
बोधगया (बिहार): मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की अनुसंधायिका मानसी सिंह द्वारा लिखित कविता “बेचारे मां-बापू” ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। इस मार्मिक रचना में माता-पिता के त्याग, संघर्ष और बुढ़ापे में उनकी उपेक्षा की पीड़ा को प्रभावी रूप से व्यक्त किया गया है।
माता-पिता की कुर्बानी और संतान की बेरुखी
कविता दर्शाती है कि कैसे माता-पिता अपनी संपत्ति, मेहनत और सपने अपने बच्चों की शिक्षा में लगा देते हैं ताकि वे सफल हों, लेकिन वही बच्चे बुढ़ापे में उन्हें बेसहारा छोड़ देते हैं।
“जो था उनके पास सभी तो लगा दिए पढ़ाने में,
बेटा-बहू सिनेमा देखे और मां-बाप पड़ा दलानी में….”
यह पंक्तियां उन बुजुर्ग माता-पिता की दुर्दशा को उजागर करती हैं, जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर संघर्ष करते हैं, लेकिन जब उन्हें सहारे की जरूरत होती है, तब वे अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।
सामाजिक संदेश और भावनात्मक प्रभाव
कविता ने उन लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है जो अपने माता-पिता की देखभाल में लापरवाही बरतते हैं। इसमें न सिर्फ उनके संघर्ष और दर्द को उकेरा गया है, बल्कि यह समाज को आत्मविश्लेषण करने का एक मौका भी देती है।
“तरसती आंखें व्याकुल सा मन,
टूटी सांसें ताने में,
अंत समय भी दूर रहेगा,
ना सोचा कभी पढ़ाने में….!!”
साहित्य जगत में सराहना
मगध विश्वविद्यालय के साहित्य प्रेमियों और हिंदी विभाग के प्राध्यापकों ने मानसी सिंह की इस कविता को सामाजिक चेतना का वाहक बताते हुए इसकी व्यापक सराहना की है। विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने इसे यथार्थपरक और भावनात्मक रूप से प्रभावी कविता करार दिया है।
समाज के लिए सीख
“बेचारे मां-बापू” केवल एक कविता नहीं, बल्कि आज के बदलते सामाजिक ताने-बाने का आईना है। यह कविता हमें यह याद दिलाने का संदेश देती है कि माता-पिता का प्रेम और त्याग अनमोल होता है, जिसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए।
Author: AK
! Let us live and strive for freedom ! Freelance Journalist ! Politics ! News Junky !












