
जीवित्पुत्रिका/जितिया व्रत उत्तर भारत में मनाये जाने वाला तीन दिवसीय पर्व है।यह पर्व आश्विन माह में कृष्ण-पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक तीन दिनों तक मनाया जाता है। यह पर्व उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में मनाया जाता है। इसके अलावा नेपाल के मिथिला और थरुहट में भी मनाया जाता है। जितिया व्रत पूरे तीन दिन तक चलता है। यह व्रत संतान की मंगल कामना के लिए किया जाता है। व्रत के दूसरे दिन व्रती महिलाये पूरे दिन और पूरी रात निर्जला मतलब जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करती है। तीसरे दिन सुबह पारण करती है महिलाये। इस व्रत में नोनी साग, सतपुतिया की सब्जी, मछली और मडुआ रोटी का विशेष महत्व है।
09 सितम्बर- नहाय-खाय
10 सितम्बर- खर जितिया व्रत दिवस
11 सितम्बर- पारण
व्रत मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

इस बार जितिया व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि का प्रारंभ 09 सितंबर बुधवार को दोपहर 01:35 बजे पर होगा। जो 10 सितंबर, गुरुवार दोपहर 03:04 बजे तक रहेगी। व्रती उदया तिथि की मान्यता के अनुसार यह व्रत 10 सिंतबर को रखेंगे। जितिया व्रत के पहले दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले जागकर स्नान करके पूजा करती हैं और फिर एक बार भोजन ग्रहण करती हैं और उसके बाद पूरा दिन निर्जला रहती हैं। दूसरे दिन सुबह स्नान के बाद महिलाएं पूजा-पाठ करती हैं और फिर पूरा दिन निर्जला व्रत रखती हैं। व्रत के तीसरे दिन महिलाएं पारण करती हैं। सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही महिलाएं अन्न ग्रहण कर सकती हैं। मुख्य रूप से पर्व के तीसरे दिन झोर भात, मरुवा की रोटी और नोनी का साग खाया जाता है। अष्टमी को प्रदोषकाल में महिलाएं जीमूतवाहन की पूजा करती है। जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, अक्षत, पुष्प, फल आदि अर्पित करके फिर पूजा की जाती है। इसके साथ ही मिट्टी और गाय के गोबर से सियारिन और चील की प्रतिमा बनाई जाती है। प्रतिमा बन जाने के बाद उसके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है। पूजन समाप्त होने के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुननी चाहिए। इस व्रत को करने से संतान की उम्र लंबी होती है और वह माता-पिता ही नहीं बल्कि पूरे कुल का नाम रोशन करता है।
Author: AK
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