झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड आंदोलन के प्रणेता शिबू सोरेन का 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। पूरे राज्य में शोक की लहर।
Jharkhand Leader Shibu Soren Passes Away: End of an Era
शिबू सोरेन: झारखंड की आत्मा और जनआंदोलन के प्रतीक
झारखंड की राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले शिबू सोरेन का निधन सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक युग का अवसान है। उन्होंने सिर्फ एक राजनीतिक दल का नेतृत्व नहीं किया, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को अधिकारों, सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई के लिए प्रेरित किया। 81 वर्षीय सोरेन पिछले कुछ समय से बीमार थे और दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में भर्ती थे। 3 अगस्त 2025 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

हेमंत सोरेन ने पिता को खोने के दुख में लिखा – “आज मैं शून्य हो गया…”
झारखंड के मुख्यमंत्री और शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन स्वयं उस समय अस्पताल में मौजूद थे। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा –
“आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं…”
उनकी यह भावुक प्रतिक्रिया पूरे झारखंड की भावना को दर्शाती है, जो आज अपने “गुरुजी” को खो चुका है।
आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं।
— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) August 4, 2025
आज मैं शून्य हो गया हूँ…
अलग झारखंड राज्य की लड़ाई के अगुवा
झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान झारखंड के धनबाद जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक जीवन से ही आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया। 1972 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की, जिसका मूल उद्देश्य था — आदिवासियों को जमीन का अधिकार, सम्मानजनक जीवन और एक अलग राज्य झारखंड।
आंदोलन से सत्ता तक का सफर
शिबू सोरेन ने न केवल जनांदोलन खड़ा किया, बल्कि उसे राजनीतिक ताकत में बदल दिया। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र सरकार में भी मंत्री पद संभाला। उनका सफर संघर्ष, बलिदान और नेतृत्व का प्रतीक है। अलग राज्य की मांग को लेकर उन्होंने कई वर्षों तक शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया, जिससे अंततः 15 नवंबर 2000 को झारखंड का गठन हुआ।
‘दिशोम गुरुजी’ की छवि
शिबू सोरेन को उनके समर्थक और पार्टी कार्यकर्ता ‘दिशोम गुरुजी’ के नाम से संबोधित करते थे। यह नाम उन्हें उस सम्मान का प्रतीक बनाता है जो जनमानस ने उन्हें दिया। वे गरीबों, आदिवासियों, दलितों और वंचितों के सच्चे प्रतिनिधि माने जाते थे।
झारखंड की राजनीति में अमिट छाप
सामाजिक बदलाव की चेतना
शिबू सोरेन ने केवल सत्ता के लिए राजनीति नहीं की। उन्होंने सामाजिक चेतना का अलख जगाया। भूमि अधिकार, शिक्षा, और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण जैसे मुद्दे उनके एजेंडे में सर्वोपरि थे। उन्होंने ऐसे समय में झारखंड के लिए आवाज़ उठाई, जब वहां के लोगों की पहचान तक को मुख्यधारा में जगह नहीं मिलती थी।
विवाद और चुनौतियाँ भी रही
उनकी राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव भी रहे। झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड से लेकर हत्या के आरोपों तक, उन्होंने कई आरोपों का सामना किया, परंतु उनका जनाधार कभी डगमगाया नहीं। उनका व्यक्तित्व और संघर्षशील छवि जनता में गहरी छाप छोड़ती रही।
अंतिम विदाई और राष्ट्रीय शोक
उनके निधन के बाद झारखंड में तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गई है। रांची में उनकी अंतिम यात्रा में हजारों की संख्या में लोग उमड़े। कई राष्ट्रीय नेताओं, पूर्व प्रधानमंत्रियों, और क्षेत्रीय दलों ने उनके योगदान को याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की।
आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा
शिबू सोरेन का जीवन राजनीतिक आकांक्षा से कहीं ऊपर, एक सामाजिक जागरण की मिसाल है। आज जब भारत विविधता, समानता और न्याय की बात करता है, तो शिबू सोरेन जैसे नेता हमें याद दिलाते हैं कि असली नेतृत्व जमीनी संघर्ष से उपजता है।
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Author: AK
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