केंद्र सरकार ने भारत में जातिगत जनगणना कराने को हरी झंडी दे दी है। यह जाति जनगणना दो चरणों में की जाएगी। गृह मंत्रालय ने बताया कि पहला फेज 1 अक्टूबर 2026 से शुरु होगा, जिसमें 4 पहाड़ी राज्य- हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं। 1 मार्च 2027 से दूसरा फेज शुरू होगा, जिसमें देश के बाकी राज्यों में जातीय जनगणना शुरू होगी। जनसंख्या की गणना कब से होगी, इसकी जानकारी 16 जून 2025 को आ सकती है। देशभर में जातिगत गणना की मांग काफी समय से उठती रही है। भारत में हर दस साल में जनगणना होती है। पहली जनगणना 1872 में हुई थी। 1947 में आजादी मिलने के बाद पहली जनगणना 1951 में हुई थी और आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी। आंकड़ों के मुताबिक, 2011 में भारत की कुल जनसंख्या 121 करोड़ थी, जबकि लिंगानुपात 940 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष और साक्षरता दर 74.04 फीसदी था। देश में जनगणना की शुरुआत 1881 में हुई थी। पहली बार हुई जनगणना में जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी हुए थे। इसके बाद हर दस साल पर जनगणना होती रही। 1931 तक की जनगणना में हर बार जातिवार आंकड़े भी जारी किए गए। 1941 की जनगणना में जातिवार आंकड़े जुटाए गए थे, लेकिन इन्हें जारी नहीं किया गया। आजादी के बाद से हर बार की जनगणना में सरकार ने सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के ही जाति आधारित आंकड़े जारी किए। अन्य जातियों के जातिवार आंकड़े 1931 के बाद कभी प्रकाशित नहीं किए गए। जनगणना कर्मचारी हर घर पहुंचकर लोगों की जानकारी इकट्ठा करेंगे, जिसमें उनकी जाति की जानकारी भी शामिल होगी। यह कदम जाति आधारित आंकड़ों को इकट्ठा करने और समाज के विभिन्न वर्गों की स्थिति को समझने में मदद करेगा। जनगणना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें देश के सभी व्यक्तियों से संबंधित आंकड़े इकट्ठे किए जाते हैं। यह प्रक्रिया हर दस साल में एक बार होती है और इसमें जनसांख्यिकीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक डेटा शामिल होते हैं। जनगणना के माध्यम से लोगों की संख्या, आयु, लिंग, शिक्षा, व्यवसाय और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठी की जाती है, जिसका उपयोग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। यह आंकड़े नीति निर्माण, योजना और विकास के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
देश में आजादी के बाद यह पहले जातीय जनगणना होगी:
बता दें कि केंद्र ने 30 अप्रैल 2025 को जातीय जनगणना कराने का एलान किया था। देश में आजादी के बाद यह पहली जातीय जनगणना होगी, जिसे मूल जनगणना के साथ ही कराया जाएगा। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल जाति जनगणना कराने की मांग करते रहे हैं। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। इसे हर 10 साल में किया जाता है, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण 2021 में टाल दिया गया था। केंद्रीय मंत्री वैष्णव ने कहा, ‘1947 से जाति जनगणना नहीं की गई। कांग्रेस की सरकारों ने हमेशा जाति जनगणना का विरोध किया। 2010 में दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह सिंह ने कहा था कि जाति जनगणना के मामले पर कैबिनेट में विचार किया जाना चाहिए। इस विषय पर विचार करने के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया गया था। अधिकांश राजनीतिक दलों ने जाति जनगणना की सिफारिश की। इसके बावजूद कांग्रेस सरकार ने जाति का सर्वेक्षण या जाति जनगणना कराने का फैसला नहीं किया। जनगणना 2027 सिर्फ जनसंख्या की गणना भर नहीं होगी, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वंचित वर्गों की सही पहचान और उनके लिए योजनाओं की बेहतर दिशा तय हो सकेगी। आरक्षण व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर तथ्यात्मक और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध होंगे। नीतियों और योजनाओं का पुनर्गठन संभव होगा जो समावेशी विकास की दिशा में उपयोगी हो सकता है।
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Author: Abhishek Kumar
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