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Kailash Mansarovar Yatra 2025: 5 साल बाद कैलाश मानसरोवर पहुंचे भारतीय तीर्थयात्री, शिव के धाम में फिर गूंजे जयकारे

Indian Pilgrims Reach Kailash Mansarovar After 5 Years

कैलाश मानसरोवर यात्रा पांच साल बाद फिर शुरू, पहला जत्था तिब्बत पहुंचा। भगवान शिव के धाम में भारतीय तीर्थयात्रियों ने की पूजा-अर्चना।

Indian Pilgrims Reach Kailash Mansarovar After 5 Years


पांच साल बाद फिर शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा

भारत-चीन संबंधों में लंबे समय बाद सकारात्मक संकेत दिखा है। कैलाश मानसरोवर यात्रा, जो कि आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक मानी जाती है, एक बार फिर पांच वर्षों के अंतराल के बाद शुरू हो चुकी है। भगवान शिव का निवास कहे जाने वाले कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के दर्शन के लिए पहला जत्था तिब्बत पहुंच चुका है।

इस यात्रा की शुरुआत सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह कदम भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।


क्यों खास है कैलाश मानसरोवर यात्रा?

भगवान शिव का पवित्र निवास

कैलाश पर्वत को हिंदू धर्म में भगवान शिव का निवास स्थल माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि यहीं पर भगवान शिव अपनी पत्नी माता पार्वती के साथ ध्यान में लीन रहते हैं। इस स्थान का वर्णन कई पुराणों और शास्त्रों में भी मिलता है।

बौद्ध और जैन धर्म में भी महत्व

बौद्ध धर्म में कैलाश पर्वत को “कांग रिंपोछे” के नाम से जाना जाता है और यह बौद्धों के लिए भी अत्यंत पवित्र स्थल है। वहीं जैन धर्म में इसे ऋषभदेव की तपस्थली के रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार यह स्थान तीन धर्मों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है।


पहले जत्थे की यात्रा का विवरण

36 यात्रियों ने किया शुभारंभ

इस वर्ष पहला जत्था कुल 36 भारतीय तीर्थयात्रियों के साथ रवाना हुआ है। यह जत्था चीन के शिजांग (तिब्बत) क्षेत्र में स्थित मानसरोवर झील तक सफलतापूर्वक पहुंच चुका है। चीन में भारत के राजदूत शू फेइहोंग ने इस जानकारी को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए प्रसन्नता व्यक्त की।

पांच साल बाद यात्रा बहाल

गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में हुए सैन्य टकराव के बाद यह यात्रा बंद कर दी गई थी। अब चार साल बाद दोनों देशों ने अपने संबंधों को सामान्य करने की दिशा में पहल करते हुए इस यात्रा को फिर से बहाल किया है।


यात्रा मार्ग और प्रक्रिया

दो रास्तों से होगी यात्रा

विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस वर्ष कुल 15 बैच कैलाश मानसरोवर के लिए रवाना होंगे। इनमें से 5 बैच उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होकर और 10 बैच सिक्किम के नाथुला दर्रे से गुजरेंगे। हर बैच में लगभग 50 तीर्थयात्री होंगे।

ऑनलाइन आवेदन और चयन प्रक्रिया

यात्रा के लिए इच्छुक तीर्थयात्रियों को kmy.gov.in पोर्टल पर आवेदन करना होता है। 2015 से यह प्रक्रिया पूरी तरह से ऑनलाइन है और कंप्यूटराइज्ड सिस्टम के जरिए रूट और बैच का निर्धारण किया जाता है।

यदि किसी यात्री को किसी कारणवश बैच बदलना होता है, तो वह रिक्त स्थान की उपलब्धता के अनुसार आवेदन कर सकता है। हालांकि आमतौर पर बैच परिवर्तन की संभावना कम होती है।


यात्रा की कठिनाइयां और तैयारी

ऊंचाई और ऑक्सीजन की कमी

कैलाश मानसरोवर की यात्रा कठिनाईयों से भरी होती है। यह समुद्र तल से लगभग 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस वजह से यहां ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है और उच्च रक्तचाप या सांस संबंधी रोगों वाले यात्रियों के लिए खतरा बना रहता है।

स्वास्थ्य जांच अनिवार्य

यात्रा से पहले सभी तीर्थयात्रियों की चिकित्सा जांच अनिवार्य होती है। सरकार द्वारा नामित अस्पतालों में यात्रियों की फिटनेस रिपोर्ट ली जाती है। यात्रा की स्वीकृति केवल फिट यात्रियों को ही दी जाती है।


धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र

कैलाश मानसरोवर यात्रा को आत्मा की शुद्धि, पापों के प्रायश्चित और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु इस यात्रा के दौरान कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने विश्वास और श्रद्धा से मंजिल तक पहुंचते हैं।

मानसरोवर झील का धार्मिक महत्व

मानसरोवर झील को बेहद पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस झील में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि हर साल हजारों श्रद्धालु इस झील में डुबकी लगाने का सपना देखते हैं।


चीन-भारत संबंधों में नया अध्याय

राजनयिक संबंधों की बहाली

कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी सकारात्मक संकेत है। पिछले वर्ष रूस के कजान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद यह संकेत मिलना शुरू हो गया था कि दोनों देश संबंधों को सामान्य करने के लिए कदम उठा सकते हैं।

सीमा विवाद की छाया कम करने की कोशिश

कैलाश मानसरोवर यात्रा का दोबारा शुरू होना यह दर्शाता है कि भारत और चीन दोनों ही देश कूटनीतिक और धार्मिक द्वारों के माध्यम से पारस्परिक विश्वास को मजबूत करना चाहते हैं।


निष्कर्ष

पांच वर्षों के लंबे इंतजार के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा का फिर से शुरू होना न केवल तीर्थयात्रियों के लिए एक भावनात्मक क्षण है, बल्कि भारत-चीन संबंधों के लिए भी एक नई शुरुआत है। यह यात्रा उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो आस्था और कठिनाई दोनों को साथ लेकर जीवन में उच्चतम शिखर तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।

आशा है कि आने वाले समय में यह यात्रा न केवल अधिक सुगम बने, बल्कि और अधिक श्रद्धालुओं को भगवान शिव के इस दिव्य धाम तक पहुंचने का अवसर मिले।


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AK
Author: AK

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