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“अनायास यातना” – एक भावनात्मक अभिव्यक्ति

अनायास यातना" – एक भावनात्मक अभिव्यक्ति
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यह कविता समाज में व्याप्त अन्याय, पीड़ा और असमानता को गहरे स्तर पर महसूस करते हुए लिखी गई है। कवयित्री मानसी सिंह ने इसमें जीवन के संघर्ष, ईमानदारी की दंडस्वरूप दुर्दशा और अच्छाई की बेबसी को बेहद मार्मिक तरीके से उकेरा है।

अनायास यातना

कौन से पापों के हम साझेदार हो गए? जो जीवन में जिंदगी बेकार हो गई? सुना है कर्मों का फल मिलता जरूर है पर किन कर्मों के कारण जीवन दुश्वार हो गया।

यह भी सुना है वो अच्छों को सताता है बेदर्द बन मासूमों को बहुत रुलाता है फिर कौन कहता है कि वो भगवान है, फिर वो ईश्वर कहां जल्लादों से भी बेकार है।

जब कुकर्मी सुख के सौदागर होने लगे, और इंसानों पर खुशियों ताले लग जाए। ज़ुल्मों सितम का पहाड़ उठाए सर पर, आख़िर   कोई   कब   तक   चले, जब जिंदगी अपने आप में सवाल बन जाए?

आशा की किरण हो ही नहीं जीवन में और जानवरों का अत्याचार बढ़ जाए कोई कितना संभाले अपने जज़्बात जब उसका धरा पर आना बेकार हो जाए।

सोचो! जब मनोभाव को संजोना पड़ जाए रो-रो कर दीपक जलाना पड़ जाए दुनियां से थककर दुनियादारी की चिंता क्या      गुजरेगी       दिल      पर, जब झूठी मुस्कान दिखाना पड़ जाए।

मेरा मन कहता है! ये पापों की सजा नहीं ईमानदारी और अच्छाई का अभिशाप है, ये   तो   कलयुग    का   प्रभाव   है, जिसमें कुचलता इंसानों का अरमान है।

फ़िर ये मन धिक्कारता है! कि सब जानकर भी तू क्यों अनजान है, हे कलयुगी! तेरा क्यूं सतयुगी भान है? आज पापी ही पुष्पित पल्लवित होंगे, इतनी जल्दी वो धराशाई कैसे होंगे ? क्यूंकि  द्वापर  में  भी  कृष्ण  ने सौ के बाद ही शिशुपाल को मारा था।

सच से  जिसका नाता नहीं ना इंसानियत से सरोकार है जख्मों पर   नमक   लगाना जानवरों की नियत में सुमार है।

इनके कारण ही यहां दर्द बेशुमार है इंसा   खुद   को  कोस  रहा की आख़िर ऐसा क्या किया, देख कर दिल  कराह  उठता, हाय! ये ज़िंदगी जीवन से नाराज है।

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मुख्य भाव:

  • कर्मों के फल और ईश्वर की न्यायप्रियता पर प्रश्नचिह्न
  • अच्छाई और ईमानदारी के प्रति समाज का निष्ठुर रवैया
  • कलयुग में पापियों का उन्नति पाना और सतयुग की आदर्श सोच का उपहास
  • अन्याय सहने वालों का अंतहीन संघर्ष और समाज की क्रूरता

विशेषता:
इस रचना में दार्शनिकता और यथार्थवाद का अद्भुत समावेश है। प्रतीकों और ऐतिहासिक संदर्भों (जैसे शिशुपाल की कथा) का प्रयोग इसे और प्रभावी बनाता है। यह कविता पाठक को आत्ममंथन करने पर विवश करती है और एक वैचारिक उथल-पुथल उत्पन्न करती है।

कुल मिलाकर, यह कविता समाज के कटु सत्य और मानवीय पीड़ा का आईना है, जो दिल को झकझोर कर रख देती है।

मानसी सिंह (अनुसंधायिका)
    स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
    मगध विश्वविद्यालय बोधगया,(बिहार)।

AK
Author: AK

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