गुरु, जनवरी 15, 2026

Darbhanga Queen Maharani Kamsundari Devi: 600 किलो सोना भारत को देने वाली बिहार की महारानी का देहांत

दरभंगा राज परिवार की महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के बाद उनकी 600 किलो सोना दान करने वाली ऐतिहासिक सेवा और देशभक्ति की विरासत फिर चर्चा में है।

Queen Who Donated 600 Kg Gold Passes Away


600 किलो सोना दान करने वाली महारानी का निधन

परिचय

बिहार के मिथिला क्षेत्र में एक युग का अंत हो गया है। दरभंगा राज परिवार की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके जाने से सिर्फ एक राजपरिवार नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और राष्ट्रभक्ति की एक पूरी परंपरा भी जैसे शांत हो गई। महारानी कामसुंदरी देवी उस परिवार से थीं जिसने देश के संकट के समय अपना खजाना, जमीन, विमान और यहां तक कि 600 किलो सोना भी भारत को दान कर दिया था। आज जब लोग निजी संपत्ति को ही सब कुछ मानते हैं, तब दरभंगा राज परिवार की यह विरासत नई पीढ़ी को यह सिखाती है कि राष्ट्रसेवा सबसे बड़ा धर्म होता है।


महारानी कामसुंदरी देवी का जीवन परिचय

राजपरिवार से जुड़ा गौरव

महारानी कामसुंदरी देवी दरभंगा रियासत के अंतिम शासक महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। उनका विवाह 1940 के दशक में हुआ था। महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन 1962 में हुआ, जिसके बाद राजपरिवार की जिम्मेदारी काफी हद तक महारानी के कंधों पर आ गई। उन्होंने राजसी वैभव से अधिक सादगी और सेवा को महत्व दिया।

सादगी और परंपरा का संगम

हालांकि वह एक राजघराने से थीं, लेकिन उनका जीवन बेहद साधारण था। उन्होंने हमेशा गरीबों की मदद, मंदिरों की सेवा और शिक्षा के प्रसार को प्राथमिकता दी। कल्याणी निवास में रहते हुए उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखा और समाज के हर वर्ग से जुड़े रहने का प्रयास किया।


पूरे मिथिला में शोक की लहर

अंतिम संस्कार की तैयारियां

महारानी कामसुंदरी देवी ने दरभंगा स्थित कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही मिथिला के हर कोने से लोग शोक प्रकट करने पहुंचे। अंतिम संस्कार श्यामा माई मंदिर परिसर में पारंपरिक विधि-विधान से किया गया। प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए ताकि बड़ी संख्या में आने वाले लोगों को कोई असुविधा न हो।

राजपरिवार की प्रतिक्रिया

राजपरिवार ने उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया। परिवार के सदस्यों के अनुसार महारानी सिर्फ एक परिवार की मुखिया नहीं थीं, बल्कि पूरे मिथिला के लिए एक मार्गदर्शक थीं।


दरभंगा राज परिवार की ऐतिहासिक विरासत

महात्मा गांधी से जुड़ा संबंध

दरभंगा राज परिवार का स्वतंत्रता संग्राम से गहरा संबंध रहा है। जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और उन्हें अपने आंदोलन के लिए आर्थिक व प्रचार सहयोग की जरूरत थी, तब उन्होंने दरभंगा राज को पत्र लिखा था।

महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने वह पत्र मिलते ही पूरा मीडिया प्रबंधन संभाला और गांधी जी को आर्थिक सहायता दी। इस तरह दरभंगा राज महात्मा गांधी का पहला बड़ा सहयोगी बना। वह पत्र आज भी सुरक्षित रखा गया है, जो इस ऐतिहासिक रिश्ते की गवाही देता है।


1962 का युद्ध और 600 किलो सोने का दान

भारत-चीन युद्ध में ऐतिहासिक योगदान

साल 1962 में जब भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ, तब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था। उस समय दरभंगा राज परिवार सबसे पहले आगे आया। दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में करीब 15 मन यानी लगभग 600 किलो सोना तौलकर सरकार को दान किया गया।

यह कोई सामान्य दान नहीं था। उस समय सोने की कीमत और उसकी राष्ट्रीय महत्व को देखते हुए यह कदम आज भी भारतीय इतिहास में एक मिसाल माना जाता है।

विमान और एयरपोर्ट भी देश को सौंपा

केवल सोना ही नहीं, दरभंगा राज परिवार ने अपने तीन निजी विमान भी सरकार को सौंप दिए। इतना ही नहीं, लगभग 90 एकड़ में फैला उनका निजी एयरपोर्ट भी देश को दान कर दिया गया। आज उसी भूमि पर दरभंगा एयरपोर्ट खड़ा है, जो लाखों यात्रियों की सेवा कर रहा है।


शिक्षा और समाज के लिए योगदान

विश्वविद्यालय के लिए भूमि दान

दरभंगा राज परिवार का मानना था कि शिक्षा ही समाज को आगे बढ़ाती है। इसी सोच के तहत उन्होंने देश को पहली यूनिवर्सिटी के लिए करीब 230 एकड़ जमीन दान की। यह उस समय एक बहुत बड़ा कदम था, क्योंकि इतनी भूमि की कीमत आज अरबों में होती।

कांग्रेस आंदोलन को सहयोग

इंडियन नेशनल कांग्रेस के संस्थापक एओ ह्यूम को भी दरभंगा राज परिवार ने आर्थिक मदद दी थी। 1880 के दशक में हर साल करीब 10 हजार रुपये का सहयोग दिया जाता था, जो उस समय बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी।


महारानी कामसुंदरी देवी की भूमिका

परंपराओं की संरक्षक

महारानी कामसुंदरी देवी ने अपने जीवन में राजपरिवार की सभी परंपराओं को जीवित रखा। उन्होंने धार्मिक आयोजनों, सामाजिक सेवा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को निरंतर प्रोत्साहित किया।

गरीबों और जरूरतमंदों की मदद

उनके दरवाजे पर कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। शिक्षा, चिकित्सा और विवाह जैसे मामलों में वे व्यक्तिगत रूप से मदद करती थीं। यही वजह है कि मिथिला के लोग उन्हें सिर्फ महारानी नहीं, बल्कि एक मातृ समान व्यक्तित्व मानते थे।


मिथिला और बिहार के लिए क्या मायने रखता है यह विरासत

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज के समय में जब अक्सर स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, दरभंगा राज परिवार की कहानी हमें यह सिखाती है कि समाज और देश के लिए भी कुछ करना चाहिए। 600 किलो सोना दान करना केवल धन की बात नहीं, बल्कि त्याग और देशभक्ति की भावना का प्रतीक है।

इतिहास का जीवंत उदाहरण

दरभंगा राज परिवार और महारानी कामसुंदरी देवी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे राजसी शक्ति को भी जनसेवा में बदला जा सकता है।


निष्कर्ष

महारानी कामसुंदरी देवी का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि यह उस सोच का अंत है जिसमें संपत्ति से अधिक महत्व सेवा और राष्ट्र को दिया जाता था। दरभंगा राज परिवार ने अपने इतिहास में जो दान, बलिदान और सेवा की मिसालें कायम की हैं, वे आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी।

600 किलो सोना, विमान, एयरपोर्ट और जमीन दान करने की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि यह याद दिलाती है कि जब देश पुकारे तो अपने निजी हितों से ऊपर उठकर खड़ा होना ही सच्ची देशभक्ति है।

मिथिला की धरती हमेशा महारानी कामसुंदरी देवी और दरभंगा राज परिवार की इस अमूल्य विरासत को सम्मान के साथ याद करती रहेगी।

यह भी पढ़ेTRAI ने जारी किए नए सिम कार्ड Rule, अब नहीं करवाना पड़ेगा महंगा रिचार्ज, यहां देखें पूरी डिटेल्स

यह भी पढ़ेBAFTA Awards 2025:ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ समेत 4 भारतीय फिल्मों का देखेगा BAFTA 2025 में जलवा , यहां देखें फिल्मों की लिस्ट

दरभंगा राज परिवार, महारानी कामसुंदरी देवी, 600 किलो सोना दान, मिथिला इतिहास, बिहार राजघराना, भारत चीन युद्ध दान

AK
Author: AK

! Let us live and strive for freedom ! Freelance Journalist ! Politics ! News Junky !

Relates News

Discover more from DW Samachar

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading