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Bihar Film City: बिहार बना फिल्म शूटिंग का नया गढ़

Bihar Film City: बिहार बना फिल्म शूटिंग का नया गढ़
Bihar Emerges as New Film Shooting Hub

बिहार में फिल्म शूटिंग को मिला नया आयाम, 14 फिल्मों की शूटिंग को मंजूरी, स्टूडियो निर्माण और रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं।

Bihar Emerges as New Film Shooting Hub

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बिहार में फिल्म इंडस्ट्री की नई शुरुआत: एक सिनेमा हब की ओर

अब सिनेमा की कहानियां बिहार से निकलेंगी

‘लाइट, कैमरा, एक्शन…’ ये शब्द अब मुंबई या हैदराबाद तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अब बिहार की धरती पर भी गूंजने लगे हैं। हाल ही में बिहार सरकार की नई फिल्म नीति ने राज्य को फिल्म निर्माण का एक नया गढ़ बना दिया है। अब न केवल भोजपुरी, मैथिली, मगही जैसी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में, बल्कि हिंदी और अंग्रेजी फिल्मों की शूटिंग भी बिहार में हो रही है।

यह लेख बिहार में तेजी से बढ़ते फिल्म उद्योग, नई फिल्म नीति, चल रही फिल्मों की शूटिंग, स्टूडियो की स्थापना और इससे जुड़े पर्यटन और रोजगार के अवसरों पर प्रकाश डालता है।


बिहार की नई फिल्म नीति: क्या है खास?

सरकार का उद्देश्य: सिनेमा के ज़रिए सांस्कृतिक और आर्थिक विकास

बिहार सरकार ने 2023 में एक व्यापक फिल्म नीति लागू की, जिसका उद्देश्य राज्य में फिल्म निर्माण को प्रोत्साहित करना है। इस नीति के अंतर्गत निम्नलिखित मुख्य बिंदु शामिल हैं:

  • फिल्म निर्माताओं को सब्सिडी और टैक्स में छूट
  • शूटिंग के लिए सरकारी भवन, ऐतिहासिक स्थल और पर्यटन स्थलों की सुविधा
  • स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों को प्राथमिकता
  • स्थायी फिल्म स्टूडियो और सेट निर्माण के लिए सहायता

इस नीति का सीधा असर यह हुआ कि देशभर के निर्माता-निर्देशक अब बिहार को एक शूटिंग लोकेशन के रूप में प्राथमिकता देने लगे हैं।


14 फिल्मों को मिली शूटिंग की मंजूरी

बढ़ता सिनेमा का दायरा

फिलहाल बिहार में 14 फिल्मों को शूटिंग की मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से कई फिल्मों की शूटिंग पूरी हो चुकी है, जबकि कुछ पर काम जारी है। इन फिल्मों में भोजपुरी, हिंदी, मैथिली और मगही भाषाओं के अलावा अंग्रेजी फिल्में भी शामिल हैं।

उदाहरण के लिए:

  • हिंदी फिल्म ‘टिया’ की शूटिंग वाल्मीकि नगर में की जा रही है।
  • मैथिली फिल्म ‘नदी के पार’ की शूटिंग दरभंगा और सीतामढ़ी में हुई।
  • भोजपुरी एक्शन ड्रामा ‘धरतीपुत्र’ की शूटिंग गया और औरंगाबाद में हुई।

इन परियोजनाओं ने न केवल फिल्म निर्माण को बढ़ावा दिया है, बल्कि स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों के लिए भी रोजगार के नए द्वार खोले हैं।


पहला स्थायी फिल्म सेट और स्टूडियो

संरचनात्मक विकास की दिशा में मजबूत कदम

बिहार में पहला स्थायी फिल्म सेट वाल्मीकि नगर में स्थापित किया जा रहा है, जहां ‘टिया’ फिल्म की शूटिंग चल रही है। इसके अलावा अभिनेता-निर्देशक हैदर काजमी द्वारा पाली, काको और जहानाबाद में स्टूडियो स्थापित किए गए हैं, जो अब व्यस्त शूटिंग स्थलों में तब्दील हो चुके हैं।

इन स्टूडियो में पेशेवर कैमरा, लाइटिंग, एडिटिंग लैब, और साउंड रिकॉर्डिंग की व्यवस्था की गई है, जिससे बाहरी टीमों को भी यहाँ आकर शूट करना सुविधाजनक हो गया है।


किन जिलों में हो रही है शूटिंग?

शूटिंग स्थलों से बढ़ा पर्यटन और स्थानीय व्यापार

बिहार के कई जिले अब फिल्मों की कहानियों का हिस्सा बन चुके हैं। मुख्य जिलों में शामिल हैं:

  • पटना: प्रशासनिक और शहरी दृश्य
  • नालंदा और वैशाली: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
  • गया और नवादा: धार्मिक और प्राकृतिक दृश्य
  • बगहा, दरभंगा और सीतामढ़ी: ग्रामीण और पारंपरिक परिवेश
  • जहानाबाद और रोहतास: एक्शन और सामाजिक फिल्मों के लिए उपयुक्त लोकेशन

इन जिलों में फिल्म शूटिंग से स्थानीय होटलों, ट्रांसपोर्ट, कैटरिंग और छोटे व्यवसायों को लाभ हुआ है।


रोजगार और युवाओं को अवसर

स्थानीय प्रतिभा को मिल रहा है मंच

बिहार में फिल्म शूटिंग के बढ़ते रुझान से स्थानीय युवाओं को अभिनय, स्क्रिप्ट राइटिंग, कैमरामैन, लाइटिंग, मेकअप और डांस कोरियोग्राफी जैसे क्षेत्रों में अवसर मिलने लगे हैं।

पटना और गया जैसे शहरों में अब फिल्म से जुड़े शॉर्ट-टर्म कोर्स और वर्कशॉप शुरू हो गए हैं, जो युवाओं को तकनीकी जानकारी के साथ-साथ प्रैक्टिकल अनुभव भी दे रहे हैं।


डॉक्यूमेंट्री और शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल का आयोजन

बिहार के सिनेमा को मिलेगी वैश्विक पहचान

जल्द ही बिहार में डॉक्यूमेंट्री और शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होने वाला है। इसके लिए कई फिल्में चयनित हो चुकी हैं और शेष फिल्मों की स्क्रीनिंग प्रक्रिया जारी है। इस फेस्टिवल का उद्देश्य है कि स्थानीय कहानियों, संस्कृति और समस्याओं को एक वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जाए।


बिहार का सिनेमा: भविष्य की दिशा

क्या बिहार बन सकता है अगला बॉलीवुड?

बिहार की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता इसे फिल्म शूटिंग के लिए एक अनूठा स्थल बनाती है। अगर सरकार इसी तरह से नीति और ढांचागत विकास को जारी रखे, तो आने वाले वर्षों में बिहार को “पूर्व का बॉलीवुड” कहा जाना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।


निष्कर्ष

बिहार में फिल्म उद्योग का यह नवाचार न केवल राज्य की छवि को एक नई पहचान दे रहा है, बल्कि रोजगार, पर्यटन और सांस्कृतिक विकास के लिए भी नया रास्ता खोल रहा है।
यदि फिल्म निर्माता और राज्य सरकार इसी उत्साह से साथ मिलकर काम करते रहें, तो बिहार बहुत जल्द राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा मानचित्र पर एक अहम मुकाम हासिल कर सकता है।


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Author: AK

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