सोम, अप्रैल 13, 2026

बैसाखी के दिन 105 साल पहले हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड आज भी इतिहास के काले पन्नों में कैद है

Baisakhi and The Jallianwala Bagh Massacre, April 13, 1919
Baisakhi and The Jallianwala Bagh Massacre, April 13, 1919
Baisakhi and The Jallianwala Bagh Massacre, April 13, 1919

आज पूरे देश भर में बैसाखी का पर्व धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। हर साल 13 अप्रैल को गेहूं की फसल कटने की खुशी में यह पर्व पंजाब में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन पूरे पंजाब में खुशी का माहौल रहता है और सिख समुदाय इस पर्व को नाच गाकर (भंगडा कर) मनाता है। ‌दरअसल 13 अप्रैल साल 1699 को आज ही के दिन सिखों के 10वें गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की नींव रखी थी। इसके बाद से ही उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्से में इस दिन को बैसाखी के त्योहार के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

लेकिन वर्ष 1919 में इस दिन ऐसी दर्दनाक घटना घटी थी जो आज भी इतिहास के काले पन्नों में कैद है। वर्ष 1919 में भारत और खासकर पंजाब में आजादी की आवाज तेज होती देख अंग्रेजों ने जलियांवाला कांड को अंजाम दिया था। इस नरसंहार से एक माह पूर्व 8 मार्च को ब्रिटिश हकूमत ने भारत में रोलेट एक्ट पारित किया था। रोलेट एक्ट के तहत ब्रिटिश सरकार भारतीयों की आवाज दबाने की कोशिश में थी।जलियांवाला बाग हत्याकांड आज भी देशवासियों के दिलों को झकझोर देता है। वो 13 अप्रैल का ही दिन था यह दुखद घटना घटी थी। साल 1919 में आज ही के दिन पंजाब के अमृतसर जिले में स्वर्ण मंदिर के नजदीक जलियांवाला बाग में हजारों लोग एक शांतिपूर्ण सभा के लिए इकट्ठा हुए थे। इसकी सूचना मिलते ही अंग्रेजी हुकूमत ने बाग में जाने और वहां से निकलने वाले एकमात्र रास्ते को बंदकर लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी।

बता दें कि जलियांवाला बाग में हुए इस हत्याकांड के दौरान हजारों लोग तो गोलियों से मार गए। बता दें कि रोलेट एक्ट के तहत ब्रिटिश सरकार किसी भी भारतीय को कभी भी पकड़कर बिना केस किए जेल में डाल सकती थी। इस फैसले के खिलाफ 9 अप्रैल को पंजाब के बड़े नेताओं डॉ. सत्यपाल और किचलू ने धरना प्रदर्शन किया, जिन्हें प्रशासन ने गिरफ्तार कर कालापानी की सजा सुना दी। 10 अप्रैल को नेताओं की गिरफ्तारी का पंजाब में बड़े स्तर पर विरोध हुआ, प्रदर्शन को खत्म कराने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मार्शल लॉ लगा दिया। इस कानून के जरिए लोगों को इक्ट्ठा होने से रोका गया था।पंजाब में मार्शल लॉ लग चुका था, लेकिन 13 अप्रैल को हर साल जलियांवाला बाग में बैसाखी के दिन मेला लगता और हजारों लोग यहां जमा होते थे। इस दिन भी ऐसा ही हुआ था, हजारों लोग बच्चों के साथ मेला देखने पहुंचे थे। इस बीच, कुछ नेताओं ने रोलेट एक्ट और दूसरे नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध जताने के लिए वहां एक सभा का भी आयोजन किया था। नेता जब गिरफ्तारी के विरोध में भाषण दे रहे थे, तभी अचानक से तंग गलियों से जनरल रेजीनॉल्ड डायर अपने सशस्त्र सैनिकों के साथ बाग में घुस गए और एकमात्र निकासी द्वार को बंद कर दिया।

Baisakhi and The Jallianwala Bagh Massacre, April 13, 1919
Baisakhi and The Jallianwala Bagh Massacre, April 13, 1919

डायर ने घुसते ही सैनिकों को लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। हजारों लोगों का कत्लेआम शुरू हो गया और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। अंग्रेजी सैनिकों ने चाहे कोई बड़ा हो या बच्चा किसी को नहीं छोड़ा। लगातार 15 मिनट तक ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई गईं और 1600 से ज्यााद राउंड फायर किए गए। इस गोलीबारी से बचने के लिए लोगों ने वहां मौजूद एक कुएं में छलांग लगानी शुरू कर दी। कुआं इतना गहरा था कि कोई बच न सका, देखते ही देखते कुएं में भी लाशों का ढेर लग गया। जलियांवाला बाग हत्याकांड में सैकड़ों लोगों की जान गई थी, लेकिन इसका असल आंकड़ा आज तक नहीं पता लग सका। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के अनुसार इस नरसंहार में कुएं में गिरकर 120 लोग और गोलीबारी से 484 की जान गई। वहीं, उस जमाने के बड़े नेता मदन मोहन मालवीय का कहना था कि इस कांड में 1300 से ज्यादा लोग मारे गए थे। ब्रिटिश सरकार के इस भयानक कारनामे के जख्म आज भी वहां की दीवारों पर मौजूद है। ब्रिटिश सैनिकों द्वारा जब गोलीबारी की गई थी, तो कई सारी गोलियां दीवारों में जा घुसी थी। इस गोलियों के निशान आज भी संरक्षित किए गए हैं। वहां बने स्मारक में शहीदों को समर्पित 3 गौलरियां भी बनाई गई हैं, जिसमें उनकी प्रतिमाएं लगी है।

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Author: AK

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