बिहार चुनाव में वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी को महागठबंधन से सिर्फ 15 सीटें मिलीं, लेकिन तेजस्वी यादव ने उन्हें राज्यसभा और विधान परिषद की सीटों का वादा कर समझौता कराया।
Why Mukesh Sahani Accepted 15 Seats: The Tejashwi Yadav Deal Explained
बिहार चुनाव 2025 में मुकेश सहनी और तेजस्वी यादव की डील का पूरा सच
बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राज्य की राजनीति फिर से उबाल पर है। हर चुनाव से पहले सीट बंटवारे को लेकर जो खींचतान होती है, वह इस बार भी जारी है। लेकिन इस बार सबसे ज्यादा चर्चा में हैं वीआईपी (विकासशील इंसान पार्टी) के प्रमुख मुकेश सहनी।
कभी एनडीए और कभी महागठबंधन के साथ रहने वाले सहनी ने आखिरकार इस बार राजद (RJD) के साथ समझौता कर लिया है। उन्हें महागठबंधन से सिर्फ 15 सीटें दी गई हैं, जबकि वह कम से कम 40 सीटों की मांग कर रहे थे।
तो आखिर क्या हुआ कि “सन ऑफ मल्लाह” कहे जाने वाले मुकेश सहनी इतनी कम सीटों पर भी मान गए? आइए जानते हैं इस पूरे राजनीतिक समीकरण को विस्तार से।
देर रात तक चला सीट बंटवारे का ड्रामा
गुरुवार की देर रात तक महागठबंधन में सीटों का बंटवारा चल रहा था। नामांकन की अंतिम तिथि (17 अक्टूबर) से ठीक एक दिन पहले सीटों को लेकर RJD, कांग्रेस और VIP में लंबी बातचीत चली।
वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस टालते रहे — पहले दोपहर 12 बजे, फिर 4 बजे, और फिर शाम 6 बजे। इससे संकेत मिल रहे थे कि बातचीत में कुछ अड़चन है।
सूत्रों के मुताबिक, आखिरी क्षणों में तेजस्वी यादव ने हस्तक्षेप किया और व्यक्तिगत रूप से सहनी से बात की। साथ ही, दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के साथ भी चर्चा हुई। बताया जाता है कि राहुल गांधी ने खुद फोन कर सहनी को मनाने की कोशिश की।
अंततः एक राजनीतिक डील तय हुई — जिसमें मुकेश सहनी को 15 विधानसभा सीटें तो दी गईं, लेकिन बदले में कुछ बड़े वादे किए गए।
मुकेश सहनी के लिए तेजस्वी यादव के दो बड़े वादे
सूत्रों के मुताबिक, इस समझौते में RJD ने VIP प्रमुख को दो खास आश्वासन दिए हैं:
- राज्यसभा की एक सीट — अगली राज्यसभा रिक्ति में वीआईपी को प्रतिनिधित्व देने का वादा किया गया है।
- विधान परिषद में दो सीटें — वीआईपी के दो नेताओं को बिहार विधान परिषद में भेजने का वादा भी हुआ है।
यानी, भले ही विधानसभा सीटें कम मिली हों, लेकिन सत्ता के समीकरण में वीआईपी को सम्मानजनक हिस्सेदारी का भरोसा मिला है। यही वजह रही कि मुकेश सहनी ने आखिरी क्षण में 15 सीटों पर समझौता कर लिया।
क्यों घट गई वीआईपी की बार्गेनिंग पावर?
पिछले चुनाव में मुकेश सहनी ने खुद को एक बड़े नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। उन्होंने दावा किया था कि निषाद या मल्लाह समाज की बिहार में 12 से 15 प्रतिशत आबादी है, और वे इस वर्ग के “प्राकृतिक नेता” हैं।
लेकिन, 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद वीआईपी की ताकत काफी कमजोर हो गई।
तथ्य यह है कि पिछली बार जब वीआईपी एनडीए के साथ थी, तब उसने 11 सीटों पर चुनाव लड़ा और चार विधायक जीते। लेकिन कुछ ही समय में सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए।
परिणामस्वरूप, वीआईपी पार्टी के पास न तो कोई विधायक बचा और न ही कोई प्रभावशाली चेहरा।
इस बार जब उन्होंने 40 सीटों की मांग की, तो RJD के पास इसे स्वीकार करने का कोई राजनीतिक तर्क नहीं था। यही कारण है कि उनकी मोलभाव करने की शक्ति (bargaining power) कमजोर पड़ गई।
तेजस्वी यादव की रणनीति: समझौते में सम्मान बचाना
तेजस्वी यादव को यह अच्छी तरह समझ है कि चुनाव में हर समुदाय की भागीदारी जरूरी है।
भले ही वीआईपी के पास संगठनात्मक शक्ति सीमित है, लेकिन मल्लाह समुदाय का वोट बैंक कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है।
इसलिए, तेजस्वी ने यह जोखिम नहीं लिया कि मुकेश सहनी नाराज होकर दोबारा गठबंधन तोड़ दें, जैसा उन्होंने 2020 में किया था।
इस बार RJD ने उन्हें कम सीटें लेकिन बड़े वादे देकर गठबंधन में बनाए रखा।
इससे तेजस्वी ने दो लक्ष्य हासिल किए:
- गठबंधन की एकजुटता बनी रही, और
- सहनी को सम्मानजनक एग्जिट या रोल दिया गया।
मुकेश सहनी की बदलती राजनीतिक यात्रा
मुकेश सहनी की राजनीति बिहार में एक दिलचस्प सफर रही है।
- उन्होंने शुरुआत एनडीए के साथ की थी, लेकिन 2020 में टिकट बंटवारे से नाराज होकर महागठबंधन में चले गए।
- बाद में अंतिम क्षणों में RJD से मतभेद होने के कारण फिर एनडीए में लौट आए।
- चुनाव के बाद जब उनके विधायक भाजपा में शामिल हो गए, तो सहनी राजनीतिक रूप से अकेले पड़ गए।
अब 2025 में, उन्होंने एक बार फिर तेजस्वी यादव के साथ हाथ मिलाया है।
यह कदम दर्शाता है कि सहनी ने इस बार व्यावहारिक राजनीति अपनाई है — ज्यादा सीटों की मांग छोड़कर लंबे भविष्य की रणनीति पर ध्यान दिया है।
क्या महागठबंधन को इससे फायदा होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुकेश सहनी को साथ रखने से महागठबंधन को सीमित लाभ होगा।
उनकी पार्टी भले ही 15 सीटों पर लड़ेगी, लेकिन उनका जातीय प्रभाव कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है — खासकर दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, सहरसा और मधेपुरा जैसे जिलों में।
अगर वीआईपी अपने वोट बेस को RJD के पक्ष में स्थानांतरित कर पाती है, तो यह महागठबंधन के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
हालांकि, कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि वीआईपी के पास न तो मजबूत संगठन है, न उम्मीदवारों का नेटवर्क। इसलिए सीट जीतना मुश्किल रहेगा।
राजनीतिक समीकरण और भविष्य की दिशा
बिहार की राजनीति में कोई भी समझौता स्थायी नहीं होता।
तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी के बीच यह डील चुनाव तक चलती है या नहीं, यह समय बताएगा।
लेकिन इतना तय है कि दोनों नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक हितों को संतुलित करने की कोशिश की है।
मुकेश सहनी ने अपने समुदाय में यह संदेश भेजने की कोशिश की है कि उन्होंने “सम्मान के साथ समझौता” किया है, जबकि तेजस्वी यादव ने गठबंधन की एकता और नियंत्रण दोनों बनाए रखे हैं।
निष्कर्ष: सम्मान और रणनीति दोनों की राजनीति
बिहार चुनाव 2025 में यह डील एक मिसाल है कि राजनीति केवल सीटों की गिनती नहीं, बल्कि सम्मान और रणनीति का खेल भी होती है।
मुकेश सहनी भले ही 15 सीटों पर सिमट गए हों, लेकिन उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि भविष्य की राजनीति में उनकी भूमिका बनी रहे।
वहीं तेजस्वी यादव ने यह दिखाया कि वे समझौते की राजनीति में भी नेतृत्व का संतुलन बनाए रखना जानते हैं।
यह समझौता आने वाले हफ्तों में बिहार के चुनावी माहौल को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा।
अब देखना यह होगा कि वीआईपी इन 15 सीटों पर क्या प्रदर्शन करती है — और क्या तेजस्वी यादव के वादे चुनाव के बाद भी पूरे होते हैं या नहीं।
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Author: AK
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