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Jehanabad News: “कुंठित समाज” कविता ने समाज की सच्चाई को किया उजागर

कुंठित समाज" कविता ने समाज की सच्चाई को किया उजागर
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मगध विश्वविद्यालय, बोधगया (बिहार) की हिंदी विभाग की स्नातकोत्तर छात्रा और अनुसंधायिका मानसी सिंह द्वारा लिखित कविता “कुंठित समाज” ने समाज की विकृतियों और जातिगत विभाजन की सच्चाई को सामने रखा है।

जातिवाद और सामाजिक विघटन पर कटाक्ष

इस कविता में समाज में व्याप्त जातिवाद, भेदभाव और राजनीतिक स्वार्थों पर गहरा प्रहार किया गया है। कवयित्री मानसी सिंह लिखती हैं कि जब समाज में विकृतियां सर्वव्याप्त हो जाती हैं और पढ़े-लिखे लोग भी चुप्पी साध लेते हैं, तब स्थिति और भी दयनीय हो जाती है

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कविता में यह भी दर्शाया गया है कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान को चुनावी मुद्दा बनाकर जातिवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने लिखा:

“कोई बनाया चुनावी मुद्दा;
कोई चेहरे चमका रहा,
कोई इसी की बात करके
जातिवाद फैला रहा।”

समाज को एकजुट होने का संदेश

कवयित्री ने समाज में व्याप्त बंटवारे और इसके दुष्परिणामों को लेकर चिंता व्यक्त की है। वे कहती हैं कि अगर समाज इसी तरह विभाजित होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां बर्बाद हो जाएंगी और उन्हें कोई सहारा नहीं मिलेगा।

“फिर तेरी इस विकृत मानसिकता
बर्बाद करेंगी पीढ़ियां।
फिर वो कहां जाएंगे,
कौन उन्हें बचाएगा?”

कविता को मिली सराहना

इस कविता को पढ़ने के बाद कई पाठकों ने मानसी सिंह की सोच और लेखनी की प्रशंसा की। यह कविता समाज को आत्मविश्लेषण करने और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए प्रेरित करती है

“कुंठित समाज” कविता केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी और बदलाव के लिए एक आह्वान है

AK
Author: AK

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