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India Rejects Third-Party Role: भारत का दो टूक संदेश, नेपाल सीमा विवाद में तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं

भारत ने नेपाल सीमा विवाद में किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज किया। MEA ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर भी अपना स्पष्ट रुख दोहराया। India Rejects Third-Party Role in Nepal Border Dispute प्रस्तावना भारत और नेपाल के बीच संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से बेहद गहरे रहे हैं। दोनों देशों के नागरिकों … Read more

India Rejects Third-Party Role in Nepal Border Dispute

भारत ने नेपाल सीमा विवाद में किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज किया। MEA ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर भी अपना स्पष्ट रुख दोहराया।

India Rejects Third-Party Role in Nepal Border Dispute


प्रस्तावना

भारत और नेपाल के बीच संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से बेहद गहरे रहे हैं। दोनों देशों के नागरिकों के बीच खुली सीमा, धार्मिक जुड़ाव और आर्थिक सहयोग इन संबंधों को विशेष बनाते हैं। हालांकि समय-समय पर सीमा से जुड़े कुछ मुद्दे दोनों देशों के बीच चर्चा और विवाद का कारण भी बने हैं। हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह द्वारा भारत-नेपाल सीमा विवाद के समाधान में चीन और ब्रिटेन जैसे तीसरे पक्ष की भूमिका की बात किए जाने के बाद भारत ने स्पष्ट और कड़ा जवाब दिया है।

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विदेश मंत्रालय (MEA) ने साफ कहा है कि भारत और नेपाल के बीच सीमा संबंधी सभी मुद्दों को सुलझाने के लिए पहले से स्थापित द्विपक्षीय तंत्र मौजूद हैं और किसी तीसरे पक्ष की इसमें कोई आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर भी अपनी स्थिति दोहराते हुए यूरोपीय संघ (EU) और पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष रूप से नसीहत दी है।


भारत का स्पष्ट रुख: तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं

विदेश मंत्रालय का बयान

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा कि भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े मामलों को हल करने के लिए दोनों देशों ने पहले से ही प्रभावी द्विपक्षीय तंत्र स्थापित कर रखे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह पूरी तरह से भारत और नेपाल के बीच का मामला है और इसमें किसी भी तीसरे देश या संस्था की भूमिका नहीं हो सकती।

भारत का यह बयान उस समय आया जब नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कहा था कि सीमा विवाद पर केवल भारत और चीन ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के साथ भी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया था कि यह मुद्दा ब्रिटिश भारत के समय से जुड़ा हुआ है, इसलिए ब्रिटेन की भी इसमें रुचि हो सकती है।

भारत ने इस विचार को सीधे तौर पर खारिज करते हुए कहा कि सीमा संबंधी मामलों का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से ही संभव है।


भारत-नेपाल सीमा विवाद क्या है?

सीमा की लंबाई और स्थिति

भारत और नेपाल के बीच लगभग 1,850 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा और पासपोर्ट के एक-दूसरे के यहां आ-जा सकते हैं। यही वजह है कि यह सीमा दुनिया की सबसे अनोखी सीमाओं में से एक मानी जाती है।

विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत-नेपाल सीमा का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा पहले ही सीमांकित किया जा चुका है। केवल कुछ छोटे हिस्सों में विवाद बना हुआ है।

विवादित क्षेत्र

भारत और नेपाल के बीच मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों को लेकर विवाद रहा है:

कालापानी क्षेत्र

कालापानी क्षेत्र लंबे समय से दोनों देशों के बीच विवाद का विषय रहा है। नेपाल इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है, जबकि भारत इसे अपने प्रशासनिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है।

लिपुलेख और लिम्पियाधुरा

साल 2020 में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया गया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था।


गंडक नदी और सीमा विवाद

नदी का रास्ता बदलना बना कारण

विदेश मंत्रालय ने बताया कि कई क्षेत्रों में विवाद का प्रमुख कारण गंडक नदी का समय के साथ अपना रास्ता बदलना है। नदी के बहाव में परिवर्तन होने से कुछ क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति को लेकर भ्रम पैदा हुआ।

सीमा निर्धारण के दौरान प्राकृतिक सीमाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब कोई नदी अपना मार्ग बदलती है तो भूमि के स्वामित्व और सीमा निर्धारण को लेकर नए प्रश्न खड़े हो जाते हैं।

नो-मैन्स लैंड पर अतिक्रमण

कुछ स्थानों पर दोनों देशों के बीच निर्धारित नो-मैन्स लैंड पर अतिक्रमण की शिकायतें भी सामने आई हैं। इन क्षेत्रों की संयुक्त मैपिंग और सर्वेक्षण का कार्य जारी है ताकि विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जा सके।


बालेन शाह ने क्या कहा था?

संसद में दिया बयान

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने हाल ही में संसद में सीमा विवाद पर अपनी बात रखते हुए कहा था कि भारत, चीन और ब्रिटेन के साथ इस विषय पर चर्चा की जा सकती है। उन्होंने कहा कि यह समस्या ऐतिहासिक है और ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ी हुई है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दोनों पक्षों की ओर से अतिक्रमण के मामले हुए हैं और दोनों देशों को बैठकर समाधान निकालना चाहिए।

बालेन शाह के इस बयान ने क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा को जन्म दिया। लेकिन भारत ने बिना किसी देरी के अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी कि सीमा विवाद का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत से ही होगा।


भारत-नेपाल संबंधों का महत्व

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव

भारत और नेपाल के संबंध केवल पड़ोसी देशों वाले नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों पुराना सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्ता है।

नेपाल में बड़ी संख्या में लोग हिंदू धर्म का पालन करते हैं और भारत के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों से उनका गहरा संबंध है। इसी तरह भारत में रहने वाले नेपाली नागरिक भी दोनों देशों के बीच मजबूत सामाजिक संबंधों का प्रतीक हैं।

आर्थिक सहयोग

भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। नेपाल की बड़ी मात्रा में आयातित वस्तुएं भारत से आती हैं। इसके अलावा ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग जारी है।

ऐसे में सीमा विवादों का समाधान आपसी विश्वास और संवाद के माध्यम से करना दोनों देशों के हित में माना जाता है।


जम्मू-कश्मीर पर भी भारत का सख्त संदेश

EU और पाकिस्तान के संयुक्त बयान पर प्रतिक्रिया

सीमा विवाद के मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने जम्मू-कश्मीर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत अपने आंतरिक मामलों पर किसी भी बाहरी टिप्पणी को स्वीकार नहीं करता।

यह बयान यूरोपीय संघ और पाकिस्तान के संयुक्त बयान के बाद आया, जिसमें जम्मू-कश्मीर का जिक्र किया गया था।

भारत ने स्पष्ट कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अटूट हिस्से हैं तथा किसी भी बाहरी संस्था या देश को इस विषय पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।

भारत की नीति में निरंतरता

भारत लंबे समय से यह कहता आया है कि जम्मू-कश्मीर पूरी तरह उसका आंतरिक मामला है। चाहे संयुक्त राष्ट्र हो, यूरोपीय संघ हो या कोई अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्था, भारत लगातार यह रुख अपनाता रहा है कि इस विषय पर बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।


भारत की विदेश नीति का संदेश

द्विपक्षीय समाधान पर जोर

भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ विवादों का समाधान आपसी बातचीत और द्विपक्षीय तंत्र के माध्यम से किया जाए।

नेपाल के मामले में भी भारत ने यही रुख अपनाया है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत क्षेत्रीय मुद्दों में बाहरी हस्तक्षेप की बजाय सीधे संवाद को प्राथमिकता देता है।

पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध

भारत दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देने की नीति पर काम करता है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध भारत की क्षेत्रीय रणनीति का अहम हिस्सा हैं।

इसलिए भारत चाहता है कि सीमा से जुड़े किसी भी मुद्दे को आपसी समझ और सहयोग के आधार पर सुलझाया जाए।


निष्कर्ष

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह द्वारा सीमा विवाद में तीसरे पक्ष की भूमिका का सुझाव दिए जाने के बाद भारत ने स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है कि भारत-नेपाल सीमा विवाद पूरी तरह द्विपक्षीय मामला है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि दोनों देशों के पास विवादों को सुलझाने के लिए पर्याप्त संस्थागत तंत्र मौजूद हैं और किसी तीसरे देश या संस्था की आवश्यकता नहीं है।

साथ ही भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर अपनी अडिग स्थिति भी दोहराई है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि ये भारत के अभिन्न हिस्से हैं और किसी भी विदेशी हस्तक्षेप या टिप्पणी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

आने वाले समय में भारत और नेपाल के बीच संवाद जारी रहने की संभावना है। दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को देखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि सीमा से जुड़े शेष मुद्दों का समाधान भी शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय तरीके से निकाला जाएगा।

AK
Author: AK

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