उत्तराखंड CM पुष्कर सिंह धामी ने खटीमा में किसान बनकर बैलों से खेत जोता और धान की रोपाई कर पुराने दिनों की यादें ताजा कीं।
CM Dhami Turns Farmer, Ploughs Field with Oxen and Plants Paddy
खेतों में सीएम धामी: एक मुख्यमंत्री, एक किसान और एक संस्कार
जब मुख्यमंत्री ने पकड़ी हल की मूठ और याद किए बचपन के दिन
राजनीति में अक्सर नेता लोगों से जुड़ने की बात तो करते हैं, लेकिन जब वही नेता खुद मिट्टी में उतरकर किसान के रूप में खेत में हल चलाए, तो यह दृश्य लोगों के दिलों को छू जाता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यही कर दिखाया। अपने कार्यकाल के चार साल पूरे होने के बाद, 5 जुलाई 2025 को उन्होंने अपने गृह क्षेत्र खटीमा के नगरा तराई गांव में पारंपरिक किसान के रूप में खेतों में बैल से हल चलाया और फिर खुद धान की रोपाई की।
इस दृश्य ने न केवल ग्रामीणों का उत्साह बढ़ाया, बल्कि पूरे राज्य में एक सकारात्मक संदेश दिया कि मुख्यमंत्री आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं।
खेतों में सीएम: केवल प्रतीकात्मकता नहीं, भावनात्मक जुड़ाव
किसानों के बीच जाकर जताया सम्मान
सीएम धामी ने हल उठाकर और मिट्टी में अपने हाथ रंगकर यह दिखाया कि किसान केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि देश की आत्मा हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा, “खेतों में उतरकर पुराने दिनों की यादें ताजा हो गईं। अन्नदाता हमारे देश की रीढ़ हैं, संस्कृति और परंपरा के संवाहक हैं।”
इस दौरान खेतों में धामी के साथ स्थानीय किसान, गांव के बुजुर्ग और बच्चे भी मौजूद थे, जिनके चेहरे पर मुख्यमंत्री को खेतों में देखकर गर्व की झलक थी।
हल चलाने और धान रोपने का दृश्य: परंपरा की पुनःस्थापना
बैलों से जोतना सिर्फ खेती नहीं, संस्कृति से जुड़ाव भी
सीएम धामी ने जिस पारंपरिक तरीके से हल चलाया, वह उत्तर भारत के ग्रामीण जीवन में कृषि परंपरा की याद दिलाता है। आज जहां ट्रैक्टर और आधुनिक यंत्रों का युग है, वहां एक मुख्यमंत्री द्वारा बैल से खेत जोतना अपने आप में अनोखा दृश्य था। यह केवल लोकसांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था कि परंपरा और प्रगति एक साथ चल सकते हैं।
“हुड़किया बौल” और देवताओं की वंदना
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड की पारंपरिक लोक शैली ‘हुड़किया बौल’ के माध्यम से भूमि, जल और छाया के देवताओं—भूमियां, इंद्र और मेघ—की वंदना भी की। यह उत्तराखंड की लोकआस्था और कृषि परंपरा को सम्मान देने का प्रतीक था।
चार साल का कार्यकाल: सेवा, विकास और जनसंपर्क
हरिद्वार में की पूजा, खटीमा में धरती को नमन
4 जुलाई को सीएम धामी ने अपने कार्यकाल के चार साल पूरे होने के उपलक्ष्य में हरिद्वार के हर की पौड़ी पर पूजा-अर्चना की और राज्य की समृद्धि के लिए प्रार्थना की। इसके तुरंत बाद वे अपने पैतृक स्थान खटीमा लौट आए, जहां उन्होंने अगली सुबह किसानों के साथ खेत में काम कर धरती को प्रणाम किया।
साथ रहे प्रमुख नेता
हरिद्वार पूजा के दौरान सीएम धामी के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री और हरिद्वार के पूर्व सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, राज्यसभा सदस्य कल्पना सैनी, विधायक मदन कौशिक और आदेश चौहान भी उपस्थित रहे। पूजा अनुष्ठान आचार्य अमित शास्त्री की देखरेख में संपन्न हुआ।
क्यों अहम है यह कदम?
कृषि से सीधे जुड़ाव का संकेत
जब कोई मुख्यमंत्री खुद खेती करता है, तो वह सिर्फ राजनीतिक संदेश नहीं देता, बल्कि अपने राज्य की सबसे बड़ी आबादी—किसानों—के साथ सीधा जुड़ाव बनाता है। उत्तराखंड, एक पहाड़ी राज्य होने के बावजूद, तराई क्षेत्र में बड़ी संख्या में किसान खेती से जुड़े हैं। धान, गेहूं, मक्का, और दालें इस क्षेत्र की प्रमुख फसलें हैं।
धामी का यह कदम किसानों को यह विश्वास दिलाता है कि उनकी समस्याओं, संघर्षों और श्रम को राज्य का शीर्ष नेतृत्व न केवल समझता है, बल्कि स्वयं उस जीवन को जी चुका है।
किसानों की प्रतिक्रिया: गर्व और उम्मीद
“हमारा बेटा फिर से मिट्टी में आया”
स्थानीय किसानों ने मुख्यमंत्री को देखकर कहा, “हमारे गांव का बेटा आज भी अपनी जमीन और परंपराओं से जुड़ा है। हमें गर्व है कि ऐसा मुख्यमंत्री हमारे राज्य को चला रहा है।”
बच्चों के लिए प्रेरणा
सीएम धामी का खेतों में उतरना सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं रही, बल्कि गांव के युवाओं और बच्चों के लिए प्रेरणा बन गई। बच्चे खेत के किनारे खड़े होकर उत्साह से सीएम को हल चलाते देख रहे थे।
राजनीति से परे एक मानवीय पहल
छवि नहीं, संवेदना
सीएम धामी का यह प्रयास महज एक इमेज बिल्डिंग एक्ट नहीं था, बल्कि उनके जीवन के मूल्यों और संस्कारों का प्रतिबिंब था। बचपन में गांव की मिट्टी में पले-बढ़े धामी जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने न केवल तरक्की का रास्ता चुना, बल्कि उस मूल भूमि को भी नहीं भूले जिसने उन्हें यह ऊंचाई दी।
निष्कर्ष: अन्नदाता को सम्मान और नेतृत्व का नया रूप
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा किसान बनकर खेत में बैल से हल चलाना और धान की रोपाई करना केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और राजनीतिक संदेश था। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब कोई नेता अपने अतीत और समाज की जड़ों से जुड़ा होता है, तब वह जनता के दिलों में जगह बना लेता है।
उनका यह कदम न केवल किसानों के परिश्रम को नमन है, बल्कि भावी पीढ़ियों को संवेदना और परंपरा से जोड़ने का एक मजबूत माध्यम भी।
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Author: AK
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