गुरु, फ़रवरी 12, 2026

Bihar Survey Report 2025: विकास दावों के बीच पिछड़े जिले

Bihar Economic Survey 2025: Harsh Reality of Sheohar & Sitamarhi

बिहार आर्थिक सर्वे 2025-26 में शिवहर और सीतामढ़ी की कम प्रति व्यक्ति आय, भ्रष्टाचार, पलायन और कृषि संकट की गंभीर तस्वीर सामने आई।

Bihar Economic Survey 2025: Harsh Reality of Sheohar & Sitamarhi


प्रस्तावना: विकास के दावों के बीच कड़वी हकीकत

बिहार विधानसभा में पेश बिहार आर्थिक सर्वे 2025-26 ने राज्य के विकास मॉडल पर नई बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर पटना और कुछ शहरी जिलों में आधारभूत ढांचे और सेवाओं में सुधार के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उत्तरी बिहार के सीमावर्ती जिले शिवहर और सीतामढ़ी आज भी पिछड़ेपन, कम प्रति व्यक्ति आय और पलायन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के भीतर क्षेत्रीय असंतुलन अब भी गहरा है। यह लेख इन्हीं आंकड़ों, कारणों और संभावित समाधान पर सरल भाषा में प्रकाश डालता है।


बिहार आर्थिक सर्वे 2025-26 क्या कहता है?

प्रति व्यक्ति आय में भारी अंतर

आर्थिक सर्वे के अनुसार, शिवहर की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय लगभग 18,980 रुपये बताई गई है, जो इसे राज्य का सबसे गरीब जिला बनाती है। वहीं सीतामढ़ी लगभग 21,448 रुपये प्रति व्यक्ति आय के साथ तीसरे सबसे पिछड़े जिलों में शामिल है।

इसके विपरीत, राजधानी पटना और कुछ अन्य जिलों की आय इनसे कई गुना अधिक है। यह अंतर केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि विकास के असमान वितरण की कहानी कहता है।

क्षेत्रीय असंतुलन की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में विकास कुछ जिलों तक सीमित रह गया है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग के मामले में उत्तर बिहार के सीमावर्ती इलाकों को अपेक्षित निवेश नहीं मिला।


‘दोहरी मार’ का सिद्धांत: प्रकृति और उपेक्षा

अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. आनंद किशोर के अनुसार, शिवहर और सीतामढ़ी की स्थिति के पीछे “दोहरी मार” जिम्मेदार है।

प्राकृतिक आपदाएं

यह क्षेत्र बाढ़, सुखाड़ और ओलावृष्टि से बार-बार प्रभावित होता है। नदियों का जाल होने के बावजूद सिंचाई व्यवस्था मजबूत नहीं है। तटबंध निर्माण के कारण नदियों का पानी खेतों तक स्वाभाविक रूप से नहीं पहुंच पाता। पहले यही पानी मिट्टी को उपजाऊ बनाता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है।

जब फसल बर्बाद होती है, तो किसानों को समय पर फसल बीमा या सब्सिडी का लाभ नहीं मिल पाता। इससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाती है।

प्रशासनिक उपेक्षा

स्थानीय लोगों का आरोप है कि विकास योजनाओं का लाभ जमीन तक नहीं पहुंचता। कई बार योजनाएं कागजों पर पूरी दिखती हैं, लेकिन जमीनी असर कम दिखाई देता है।


कृषि प्रधान क्षेत्र में उद्योगों की कमी

औद्योगिक शून्यता

शिवहर और सीतामढ़ी में बड़े उद्योगों की संख्या लगभग नगण्य है। कृषि आधारित क्षेत्र होने के बावजूद यहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स या छोटे उद्योग विकसित नहीं हो पाए।

गन्ना, केला, सब्जी और अनाज उत्पादन की संभावना होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन की व्यवस्था नहीं है। इससे किसान कच्चा माल बेचने को मजबूर हैं और उन्हें उचित लाभ नहीं मिल पाता।

बुनियादी ढांचे की समस्या

शिवहर आज भी मजबूत रेल संपर्क से वंचित है। परिवहन की कमी निवेश को प्रभावित करती है। सड़क और गोदाम जैसी सुविधाओं का अभाव भी व्यापार में बाधा बनता है।


MSP और खाद की कालाबाजारी

न्यूनतम समर्थन मूल्य का संकट

किसानों को MSP (Minimum Support Price) पर फसल बेचने का अधिकार है, लेकिन जमीनी स्तर पर खरीद व्यवस्था कमजोर है। कई बार खरीद केंद्र समय पर नहीं खुलते या प्रक्रिया जटिल होती है।

गन्ना किसानों की स्थिति और कठिन है। बताया जाता है कि यहां गन्ने का मूल्य देश के अन्य हिस्सों से कम है। इससे किसान आर्थिक रूप से दबाव में रहते हैं।

उर्वरक की उपलब्धता

खाद और उर्वरक की कालाबाजारी की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। जब इनपुट लागत बढ़ती है और बिक्री मूल्य कम रहता है, तो किसान कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। यही कर्ज धीरे-धीरे बड़ी आर्थिक समस्या बन जाता है।


भ्रष्टाचार और पलायन: ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

योजनाओं का अधूरा लाभ

आर्थिक सर्वे की चर्चा के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि कई विकास योजनाओं में पारदर्शिता की कमी है। यदि लाभार्थियों तक पूरा पैसा नहीं पहुंचता, तो योजना का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

पलायन की मजबूरी

रोजगार के अवसर कम होने के कारण बड़ी संख्या में युवा दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मजदूरी करने जाना आम बात है।

जब गांव का युवा बाहर चला जाता है, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है। खेती और छोटे व्यवसायों पर इसका सीधा असर पड़ता है।


सामाजिक प्रभाव और शिक्षा की स्थिति

आर्थिक पिछड़ापन केवल आय तक सीमित नहीं रहता। इसका असर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ता है।

कम आय वाले परिवारों के बच्चे उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते। निजी स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होने के कारण लोग बुनियादी इलाज के लिए भी संघर्ष करते हैं। यह चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।


समाधान की दिशा में क्या किया जा सकता है?

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी तो पलायन कम होगा। इसके लिए कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना जरूरी है।

छोटे फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स, कोल्ड स्टोरेज और स्थानीय बाजार विकसित किए जाएं तो किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है।

सिंचाई और जल प्रबंधन

नदियों के पानी का वैज्ञानिक प्रबंधन और मृतप्राय नदियों का पुनर्जीवन जरूरी है। यदि सिंचाई व्यवस्था बेहतर होगी, तो उत्पादन और आय दोनों बढ़ सकते हैं।

पारदर्शी खरीद और सब्सिडी

MSP पर पारदर्शी खरीद और समय पर सब्सिडी वितरण से किसानों का भरोसा बढ़ेगा। खाद की कालाबाजारी पर सख्ती भी जरूरी है।

स्थानीय रोजगार सृजन

कौशल विकास कार्यक्रमों और लघु उद्योगों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन किया जा सकता है। इससे युवाओं को बाहर जाने की आवश्यकता कम होगी।


निष्कर्ष: आंकड़ों से आगे की कहानी

बिहार आर्थिक सर्वे 2025 ने शिवहर और सीतामढ़ी की स्थिति को स्पष्ट रूप से सामने रखा है। कम प्रति व्यक्ति आय, कृषि संकट, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दे केवल आर्थिक आंकड़े नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता हैं।

यदि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन मिलकर ठोस कदम उठाएं, तो आने वाले वर्षों में इन जिलों की तस्वीर बदल सकती है। विकास का लाभ तभी सार्थक होगा, जब वह हर जिले और हर गांव तक पहुंचे।

शिवहर और सीतामढ़ी की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि विकास का असली पैमाना वही है, जहां सबसे पिछड़ा क्षेत्र भी आगे बढ़ सके।

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AK
Author: AK

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