बिहार के गया में दहेज़ उत्पीड़न की शिकार महिला ने जान दी। वायरल वीडियो में पति की बर्बरता उजागर, FIR दर्ज, जांच शुरू।
Woman Dies After Dowry Abuse in Bihar’s Gaya, Video Goes Viral
गया में दहेज़ प्रताड़ना का दर्दनाक मामला: एक और बेटी खो गई
बिहार के गया जिले से एक अत्यंत दुखद और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहां दहेज़ उत्पीड़न की शिकार एक महिला ने आत्महत्या कर ली। इस मामले ने तब सनसनी फैला दी जब पीड़िता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें उसका पति उसे बेरहमी से पीटता नजर आ रहा है। घटना ने न सिर्फ कानून व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला दिया, बल्कि समाज की सोच पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
कौन थी निशा कुमारी?
सामान्य जीवन, असामान्य अंत
निशा कुमारी गया जिले के जनकपुर इलाके की रहने वाली थीं। उनका विवाह वर्ष 2015 में अभिषेक कुमार से हुआ था। विवाह के बाद जीवन सामान्य लग रहा था, लेकिन बेटी के जन्म के बाद सब बदल गया। पति और ससुराल वाले दहेज़ की मांग को लेकर निशा पर अत्याचार करने लगे।
परिवार वालों के अनुसार, शुरुआत में सब कुछ सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे पैसों की मांगें बढ़ने लगीं। बेटियों के जन्म के बाद ससुराल वालों ने ₹20,000 से ₹50,000 तक की अलग-अलग किस्तों में मांग की, जिसे निशा के मायके वालों ने कई बार पूरा किया भी। बावजूद इसके उत्पीड़न बंद नहीं हुआ।
वायरल वीडियो: अत्याचार का साफ़ सबूत
बिहार के गया में एक महिला के साथ बर्बरता की गई।
— Govind Pratap Singh | GPS (@govindprataps12) June 21, 2025
बच्चे चिल्लाते रहे, पिता को माँ से दूर करते रहे लेकिन वो नहीं माना.. बस मारते गया।
अब पता चला कि बच्चों की माँ नहीं रही।
ससुराल वालों पर हत्या के आरोप हैं।
क्या महिलाएं-क्या पुरुष, सब कहीं न कहीं उत्पीड़न झेल रहे हैं! pic.twitter.com/y7OxUsZmIh
बच्चों के सामने हुई बर्बरता
इस मामले को सार्वजनिक और राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाने वाला पहलू वह वीडियो है, जिसमें अभिषेक कुमार अपनी पत्नी निशा की बेरहमी से पिटाई करता नजर आ रहा है। यह वीडियो निशा की ही किसी रिश्तेदार ने रिकॉर्ड कर लिया था और अब सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हो चुका है।
वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि निशा के छोटे बच्चे पास ही बैठे हैं और वह दर्द से कराह रही है, लेकिन उसका पति लगातार उसे मार रहा है। यह वीडियो न सिर्फ एक सबूत है, बल्कि समाज के उस क्रूर चेहरे को भी सामने लाता है जो महिलाओं को दहेज़ के लिए यातना देने में पीछे नहीं हटता।
आत्महत्या या हत्या?
विरोधाभासी बयान
निशा की मौत की वजह पर दो पक्ष सामने आ रहे हैं। पति अभिषेक का दावा है कि घटना के दिन वह पटना में था और उसे फोन पर बताया गया कि निशा ने ज़हर खा लिया है। वहीं, निशा के पिता श्रवण कुमार ने इसे सीधे-सीधे हत्या बताया है।
श्रवण कुमार ने कहा, “मेरी बेटी लंबे समय से प्रताड़ना झेल रही थी। कई बार पंचायत भी बुलाई गई थी, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। यह आत्महत्या नहीं, सुनियोजित हत्या है।”
FIR दर्ज, जांच शुरू
पुलिस की सक्रियता
जनकपुर थाना पुलिस ने निशा के पिता की तहरीर पर अभिषेक कुमार और उसके परिवार वालों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है और जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पुलिस का कहना है कि जांच के आधार पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
समाज में दहेज़ प्रथा का बढ़ता प्रभाव
एक सामाजिक बीमारी
यह कोई पहला मामला नहीं है। बिहार और देश के अन्य हिस्सों में दहेज़ के कारण महिलाएं लगातार प्रताड़ित की जा रही हैं। शिक्षा और जागरूकता के अभाव में आज भी बेटियों को बोझ समझा जाता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल औसतन 6,000 से अधिक महिलाएं दहेज़ के कारण जान गंवाती हैं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग की विफलता है।
कानून क्या कहता है?
दहेज़ निषेध अधिनियम 1961
भारत सरकार ने दहेज़ की समस्या को नियंत्रित करने के लिए दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 लागू किया था, जिसके तहत दहेज़ लेना और देना दोनों अपराध हैं। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 304B और 498A के तहत दहेज़ हत्या और उत्पीड़न के मामलों में सजा का प्रावधान है।
फिर भी, सामाजिक दबाव, केस वापस लेने का डर, और न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी के कारण पीड़िताओं को न्याय नहीं मिल पाता।
क्या कर सकता है समाज?
समाधान की दिशा में प्रयास
- शिक्षा और जागरूकता – लड़कियों को सशक्त बनाना और समाज को जागरूक करना अनिवार्य है।
- महिला हेल्पलाइन और समर्थन समूह – पीड़िता के पास सहायता के कई विकल्प हों, ताकि वह अपनी आवाज़ उठा सके।
- पंचायत और समाज की भूमिका – स्थानीय स्तर पर प्रभावी निर्णय और सामाजिक दबाव उत्पीड़न को रोक सकता है।
- कानूनी सहायता – मुफ्त और शीघ्र कानूनी सहायता सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष: एक और बेटी गई, कब जागेगा समाज?
निशा की मौत केवल एक महिला की मौत नहीं है, बल्कि पूरे समाज की नैतिक हार है। जब तक दहेज़ जैसी कुप्रथा समाज में जीवित रहेगी, तब तक हजारों निशाएं शिकार बनती रहेंगी।
सरकार को चाहिए कि वह ऐसे मामलों में त्वरित न्याय दे, ताकि आरोपी सज़ा से बच न सकें। समाज को भी अपने भीतर झांकने की ज़रूरत है कि कहीं हम भी तो किसी निशा की चुप्पी में भागीदार नहीं हैं।
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Author: AK
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