
आपने कभी किसी परिंदे को घोंसला से निकलने के बाद नही उड़ते हुए देखा है ? नही ना ? उसके मां बाप उसकी भोजन या परवरिस तब तक ही करते हैं , जबतक की उनके पंख नही निकले होते हैं। पंख निकलने के बाद तू कहां मैं कहा ? परंतु इंसान ही ऐसा प्राणी है जो बच्चे को अपने सोंच और सफलता के अनुरूप ढालने का प्रयास करते हैं। अपने बच्चे को उन्मुक्त ही नही करते की वे अपने विचारों और सोच की धागे से अपनी जिंदगी को प्रवाह दे सके। यही कारण है की बच्चे और पेरेंट्स के विचारो की टकराहट आज के अलगाव और इंटरेक्शन का अभाव का मूल कारण नजर आता है। हम अपने स्वार्थ और दूसरे के बच्चो के सफलता को ध्यान में रख उनको उत्प्रेरित करते हैं , जबकि हमे यह पता नहीं होता की हमारी सोच की बोझ हमारे बच्चे तब तक ही ढो पाते हैं जबतक वो minor होते हैं और हमारे सोच विचार को ढोते हुए टूट जाते हैं और असफल हो जाते हैं तो उनके अंदर से विरोधात्मक प्रतिक्रिया होती है की मुझे तो यह कभी पसंद ही नहीं था। पापा जबरदस्ती करा रहे थे। इसमें मेरी क्या ? पेरेंट्स कैसे भुल जाते हैं की एक आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर या इंजीनियर ही सफल नहीं हुए हैं बल्कि यहां तक कि उनकी औकात एक इतर विक्रेता और नमक विक्रेता के बराबर हो ही नही सकती। सफलता के क्षेत्र अनगिनत हैं। इसलिए बच्चे को उन्मुक्तता का बोध होने दे , वह तो करेगा वही जिसके लिए परमपिता परमेश्वर ने उसे बनाया है। हर उन्मुक्त परिंदा सफल हुआ है। आज father ‘s day का मेरा विचार।
Author: AK
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