हिमाचल प्रदेश में बारिश, भूस्खलन और बादल फटने से भारी नुकसान, 82 लोगों की मौत, सैकड़ों सड़कें बंद, सेना कर रही राहत कार्य।
Himachal Rains: Landslides, Floods Cripple Normal Life
हिमाचल में कहर बनकर बरसी बारिश: भूस्खलन, बाढ़ और बादल फटने से जनजीवन ठप
हर साल मानसून के साथ प्रकृति की विनाशलीला हिमालयी क्षेत्रों में देखने को मिलती है, लेकिन इस बार हिमाचल प्रदेश में स्थिति अत्यंत भयावह हो गई है।
लगातार बारिश, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने प्रदेश के कई जिलों में जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है।
राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अब तक राज्य में 600 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो चुका है और मरने वालों की संख्या 82 तक पहुंच गई है।
प्रदेश के कई जिले संपर्क से कट चुके हैं, और हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि भारतीय सेना को राहत और बचाव कार्यों में उतरना पड़ा है।
प्राकृतिक आपदा की चपेट में हिमाचल प्रदेश
बादल फटने और भूस्खलन से मची तबाही
20 जून से 6 जुलाई के बीच 19 बार बादल फटने, 23 बार बाढ़ और 19 बार लैंडस्लाइड की घटनाएं हो चुकी हैं।
ये घटनाएं मुख्यतः मंडी, कांगड़ा, सिरमौर, कुल्लू और चंबा जिलों में दर्ज की गई हैं, जहां लोगों के घर बह गए, पुल टूट गए और सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं।
गांवों में नहीं पहुंच रही राहत सामग्री
दूरदराज के पहाड़ी गांवों में खाद्य सामग्री और दवाइयों की भारी कमी है। कई गांवों का सड़क संपर्क टूट चुका है।
राज्य सरकार द्वारा बनाए गए पांच राहत शिविरों में करीब 357 आपदा पीड़ित लोग रह रहे हैं, जिनके लिए भोजन और पीने के पानी की व्यवस्था की जा रही है।
नुकसान के आंकड़े डरावने
- 82 लोगों की मौत
- 269 सड़कें बंद
- 154 मकान क्षतिग्रस्त, 106 पशु शालाएं ध्वस्त
- 14 पुलों को नुकसान, 31 गाड़ियां क्षतिग्रस्त
- 164 मवेशियों की मौत
- 600 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान
इन आंकड़ों से साफ है कि यह आपदा केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी बन चुकी है।
सेना और प्रशासन की सक्रिय भूमिका
मंडी में सेना ने संभाला मोर्चा
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यहां सेना ने मोर्चा संभालते हुए फंसे हुए लोगों को निकालने, खाद्य सामग्री पहुंचाने और राहत शिविरों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई है।
सेना के जवानों की त्वरित प्रतिक्रिया से कई लोगों की जान बचाई जा सकी है।
मुख्यमंत्री की सतर्कता
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू लगातार हालात की निगरानी कर रहे हैं और प्रशासन को तेजी से राहत कार्य चलाने के निर्देश दिए हैं।
प्रदेश सरकार ने केंद्र से भी विशेष सहायता पैकेज की मांग की है।
मौसम विभाग की चेतावनी
रेड और ऑरेंज अलर्ट जारी
भारतीय मौसम विभाग ने हिमाचल के मंडी, कांगड़ा, सिरमौर और कुल्लू जिलों में रेड और ऑरेंज अलर्ट जारी किया है।
इसका मतलब है कि अगले दो-तीन दिनों तक यहां और अधिक भारी बारिश, बादल फटना और भूस्खलन की संभावना है।
अन्य राज्यों में भी संकट के संकेत
- उत्तराखंड: देहरादून, टिहरी, नैनीताल, बागेश्वर में यलो अलर्ट
- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़: तेज बारिश और बिजली गिरने की चेतावनी
- राजस्थान और दिल्ली: हल्की बारिश से गर्मी से राहत, लेकिन जलभराव और ट्रैफिक की समस्या
चारधाम यात्रा भी प्रभावित
उत्तराखंड में लगातार बारिश के चलते चारधाम यात्रा भी प्रभावित हुई है।
रुद्रप्रयाग, गौरीकुंड और यमुनोत्री के रास्तों पर भूस्खलन और सड़क टूटने की घटनाएं सामने आई हैं।
प्रशासन ने तीर्थयात्रियों से सावधानी बरतने और यात्रा से पहले मौसम की जानकारी लेने की सलाह दी है।
जलवायु परिवर्तन है बड़ी वजह?
वैज्ञानिकों की चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, बिना प्लानिंग के निर्माण, और वनों की कटाई इस तरह की आपदाओं की मुख्य वजहें बन रही हैं।
हिमालयी क्षेत्र में लगातार मानव हस्तक्षेप ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है, जिसका परिणाम अब भयावह रूप में सामने आ रहा है।
समाधान क्या हो?
- पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण पर कड़ी निगरानी
- अर्ली वार्निंग सिस्टम की मजबूती
- स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण
- जवाबदेह पुनर्वास नीति
- पर्यावरण के प्रति सजगता और जागरूकता अभियान
स्थानीय लोगों की पीड़ा
“रात भर जागते हैं, डर लगता है…”
मंडी जिले के एक गांव के निवासी रमेश ठाकुर कहते हैं,
“हर रात हमें डर सताता है कि कहीं पहाड़ टूटकर हमारे घर पर न गिर जाए। घर की छत से पानी टपक रहा है, बच्चों को लेकर बहुत डर लगता है।”
“सेना न आती तो शायद हम जिंदा न होते”
एक अन्य प्रभावित महिला, गीता देवी बताती हैं,
“सेना के जवान अगर समय पर नहीं आते तो हम भूख से मर जाते। हमारा गांव तीन दिन से बाहर की दुनिया से कट चुका था।”
निष्कर्ष: हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन समय की मांग
हिमाचल प्रदेश की ये आपदा एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति हमारी तैयारी और नीति पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
इस आपदा से यह स्पष्ट हो गया है कि केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति और सतत विकास की जरूरत है।
अब समय आ गया है कि सरकार, समाज और हर नागरिक मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाएं।
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Author: AK
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