बोधगया स्थित मगध विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अनुसंधायिका मानसी सिंह द्वारा लिखित कविता “धधकता चित्त” इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। यह कविता नारी के भीतर सुलगते दर्द, अपमान और उसके भीतर पलते प्रतिशोध की तीव्र अग्नि को बखूबी दर्शाती है।
कविता में मानसी ने नारी के सहनशील स्वभाव के पीछे छिपी उसकी शक्ति और प्रतिकार की भावना को बड़ी ही मार्मिकता और तेवर के साथ प्रस्तुत किया है। शब्दों की चुभन, भावों की तीव्रता और संदेश की स्पष्टता यह साबित करती है कि यह सिर्फ एक रचना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—उन सभी के लिए जो नारी को कमज़ोर समझने की भूल करते हैं।
“जो सीता बनकर शांत बैठी थी,
काली रूप में आ सकती है”,
जैसी पंक्तियाँ कविता को महज साहित्यिक नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक विमर्श का माध्यम बना देती हैं।
धधकता चित्त
ये भूल मत करना; भूल कर भी,
कि तुम्हारी करतूत भुला दी जाएगी।
मीठी निंदिया समझ कर सुला दी जायेगी।
वक्त आने पर सब समझ जाओगे,
भूलने पर भी बता दी जायेगी?
सच समुद्र है इसे कब समझोगे,
यूं हीं कैसे झुठला दी जायेगी?
और जो रो-रो कर गुजारी हो रतिया कभी,
वो बतिया कैसे बिसरा दी जायेगी?
और जिसके सीने में अंगार भरा हो,
बदले की ज्वाला धधक रही हो,
आंसू लहू बन टपक रहे हों
वो कैसे यूं ही दफना दी जायेगी? जो दर्द के साथ जी सकती है खून की घूंट पी सकती है, वक्त आने पर तू बच लेगा बिन बदला वो जी सकती है...?
जो सीता बनकर शांत बैठी थी,
काली रूप में आ सकती है
प्रेम सुधा बरसाने वाली
रक्त रंजित पर आ सकती है। एक नारी जब रार ठान ले घुटनों के बल ला सकती है, सीता नहीं काली बनके
तेरी औकात दिखा सकती है…!!
यह कविता बताती है कि अब नारी सिर्फ सहनशीलता का प्रतीक नहीं, बल्कि न्याय और स्वाभिमान की पुकार है। जब-जब उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई जाएगी, वह सीता से काली बनने में देर नहीं करेगी।
मानसी सिंह की यह रचना विश्वविद्यालय परिसरों से लेकर सोशल मीडिया तक अपनी गूंज छोड़ रही है। यह कविता आधुनिक नारी की चेतना, आत्मबल और अस्मिता का उद्घोष बन चुकी है।
Author: Barun Kumar
I am Journalist covering News around Jehanabad and Bihar
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