बिहार में SIR पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को आधार और वोटर ID स्वीकारने का निर्देश दिया, गरीबों को वंचित न करने की सलाह दी।
Supreme Court on Bihar SIR: Accept Aadhaar and Voter ID

बिहार SIR विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा – समावेश जरूरी, बहिष्कार नहीं
मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया पर अदालत की कड़ी टिप्पणी
बिहार में चल रही Special Intensive Revision (SIR) यानी गहन मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज हो गई है। याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों और चुनाव आयोग के रुख को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को आधार कार्ड और वोटर ID को मान्यता देने का निर्देश दिया है।
यह मामला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह करोड़ों लोगों के मताधिकार से जुड़ी संवेदनशील बहस बन चुका है।
SIR क्या है और क्यों है विवाद में?
2003 के बाद पहला गहन संशोधन
बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले 24 जून 2024 को शुरू हुई यह प्रक्रिया 2003 के बाद का पहला गहन मतदाता सूची संशोधन है। इसका उद्देश्य है:
- पुराने, मृत या अपात्र मतदाताओं को सूची से हटाना
- नए योग्य मतदाताओं को जोड़ना
- मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना
लेकिन याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह प्रक्रिया असंवैधानिक है और इससे लाखों गरीब और प्रवासी मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
गरीबों और प्रवासियों के लिए यह प्रक्रिया कठिन
याचिकाकर्ताओं में प्रमुख संगठन हैं –
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR)
- पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL)
- राजद सांसद मनोज झा
- टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा
इनकी आपत्ति है कि चुनाव आयोग ने आधार, वोटर ID और राशन कार्ड को अस्वीकार कर ऐसे दस्तावेजों की सूची दी है जो गरीबों के पास नहीं होते, जैसे जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन ने कोर्ट को बताया कि बिहार की 87% आबादी के पास आधार है, लेकिन केवल 14% के पास मैट्रिक सर्टिफिकेट और 2% के पास पासपोर्ट है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
“किसी एक दस्तावेज को खारिज करना सही नहीं”
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट कहा कि किसी भी दस्तावेज को, जिसमें आधार और वोटर ID शामिल हैं, पूरी तरह से खारिज करना तार्किक नहीं है।
जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा – “कौन सा दस्तावेज पूरी तरह प्रमाणिक होता है? अगर कोई फर्जी दस्तावेज देता है, तो उस पर कार्रवाई करें, लेकिन पूरी प्रक्रिया को बहिष्कार का जरिया न बनाएं।”
चुनाव आयोग का पक्ष
“सत्यापन के लिए मजबूत दस्तावेज जरूरी”
चुनाव आयोग ने कहा कि उसने सत्यापन की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए ही 11 दस्तावेजों की सूची बनाई है, जिनमें आधार और वोटर ID नहीं हैं क्योंकि उन्हें जाली बनाना आसान है।
लेकिन कोर्ट का कहना है कि कोई भी दस्तावेज पूरी तरह सुरक्षित नहीं, फिर भी आधार और EPIC जैसे सामान्य पहचानपत्रों को खारिज नहीं किया जा सकता।
2.9 करोड़ मतदाता हो सकते हैं प्रभावित
2003 की सूची में शामिल नहीं थे ये मतदाता
यह अनुमान लगाया गया है कि करीब 2.9 करोड़ मतदाता, जो 2003 की सूची में नहीं थे, अब उन्हें अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी।
अधिकतर ऐसे लोग दलित, अल्पसंख्यक, गरीब, और प्रवासी मजदूर हैं, जिनके पास आयोग द्वारा मान्य दस्तावेज नहीं हैं। ऐसे में यह संशोधन उनके वोटिंग अधिकार पर सीधा हमला साबित हो सकता है।
कोर्ट का फोकस: समावेशी प्रक्रिया हो
सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट है –
- दस्तावेजों की सूची में आधार, EPIC और राशन कार्ड को शामिल किया जाए
- प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवेदनशीलता रखी जाए
- लोगों को प्रक्रिया से बाहर करने के बजाय शामिल करने पर जोर दिया जाए
- फर्जी दस्तावेज की स्थिति में व्यक्ति-विशेष पर कार्रवाई हो
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
राजनीतिक दलों ने इस प्रक्रिया की कड़ी आलोचना की है।
- मनोज झा ने कहा कि यह लोकतंत्र पर हमला है
- महुआ मोइत्रा ने सवाल उठाया कि गरीबों पर ही दस्तावेजों का बोझ क्यों
सिविल सोसायटी और मानवाधिकार संगठनों ने भी इस कदम को जनविरोधी और असंवेदनशील करार दिया है।
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Author: AK
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