शनि, अप्रैल 4, 2026

नहीं रहें 52 बूटी के दिग्गज कपिल देव प्रसाद, पिछले साल पद्मश्री से हुए थे सम्मानित, जानिए क्या है बावन बूटी कला

Nalanda's 'Bawan Buti' saree maestro Padma Shri Kapil Dev Prasad receiving padma award from pesident murmu

बिहार की बावन बूटी कला को इंटरनेशनल लेवल पर पहचान दिलाने वाले पद्मश्री कपिल देव प्रसाद का निधन हो गया। 71 साल से कपिल प्रसाद हृदय रोग से पीड़ित थे। पटना के प्राइवेट हॉस्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर सुन नालंदा ही नहीं पूरे बिहार में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। कपिल देव प्रसाद का अंतिम संस्कार आज राजधानी पटना के फतुहा स्तिथ त्रिवेणी घाट पर किया जाएगा।

पिछले वर्ष पद्मश्री से हुए थे सम्मानित

Nalanda's 'Bawan Buti' saree maestro Padma Shri Kapil Dev Prasad receiving padma award from pesident murmu
Kapil dev Prasad Singh Receiving Padma Shri Award from president of India Droupadi Murmu

बिहार के नालंदा के बसवन बीघा निवासीकपिल देव प्रसाद का जन्म 5 अगस्त 1955 को हुआ था। कपिल देव प्रसाद ने अपने दादा एवं पिता से बावन बूटी कला का हुनर सीखा था। इन्होंने इस कला को देश और विदेशों में पहचान दिलाई थी। सूती या तसर के कपड़े पर हाथ से एक जैसी 52 बूटियां यानी मौटिफ टांके जाने के कारण कपिल देव प्रसाद को पिछले वर्ष 2023 के अप्रैल महीने में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया था।

खास तरह के एक जैसे 52 टांकों की कला

नालंदा के एक गांव को कपिल देव प्रसाद के नाम से पहचाना जाता है। जिला मुख्यालय बिहारशरीफ के बसवन बीघा गांव निवासी कपिल देव प्रसाद ने बाप-दादा से सीखे हुनर को लोगों में बांटकर रोजगार का एकमाध्यम विकसित कर दिया।
बावन बूटी मूलत: एक तरह की बुनकर कला है। सूती या तसर के कपड़े पर हाथ से एक जैसी 52 बूटियां यानि मौटिफ टांके जाने के कारण इसे बावन बूटी कहा जाता है। बूटियों में बौद्ध धर्म-संस्कृति के प्रतीक चिह्नों की बहुत बारीक कारीगरी होती है। बावन बूटी में कमल का फूल, बोधि वृक्ष, बैल, त्रिशूल, सुनहरी मछली, धर्म का पहिया, खजाना, फूलदान, पारसोल और शंख जैसे प्रतीक चिह्न ज्यादा मिलते हैं। बावन बूटी की साड़ियां सबसे ज्यादा डिमांड में रहती हैं, वैसे इस कला से पूर्व परिचित लोग बावन बूटी चादर और पर्दे भी खोजते हैं। कपिल देव प्रसाद के दादा शनिचर तांती ने इसकी शुरुआत की थी। फिर पिता हरि तांती ने सिलसिले को आगे बढ़ाया। जब 15 साल के थे, तभी इसे रोजगार के रूप में अपना लिया। अब इस कला को आगे उनके बेटे के द्वारा जारी रखा जा रहा है।

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AK
Author: AK

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