतिमाह के मूल्य के साथ स्वीकार करने का संदेश समाज की सोच बदलने की क्षमता रखता है। यह फैसला न केवल मुआवजा मामलों में नई दिशा देगा बल्कि उन करोड़ों महिलाओं को भी सम्मान दिलाने में मदद करेगा, जिनका श्रम अब तक अनदेखा किया जाता रहा है।

AK
Author: AK

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