बुध, फ़रवरी 4, 2026

Jehanabad News: विश्व योद्धा स्वर्गीय इंद्रदेव सिंह की पत्नी ने 22 फरवरी को दुनिया को अलविदा कह गई।

The wife of the late war hero Indradev Singh bids farewell to the world on February 22nd.

वीर नारी से नवाजी गई 105 वर्षीय, अलकारी देवी ने गुमनामी में बिता दी जिंदगी।

The wife of the late war hero Indradev Singh bids farewell to the world on February 22nd.

जहानाबाद :- हुलासगंज प्रखंड के लोदीपुर गांव की वीर नारी के सम्मान से नवाजी गई स्वर्गीय इंद्रदेव सिंह की पत्नी अलकारी देवी इस महिने के 22 तारिख को गया स्थित मिलिट्री अस्पताल में अन्तिम सांस ली। यह विडंबना ही कहा जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की ओर से विभिन्न देशों में अपनी वीरता, पराक्रम और युद्ध कौशल का परिचय देते हुए कई वार मेडल प्राप्त करने वाले स्वर्गीय इंद्रदेव सिंह की पत्नी के अंतिम संस्कार में प्रशासन और सरकारी महकमा से कोई उपस्थित नहीं था। स्वर्गीय इंद्रदेव सिंह जिनके वीरता और पराक्रम के किस्से कहानियां आज भी हुलासगंज प्रखंड क्षेत्र में प्रचलित है। भारत को आजादी दिलाने की शर्त पर ब्रिटिश रॉयल सैनिक के रूप में द्वितीय विश्व युद्ध में वे लड़े और अद्भुत पराक्रम करते हुए कई देशों में अपनी सेवा एक सैनिक के रूप में दिया। वीर योद्धा इंद्रदेव सिंह गुमनामी में ही दुनिया से विदा हो गए। उनकी 105 वर्षीय धर्मपत्नी अलकारी देवी उनके मेडल और उनकी यादों को सहेज कर रखी हुई थी लेकीन अंततः वे भी गुमनामी में ही इस महीने के 22 तारिख को दुनियां को अलविदा कह गई।

       जैसा कि ज्ञात हो कि द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने वाले इंद्रदेव सिंह को संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से विश्व योद्धा का प्रमाण पत्र और मेडल मिला लेकिन अपने ही देश में उनकी विधवा पत्नी का हाल तक जानने कोई राजनेता या प्रशासक सामने नहीं आए। उपेक्षा का दंश झेल रही स्वतंत्रता सेनानी की बेवा को अपने पति के अदम्य साहस और पराक्रम पर हमेशा गर्व रहा लेकिन नजरंदाजी कहें या शासन की भूल आज अपने ही जन्मस्थली में वीर योद्धा का एक आदमकद प्रतिमा तक कहीं नहीं लगा।

बताया जाता है कि विश्व योद्धा स्वर्गीय इंद्रदेव सिंह के सेना छोड़ने से पहले उन्हें वर्ष 1944 में वर्मा अब म्यांमार में स्टार वार मेडल मिला। उन्होंने वियतनाम समेत लगभग आठ देशों में अपने युद्ध कौशल का पराक्रम दिखाया। 14 जनवरी 2004 को वे संसार से विदा हो गए । वर्ष 1995 में 8 मई को संयुक्त राष्ट्र संघ के 50 में स्वर्ण जयंती समारोह के अवसर पर इन्हें वैश्विक स्वतन्त्रता सेनानी एवं विश्व शांति दूत का उपमा देकर सम्मानित किया गया था ।

इंद्रदेव सिंह को विश्व योद्धा और उनकी पत्नी को वीर नारी का सम्मान मिला l लेकिन स्थानीय स्तर पर सरकार और प्रशासन के तरफ से कोई सम्मान नहीं मिला। इस संबंध में अपना दर्द बयां करते हुए इनके पुत्र डॉ द्वारिका शर्मा बताते हैं कि उन्हें इस बात का मलाल जरूर है कि उनके बाबूजी और वृद्ध मां को कोई नागरिक सम्मान नहीं मिला और न ही राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंतिम विदाई हुई। लेकिन अपने माता पिता के अच्छे परवरिश मिलने और एक राष्ट्रवादी सैनिक के पुत्र के रूप में मुझे जो पहचान मिली उससे अपने माता पिता पर हमेशा गर्व रहा है। देखा जाए तो कभी वीरता और देशप्रेम को वीर रस के कवियों ने अपने कलमो से उनमें प्राण भरा था आज सब जगह बेबसी नजर आती है।

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AK
Author: AK

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