सोम, फ़रवरी 9, 2026

Darbhanga FIR Case: दरभंगा में 70 ब्राह्मणों पर FIR, SC/ST एक्ट और सियासी बवाल

Darbhanga FIR Case: 70 Brahmins Booked Under SC/ST Act

दरभंगा में 70 ब्राह्मणों पर दर्ज FIR और SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर बिहार के मंत्री अशोक चौधरी की चेतावनी से सियासी और सामाजिक बहस तेज।

Darbhanga FIR Case: 70 Brahmins Booked Under SC/ST Act


परिचय: एक स्थानीय विवाद से राज्यव्यापी बहस तक

बिहार के दरभंगा जिले में दर्ज एक एफआईआर ने केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य में सामाजिक और राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। बकाया भुगतान को लेकर शुरू हुआ एक मामूली विवाद देखते ही देखते जातीय तनाव, कानून के दुरुपयोग और सामाजिक भाईचारे जैसे बड़े सवालों से जुड़ गया। इस मामले में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत ब्राह्मण समुदाय के 70 लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई, जिसके बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम जनता की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी का बयान इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है।


दरभंगा का मामला क्या है?

कुशेश्वर स्थान थाना क्षेत्र की घटना

यह पूरा विवाद दरभंगा जिले के कुशेश्वर स्थान थाना क्षेत्र के हरिनगर गांव से जुड़ा है। गांव में रहने वाले कैलाश पासवान, जो पेशे से राजमिस्त्री हैं, ने बकाया मजदूरी को लेकर शिकायत की थी। बताया गया कि वर्ष 2015 में कैलाश पासवान को केरल में हेमकांत झा की बहन के घर के निर्माण कार्य में लगाया गया था। उस समय से करीब 2.47 लाख रुपये का भुगतान बकाया बताया जा रहा है।

बकाया राशि बना विवाद की जड़

29 जनवरी को जब हेमकांत झा की बहन और बहनोई हरिनगर गांव आए, तो कैलाश पासवान ने उनकी कार रोककर बकाया राशि की मांग की। इसी दौरान विवाद बढ़ा, लेकिन गांव के ही श्रीनाथ झा ने बीच-बचाव करते हुए उन्हें सुरक्षित गांव से बाहर निकलने में मदद की। अगले दिन, यानी 30 जनवरी को, कथित तौर पर कैलाश पासवान और उनके साथियों ने श्रीनाथ झा और हेमकांत झा पर शारीरिक हमला किया।


पहली शिकायत और पुलिस कार्रवाई

जमानती धाराओं में मामला दर्ज

हेमकांत झा ने इस कथित हमले के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। चूंकि चोटें गंभीर नहीं बताई गईं, इसलिए पुलिस ने जमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। उस समय तक मामला एक सामान्य आपराधिक विवाद जैसा ही प्रतीत हो रहा था।

स्थिति ने लिया गंभीर मोड़

31 जनवरी को हालात अचानक बिगड़ गए। आरोप है कि ब्राह्मण बस्तियों के 150 से अधिक लोगों ने कैलाश पासवान और उनके भाइयों के घर पर हमला कर दिया। इस घटना में कुंद वस्तुओं से एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। इनमें से नौ लोगों को दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।


70 ब्राह्मणों पर FIR और SC/ST एक्ट

पुलिस की बड़ी कार्रवाई

उसी दिन कुशेश्वर स्थान पुलिस ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के तहत 70 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। इनमें हेमकांत झा का नाम भी आरोपियों की सूची में शामिल है। पुलिस ने अब तक 12 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।

गांव की सामाजिक संरचना

इस मामले में एक अहम तथ्य यह है कि हरिनगर गांव में करीब 2,500 से अधिक ब्राह्मण परिवार रहते हैं, जबकि पासवान समुदाय के लोगों की संख्या लगभग 60–70 बताई जा रही है। इसे लेकर सवाल उठने लगे कि क्या पूरी कार्रवाई संतुलित और निष्पक्ष है।


मंत्री अशोक चौधरी का बयान

SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर चेतावनी

बिहार के ग्रामीण निर्माण विभाग के मंत्री और जेडीयू के वरिष्ठ नेता अशोक चौधरी ने इस मामले पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। अशोक चौधरी स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं, इसलिए उनका बयान और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दहेज कानून का उदाहरण

मंत्री ने कहा कि चाहे SC/ST एक्ट हो या दहेज कानून, इनका उद्देश्य दलितों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। लेकिन यदि इन कानूनों का गलत इस्तेमाल होगा, तो इससे समाज में गलत संदेश जाएगा और जिन वर्गों के लिए ये कानून बने हैं, उनके प्रति सहानुभूति भी कम हो सकती है।


सामाजिक भाईचारे पर असर

कानून बनाम सामाजिक संतुलन

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कानून के सख्त प्रावधानों और सामाजिक संतुलन के बीच सही तालमेल कैसे बनाया जाए। यदि कानून का दुरुपयोग होता है, तो इससे समाज में अविश्वास और तनाव बढ़ता है।

जातीय ध्रुवीकरण की आशंका

दरभंगा FIR केस को लेकर कई सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई है कि इस तरह की घटनाएं जातीय ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकती हैं। बिहार जैसे राज्य में, जहां सामाजिक विविधता बहुत अधिक है, वहां ऐसी घटनाओं का असर दूरगामी हो सकता है।


राजनीतिक प्रतिक्रिया और सियासी बवाल

बीजेपी और जेडीयू की प्रतिक्रिया

इस मामले में सत्ताधारी गठबंधन के भीतर भी अलग-अलग सुर देखने को मिल रहे हैं। जहां एक ओर कानून के तहत कार्रवाई की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर मंत्री अशोक चौधरी जैसे नेता इसके दुरुपयोग पर सवाल उठा रहे हैं।

विपक्ष का रुख

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने का मौका बना लिया है। उनका कहना है कि सरकार या तो निर्दोष लोगों को फंसा रही है या फिर वास्तविक दोषियों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई नहीं कर पा रही।


पुलिस का पक्ष

SDP0 का बयान

बिरौल के सब-डिविजनल पुलिस अधिकारी प्रभाकर तिवारी ने स्पष्ट किया कि पूरे गांव के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया गया है। उनके अनुसार, प्रारंभिक जांच के आधार पर ही आरोपियों की पहचान की गई है और इसमें किसी जातिगत पूर्वाग्रह को नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

जांच की प्रक्रिया

पुलिस का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है और सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कदम उठाए जाएंगे।


आगे क्या?

न्यायिक प्रक्रिया की अहमियत

अब इस पूरे मामले का भविष्य न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है। अदालत में साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर ही यह तय होगा कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष।

समाज के लिए सबक

यह घटना समाज के लिए भी एक सबक है कि आपसी विवादों को हिंसा और सामूहिक बदले की भावना में बदलने से केवल नुकसान ही होता है। संवाद और कानून का सही इस्तेमाल ही किसी भी समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।


निष्कर्ष

दरभंगा में 70 ब्राह्मणों पर दर्ज एफआईआर केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी पहलुओं से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। मंत्री अशोक चौधरी का बयान इस बात की याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य सुरक्षा और न्याय है, न कि सामाजिक विभाजन। यदि इस मामले से सही सबक लिया गया, तो यह बिहार में सामाजिक भाईचारे को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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Author: AK

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