भारत पर अमेरिका का 50% टैरिफ लागू होने जा रहा है। जानिए ट्रंप के फैसले के पीछे की वजह, बातचीत कहां अटकी और अब आगे क्या हो सकता है?
50% Tariff on India: Why Did Trump Back Out of Trade Deal?
भारत पर अमेरिका का 50% टैरिफ: ट्रंप क्यों हुए नाराज़?
परिचय: भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का नया संकट
भारत और अमेरिका के बीच दशकों से मजबूत होते व्यापारिक रिश्तों को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% तक टैरिफ लगाने का एलान कर दिया। यह निर्णय ऐसे समय आया जब दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल बीते छह महीनों से व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए गहन वार्ताएं कर रहे थे। सवाल उठता है कि आखिर वह कौन-से मुद्दे थे जहां बातचीत अटक गई, और ट्रंप ने इस स्तर पर नाराज़गी क्यों दिखाई?

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की शुरुआत कैसे हुई?
फरवरी से शुरू हुई थी बातचीत
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा राष्ट्रपति पद संभालने के कुछ सप्ताह बाद, फरवरी में भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता की पहल की। भारत चाहता था कि अमेरिका के साथ एक समावेशी व्यापार समझौता हो, जिससे दोनों देशों को लाभ मिले। इसके लिए पांच अलग-अलग चरणों में वार्ताएं हुईं, जिनमें से आखिरी बैठक हाल ही में समाप्त हुई।
अप्रैल में जेडी वैंस की भारत यात्रा
अप्रैल में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस भारत आए और प्रतिनिधिमंडल के साथ मिलकर वार्ता का खाका तैयार किया गया। इसमें भारत ने अमेरिका को कई क्षेत्रों में टैरिफ में छूट देने का प्रस्ताव दिया था, जैसे कि औद्योगिक उत्पादों और ऑटोमोबाइल्स पर टैक्स में कटौती।
भारत ने अमेरिका को क्या प्रस्ताव दिए थे?
औद्योगिक उत्पादों पर छूट
भारत ने अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों पर टैरिफ न लगाने का प्रस्ताव दिया, जो अमेरिका के कुल निर्यात का 40% हैं।
कार और एल्कोहल पर भी रियायत
भारत ने अमेरिका से आने वाली कारों और एल्कोहल पर टैरिफ कम करने पर सहमति जताई थी। इसके अलावा, भारत ने ऊर्जा और हथियारों की खरीद को 25 अरब डॉलर तक बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दिखाई थी।
टैरिफ कम करने की कोशिश
पांचवीं बैठक के दौरान भारत ने 10% तक बेस टैरिफ हटाने की पेशकश की और स्टील, एल्युमिनियम और ऑटो सेक्टर पर लगे टैरिफ को हटाने की बात भी उठाई।
फिर ट्रंप क्यों नाराज़ हुए?
दूसरे देशों से सफल समझौते का असर
अमेरिका ने हाल ही में वियतनाम, इंडोनेशिया और जापान जैसे देशों के साथ सफल व्यापार समझौते किए हैं। ट्रंप को लगा कि यदि ये देश उनकी शर्तों को मान सकते हैं तो भारत क्यों नहीं?
भारत की सीमित रियायतें
भारत, खासतौर से कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर काफी सतर्क रहा। अमेरिकी प्रशासन ने इन सेक्टरों में ज्यादा पहुंच की मांग की, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया। इससे ट्रंप को यह संदेश गया कि भारत उन्हें चुनावी तौर पर लाभ देने वाला ‘बड़ा समझौता’ नहीं देना चाहता।
राजनीतिक कारण भी बने बाधा
भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान ट्रंप की मध्यस्थता की कोशिशों को भारत ने सार्वजनिक रूप से नकार दिया। ट्रंप द्वारा लगातार खुद को संकट मोचक बताने की कोशिशों ने भी द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव बढ़ाया।
रूस से तेल खरीद पर अमेरिका की आपत्ति
नए टैरिफ का दूसरा पक्ष
ट्रंप प्रशासन ने यह भी एलान किया कि रूस से तेल खरीदने की वजह से भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा, जो 27 अगस्त से प्रभावी होगा। इस प्रकार कुल टैरिफ 50% तक पहुंच जाएगा।
भूराजनीतिक दबाव
अमेरिका नहीं चाहता कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता रहे, खासतौर से उस समय जब पश्चिमी देश रूस पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। भारत के इस रुख को ट्रंप ने ‘अमेरिका के खिलाफ’ निर्णय माना।
ट्रंप की ‘बड़ी डील’ की उम्मीदें और भारत की रणनीति
अमेरिकी चुनावों की रणनीति का हिस्सा
डोनाल्ड ट्रंप 2024 के राष्ट्रपति चुनावों से पहले एक मजबूत आर्थिक छवि पेश करना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें ऐसे समझौते चाहिए जहां वे अमेरिका को फायदे में दिखा सकें।
भारत का संतुलनकारी रुख
भारत ने हर समझौते को अपने राष्ट्रीय हितों के चश्मे से देखा। वह अपने किसानों, डेयरी उद्योग और ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में नहीं डालना चाहता था। यही कारण रहा कि भारत ने सीमित रियायतें ही दीं।
अब आगे क्या संभावना है?
अगस्त के मध्य में फिर बातचीत की तैयारी
हालांकि अमेरिका ने टैरिफ लागू करने का फैसला ले लिया है, लेकिन दोनों देशों के बीच अगस्त के मध्य में फिर से बातचीत होनी है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारत आएगा और नई शर्तों के साथ समाधान तलाशने की कोशिश की जाएगी।
भारत क्या कर सकता है?
भारत संभवतः कृषि और डेयरी सेक्टर में कुछ सीमित छूट दे सकता है। साथ ही वह रूस की जगह अमेरिका से ही ऊर्जा खरीद बढ़ाने का प्रस्ताव रख सकता है, ताकि अमेरिका को भूराजनीतिक दृष्टिकोण से संतुष्ट किया जा सके।
निष्कर्ष: व्यापारिक रिश्तों की परीक्षा की घड़ी
भारत और अमेरिका दोनों के लिए यह दौर एक महत्वपूर्ण मोड़ है। व्यापारिक रिश्तों में इस प्रकार का तनाव केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक स्तर पर भी असर डालता है। हालांकि, अब भी बातचीत की संभावनाएं जिंदा हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दोनों पक्ष लचीलापन दिखाएं तो यह मुद्दा जल्द सुलझाया जा सकता है। लेकिन अगर टैरिफ का यह दौर लंबा चला, तो इसका नुकसान दोनों देशों को होगा—खासकर उस समय जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है।
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Author: AK
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