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पुस्‍तक समीक्षाकलरव: रूमानी कविताओं का संग्रह

‘कलरव’ जो डॉ० सुबोध कुमार झा का दूसरा हिन्‍दी काव्‍य-संकलन है इसका प्रकाशन प्रिन्‍सेप्‍स पब्लिशिंग द्वारा किया गया है और पहला संस्‍करण 2025 है।
कवि ने युवावस्‍था मे लिखी “रूमानी कविताओं के मधुर कलरव” का संकलन अभी किया है। रूमानी शब्‍द से ही पता चलता है कि इसमें प्रेम से भरपूर आकर्षण और मधुर नवनीत समाहित हैं। इस काव्‍य संग्रह में कवि ने प्रेम से जुड़ी खट्टी-मीठी यादों की स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति की है। कविताओं को पाठक किस रूप में लेते हैं, उन्‍होंने इसे उनपर ही छोड़ दिया है। अपनी इस बेबाक अभिव्‍यक्ति के लिए लेखक ने अपने गुरू के प्रति आभार ज्ञापित करते हुए अपने प्रियजनों के प्रति भी आभार ज्ञापन किया है। डॉ० झा एक मूर्धन्‍य विद्वान हैं और उनके द्वारा रचित पुस्‍तक की समीक्षा करना मेरे लिए अत्‍यन्‍त खुशी की बात है विशेषकर जब स्‍वयं प्रोफेसर झा ने मुझे इस पुस्‍तक की समीक्षा के लिए चुना।
कविता के शीर्षक ‘कलरव’ से ही कविताओं की मधुरता और आकर्षण का पता चलता है। डॉ० झा की रूमानी कविताएँ एक तरफ पाठकों को प्रेम की खट्टी-मीठी याद दिलायेगी वहीं दूसरी ओर निस्‍वार्थ प्रेम और सच्‍चे प्रेम की अभिव्‍यक्ति का रसास्‍वादन भी।
प्रस्‍तुत काव्‍य संग्रह ‘कलरव’ में कुल 33 कविताओं की सूची है, किन्‍तु अंतिम शीर्षक “मैं क्‍यूँ मधुशाला में जाऊँ” वस्‍तुत: ग्‍यारह कविताओं की शृंखला है। अत: कुल कविताओं की संख्‍या 43 हो जाती है।
कवि ने अपनी रूमानी कविता में प्रेम, सौंदर्य, विरह, आशा, भावनात्‍मकता की गहराई और संवेदनशीलता को बड़े ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। कवि की इस काव्‍य-संग्रह में पहली कविता है, “दिल-वीणा के तार से कोई खेले धीमें-धीरे”। कवि ने इस कविता में दिल की भावनाओं को वीणा की तार से इसलिए तुलना किया है क्‍योंकि उसकी धुन-बेहद मधुर और सुरीली होती है और इसमें भावनाओं की गहराई भी होती है। इस कविता में कवि ने प्रेम की भावनाओं को बेहद सुंदर तरीके से प्रस्‍तुत किया है। इस रोमांटिक और भावनात्‍मक कविता में कवि ने अपनी प्रेमिका के प्रति भावनाओं को दर्शाया है और अपनी प्रेमिका के साथ बिताए गए पलों को बहुत सुंदर तरीके से चित्रित किया है।
कवि की दूसरी कविता है “नतमस्‍तक जग सारा”। इस कविता में कवि अपनी प्रेमिका का सौंदर्य इतना अतुलनीय बताते हैं कि उसके आगे सारा जगत सर झुका लेता है। अतिश्‍योक्ति का सुन्‍दर उदाहरण है यह कविता। रोमांटिक और भावनात्‍मक शैली में लिखी गई इस शृंगारिक कविता की एक पंक्ति है “बांके मीठे चितवन ने जब प्रेम- सुधा बरसाया दिल को इतना सुकूं मिला भूल गया जग सारा।” साथ बिताए गए पलों को कवि कितना याद कर रहा है यह ध्‍यातव्‍य है। उसकी प्रमिका का सानिध्‍य उसका सुध-बुध हर लेती है। वो अपनी प्रिय के मुस्‍कान पर फिदा है, उसकी मुस्‍कान से कवि के दिल को शांति और सुकून मिलती है। कविता की भाषा शैली अति आकर्षक और मनमोहक है।
कवि के इस काव्‍य-संग्रह की तीसरी कविता है “बेतहाशा चुमती यादें थकने लगी है।” इस कविता में कवि ने “बेतहाशा चुमती” का प्रयोग करके यह बताने का प्रयास किया है कि यादें कितनी गहरी और भावपूर्ण हैं। प्रेम कविता के साथ-साथ यह एक व्‍यंग्‍यात्‍मक कविता भी हैं जिसमें सामाजिक चलन पर कटाक्ष किया गया हैं। कविता में व्‍यंग्‍य अलंकार, आलोचना, प्रतीकात्‍मक, मानवीकरण और अनुप्रास जैसे अलंकार कविता को आकर्षक और प्रभावशाली बनाते हैं।
इस संकलन की अन्‍य कविताओं का भी यही हाल है, और यह बात उनके शिर्षक से ही स्‍पष्‍ट है- “मन मयूर नर्तन करता है”, “तुम्‍हारा नाम लेकर ही निकलती सांस अपनी”, “ चितवन के इस बांकेपन से”, “ख्‍वाबों की ताबीर का मुतजिर”, “बेकरारी”, “दोष किसका है मेरे यारों”, “रूठे जज्‍बात”, “शर्म से खुद ही अब तो झुकी जा रही है”, “सावन की पनीली आँखों से…”, “धड़कने गीत तेरे ही गाती रहीं”, “बिखरे पृष्‍ठ”, “कैसी यह मजबूरी है”, “किसी को नहीं किसी का इंतजार!”, “तुझे यकीं कैसे आए”, “वीणा के स्‍वर में फिर से…”, “बेदर्द जगत में जी तो रहा”, “अंधेरे में कोई शमां जल गई हो“, “ख्‍वाबों के नक्‍स धुंधलाने लगे हैं”, “वीणा के स्‍वर में फिर से …”, “बेदर्द जगत में जी तो रहा”, “अंधेरे में कोई शमां जल गई हो”, “दुल्‍हन बन तुम गैर के घर चले”, “छुपाओं ना अदा से चेहरा लजाकर”, “अपना ही प्रतिरूप समझ लेते हैं ”, “रूठे स्‍नेह”, “वीनस की सजीव प्रतिमा”, “रीति इस जग की यहीं”, “रखा क्‍या है रीत में”, “तड़पन”, “अंधेरे में कोई शमां जल गई हो”, “काश”, “फिर तुझे सदा देनी ही पड़ी।” इन कविताओं के शिर्षक से ही इनकी रूमानियत टपक रही है। और कवि की आकर्षक प्रस्‍तुति इसमें चार-चाँद लगा देती है।
कवि ने इसी काव्‍य-संकलन में एक कविता रखी है- “मैं क्‍यूं मधुशाला में जाऊँ” जो ग्‍यारह कविताओं की शृंखला है। इन 11 कवताओं में कवि ने मार्मिक प्रेम, सौंदर्य के साथ-साथ आंतरिक भावनाओं को भी उजागर किया है। कवि द्वारा रचित काव्‍य-संग्रह “कलरव” में वो सारे गुण विद्यमान हैं, जिसके होने से रूमानी कविताओं में जान आ जाती है, कविता में कही प्रेम और विरह है तो कहीं अलगाव और एकांत। कविता में कहीं तो उसकी अपनी प्रियतम से मिलने की जिज्ञासा बलवती जान पड़ती है, कहीं विरह की ताप, कहीं प्रेम में शक्ति तो कहीं प्रेम से मिलने वाली सकारात्‍मकता। कवि ने जिन भावों का चित्रण अपनी कविताओं में किया है, वो देखते बनती हैं- प्रेम, सौंदर्य, विरह, आशा और उमंग के साथ संवेदनशीलता की जो छाप उन्‍होंने छोड़ी है वो वाकई काबिले तारीफ है।
कविता में दोहा छंद, चौपाई छंद मौजूद है। इनकी कविता में शृंगार रस, वात्‍सल्‍य रस और शांत रस की प्रधानता तो है ही साथ ही अगर अलंकारों की बात करूँ तो रूपक अलंकार, उपमा अलंकार, अनुप्रास अलंकार के साथ-साथ विरोधाभास और मानवीकरण अलंकार विद्यमान हैं।
मुझे अति प्रसन्‍नता की अनुभूति हो रही है कि मैं ऐसी पुस्‍तक की समीक्षा कर रही हूँ जो शृंगारिक कविताओं का संकलन है, जिसमें प्रेम है और जो हमें जीवन की हर चुनौतियों का सामना करना सीखाता है। प्रेम वह शक्ति है, जो हमारे अंदर साहस-आत्‍मविश्‍वास पैदा करता है साथ ही जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
ऐसी रचना के लिए प्रो० सुबोध झा साधुवाद के पात्र हैं। इन्‍होंने अपनी कविताओं के माध्‍यम से प्रेम की महत्ता बताने का प्रयास किया है। प्रेम का हमारे जीवन में क्‍या महत्‍व है कवि ने बड़े ही मार्मिक, सरल और सहज ढंग से बताने का प्रयास किया है।

(यह एक प्रेस रिलीज़ है)

AK
Author: AK

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