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जब मजहब इंसानियत पर भारी पड़े: मानसी सिंह

मानसी सिंह की कविता ‘मजहबी जिहादी’ ने झकझोर दिया समाज को”

देश में जब एक के बाद एक जघन्य घटनाएँ सामने आ रही हैं, तब मगध विश्वविद्यालय की हिंदी स्नातकोत्तर विभाग की अनुसंधायिका मानसी सिंह ने एक मार्मिक कविता “मजहबी जिहादी” के माध्यम से जनमानस की चुप्पी को तोड़ने का साहसिक प्रयास किया है।

यह कविता न केवल आतंकी घटनाओं के प्रति आक्रोश को स्वर देती है, बल्कि उन मानसिकताओं पर भी तीखा प्रहार करती है जो मजहब के नाम पर इंसानियत को दरकिनार कर देती हैं।



अंतर्मन की ज्वाला को और मत बढ़ाइए,
इक्कीस नहीं एक मरे बातें मत झुठलाइए।
मत भूलिए कि जाति धर्म सब बाद में आता है,
इंसान मरे हैं!
इंसानियत के नाते भी अपनी संवेदना दिखाइए।

क्या मजहब मानव से ऊपर की चीज है?
मैं थोड़ी नासमझ हूं, गर है तो कैसे मुझे बताईए?
सबसे पहले तो यहां इंसानियत की बात है,
हम भारतीय है!
भारतवासी बर्बरता का भेंट चढ़ा है,
महाराज! कुछ तो तरस खाइए।

ये दरिंदे बचने ना पाएं इसकी दुआ मनाइए,
पुश्तें भी उनकी याद रखें हाकिम ऐसी तरकीब लगाइए।
मत करो कोई टीका टिप्पणी ना कोई सवाल उठाइए,
आग लगी है सीने में इसे और मत भड़काइए।

कोई कह रहा हिन्दू मरा कल को मर सकता मुसलमान,
क्या बारी-बारी खुशियां मनाएं इतना नीच है हमारा इमान?
थू है ऐसी सोच पर, कितना गिर गया इंसान?
गर थोड़ी सी भी इंसानियत बची हो तो शर्म करो हैवान।

मन इतना घबरा रहा, जी करता दहाड़ लगाऊं,
हैवानों की बोटी-बोटी कुत्तों में जाके बांट के आऊं।
तुम इतने कठोर हो कैसे, कैसे तुम्हें इंसान बतलाऊं ?
मैं तो तब से सो न पाई, जब से मासूमों ने जान गंवाई!

ऐसी क्रूरता सूरमा नहीं राक्षस हीं कर जाते हैं,
जो निहत्थे; बेगुनाहों को मारते हैं और मर्दानगी दिखलाते हैं।
ये तो राक्षस हैं; भेड़िए हैं उन्हें इंसानियत से क्या लेना,
पर मैं पूछती हूं गर तुम इंसा हो तो क्या मतलब इनके संग होना?

लगता है कुछ उनकी जातियां मानवों में  मिल गए हैं,
तभी रहकर-रहकर राक्षसों की भाषा बोलने लग जाते हैं।
बांट देते हैं जाति; मजहब में उनके संग हीं हो लेते हैं,
शर्म, स्नेह, इंसानियत भूलकर करते हैं तारीफ़दारी,
ये है उनका मजहब; लगता बची नहीं खुद्दारी।

सच तो ये है; ये ऐसी बर्बरता की ताक में रहते हैं,
इसीलिए ऐसे मौके पर उनके साथ खड़े दिखते हैं।
इन्हें भी आतंकी घोषित कर सरकार उचित कार्रवाई करे ,
या इनके प्रिय भाई-बंधुओं से मिलवाने का समुचित प्रबंध करे।

अरे ये उनसे भी खतरनाक हैं, ये जिहादियों के बाप हैं,
जिसे इस माहौल में भी मजहब दिखाई देता है।
वो देशद्रोही हैं,भारतीय नहीं कलंक हैं,
ये इंसा नहीं हैवान हैं, मानवता के लिए अभिशाप हैं…!!

      

“इक्कीस नहीं एक मरे, बातें मत झुठलाइए… इंसान मरे हैं!”
इन पंक्तियों से कविता की शुरुआत होती है और यहीं से यह स्पष्ट हो जाता है कि रचना केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक भीतर से उबलते नागरिक का विद्रोह है।

कविता के माध्यम से कवयित्री यह प्रश्न उठाती हैं:
“क्या मजहब मानव से ऊपर की चीज है?”
यह सवाल उन तमाम लोगों को कटघरे में खड़ा करता है जो मजहब के चश्मे से घटनाओं को देखना चाहते हैं, बजाय मानवता की कसौटी पर परखने के।

कविता का मध्यभाग एक गहन वेदना और गुस्से का विस्फोट है, जहाँ वे कहती हैं—
“हैवानों की बोटी-बोटी कुत्तों में जाकर बांट के आऊं…”
यह पंक्ति सामाजिक विवेक को झकझोरती है और पाठक को उस पीड़ा से रूबरू कराती है, जो असहाय मासूमों की मौत से उत्पन्न होती है।

मानसी सिंह का स्पष्ट संदेश है:
जो मजहब के नाम पर बर्बरता का समर्थन करते हैं या चुप रहते हैं, वे न केवल देशद्रोही हैं बल्कि मानवता के लिए भी कलंक हैं।

यह कविता क्यों महत्वपूर्ण है?
ऐसे समय में जब समाज धार्मिक ध्रुवीकरण, नफ़रत और मौन समर्थन के दौर से गुजर रहा है, ‘मजहबी जिहादी’ जैसी रचनाएँ समाज को आईना दिखाती हैं। यह रचना हमें यह याद दिलाती है कि सबसे पहले हम इंसान हैं, और इंसानियत ही किसी भी मजहब या विचारधारा से ऊपर है।

When religion overpowers humanity: Mansi Singh

AK
Author: AK

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