मंगल, फ़रवरी 24, 2026

Will Bihar Lift Liquor Ban? बिहार में शराबबंदी खत्म होगी? नीतीश पर बढ़ा दबाव

Will Bihar Lift Liquor Ban Pressure on Nitish Kumar

बिहार में शराबबंदी को लेकर सियासत तेज हो गई है। सहयोगी दल समीक्षा की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार सामाजिक सुधार का दावा कर रही है। जानें पूरी स्थिति।

Will Bihar Lift Liquor Ban? Pressure on Nitish Kumar


बिहार में शराबबंदी खत्म होगी? जानें पूरी सच्चाई

बिहार में शराबबंदी एक बार फिर सियासत के केंद्र में आ गई है। पिछले कुछ वर्षों से लागू इस कानून को लेकर अब सरकार के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। खास बात यह है कि इस बार विपक्ष नहीं बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सहयोगी दल ही शराबबंदी की समीक्षा और इसमें बदलाव की मांग कर रहे हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या बिहार में शराबबंदी खत्म हो सकती है या सरकार अपने फैसले पर कायम रहेगी।

शराबबंदी को लेकर बिहार की राजनीति में यह बहस नई नहीं है, लेकिन इस बार जिस तरह सहयोगी दलों ने खुलकर विरोध किया है, उसने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। आम लोगों के मन में भी यह सवाल है कि क्या आने वाले समय में बिहार में शराब की बिक्री फिर शुरू हो सकती है।


बिहार में शराबबंदी कब और क्यों लागू हुई

सामाजिक सुधार के उद्देश्य से लिया गया फैसला

बिहार में अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे महिलाओं की मांग और सामाजिक सुधार के लिए जरूरी कदम बताया था। सरकार का मानना था कि शराब के कारण घरेलू हिंसा, अपराध और गरीबी बढ़ रही थी।

सरकार ने इस कानून के जरिए समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश की। शुरुआत में इसे महिलाओं का व्यापक समर्थन भी मिला, क्योंकि कई परिवार शराब के कारण आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से जूझ रहे थे।


सरकार का दावा: शराबबंदी से सामाजिक सुधार

घरेलू हिंसा में कमी का दावा

सरकार का कहना है कि शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ हिंसा और पारिवारिक झगड़ों में कमी आई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महिला उत्पीड़न के मामलों में लगभग 12 से 18 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है।

इसके अलावा, सरकार का यह भी दावा है कि शराबबंदी से गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है, क्योंकि अब लोग शराब पर पैसा खर्च नहीं कर रहे हैं।


सहयोगी दलों का विरोध क्यों बढ़ रहा है

आर्थिक नुकसान सबसे बड़ा मुद्दा

बिहार शराबबंदी का विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि इससे राज्य को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। शराब से मिलने वाला राजस्व बंद हो जाने से सरकार को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शराब बिक्री से मिलने वाला टैक्स राज्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में शराबबंदी से विकास कार्यों पर भी असर पड़ सकता है।


अवैध शराब का बढ़ता कारोबार

शराबबंदी के बावजूद बिहार में अवैध शराब का कारोबार जारी है। कई बार जहरीली शराब पीने से लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं।

कुछ नेताओं का कहना है कि शराबबंदी से अवैध तस्करों को फायदा हुआ है और एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन गई है। इससे सरकार को नुकसान और अपराधियों को फायदा हो रहा है।


सामाजिक और आर्थिक असर: दोनों पक्षों की दलील

समर्थकों का पक्ष

शराबबंदी के समर्थकों का मानना है कि यह कानून समाज के लिए जरूरी है। उनका कहना है कि इससे परिवारों में शांति आई है और महिलाओं की स्थिति बेहतर हुई है।

कई महिलाओं का कहना है कि शराबबंदी के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरी है।


विरोधियों का पक्ष

वहीं विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि कानून सही तरीके से लागू नहीं हो रहा है। उनका दावा है कि गरीब और कमजोर वर्ग के लोग ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जबकि बड़े तस्कर बच निकलते हैं।

कुछ नेताओं का सुझाव है कि पूर्ण शराबबंदी के बजाय नियंत्रित बिक्री की अनुमति दी जानी चाहिए।


गिरफ्तारी और कानून का प्रभाव

लाखों लोग हो चुके हैं गिरफ्तार

शराबबंदी लागू होने के बाद अब तक लाखों लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें बड़ी संख्या गरीब और ग्रामीण इलाकों के लोगों की है।

इससे यह बहस शुरू हो गई है कि क्या कानून का असर सही दिशा में हो रहा है या इसमें बदलाव की जरूरत है।


क्या शराबबंदी में बदलाव संभव है

सरकार की स्थिति

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब तक शराबबंदी के समर्थन में ही बयान दिए हैं। उनका कहना है कि यह कानून सामाजिक सुधार के लिए जरूरी है।

हालांकि, सहयोगी दलों के बढ़ते दबाव के कारण सरकार को भविष्य में इस कानून की समीक्षा करनी पड़ सकती है।


बिहार की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

राजस्व में भारी कमी

शराबबंदी से पहले बिहार को शराब से हजारों करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था। यह पैसा राज्य के विकास कार्यों में खर्च होता था।

शराबबंदी के बाद सरकार को इस आय का नुकसान हुआ है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ा है।


अन्य राज्यों से तुलना

भारत के ज्यादातर राज्यों में शराब की बिक्री की अनुमति है। कुछ राज्यों में नियंत्रित तरीके से शराब बेची जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नियंत्रित बिक्री से सरकार को राजस्व भी मिलता है और अवैध कारोबार भी कम होता है।


जनता की राय क्या है

मिश्रित प्रतिक्रिया

बिहार में शराबबंदी को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग इसे जरूरी मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसमें बदलाव चाहते हैं।

शहरी क्षेत्रों में कई लोग नियंत्रित बिक्री के पक्ष में हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का समर्थन अभी भी शराबबंदी के साथ है।


भविष्य में क्या हो सकता है

समीक्षा की संभावना

राजनीतिक दबाव को देखते हुए सरकार भविष्य में शराबबंदी की समीक्षा कर सकती है। हालांकि, इसे पूरी तरह हटाने का फैसला आसान नहीं होगा।

सरकार को सामाजिक और आर्थिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।


निष्कर्ष

बिहार में शराबबंदी एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। जहां सरकार इसे सामाजिक सुधार का महत्वपूर्ण कदम मानती है, वहीं सहयोगी दल और कुछ विशेषज्ञ इसके आर्थिक नुकसान और व्यावहारिक समस्याओं की ओर इशारा कर रहे हैं।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस कानून में बदलाव करती है या इसे पहले की तरह जारी रखती है।

फिलहाल इतना जरूर है कि बिहार शराबबंदी पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है और यह मुद्दा आगे भी राजनीति और समाज दोनों में चर्चा का विषय बना रहेगा।


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Author: AK

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