कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ संबंधी बयान पर चुनाव आयोग ने सख्त तेवर अपनाए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने साफ कहा है कि राहुल गांधी अपने आरोपों को साबित करने के लिए सात दिनों के भीतर शपथपत्र प्रस्तुत करें, अन्यथा उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी। आयोग ने चेतावनी दी है कि अगर निर्धारित समय सीमा में यह कदम नहीं उठाया गया, तो राहुल गांधी के बयान को बेबुनियाद और निराधार मानते हुए इसे पूरी तरह खारिज कर दिया जाएगा। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है बल्कि आने वाले चुनावी माहौल में आयोग और विपक्ष के बीच टकराव को भी और गहरा कर दिया है। राहुल गांधी ने महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची में कथित धांधली का आरोप लगाया था, जिसमें उन्होंने 1,14,000 वोटों से हार का कारण सूची में गड़बड़ी को बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सूची में डुप्लिकेट वोट, अवैध पते, और अन्य विसंगतियां पाई गईं। इस पर चुनाव आयोग ने गांधी से शपथपत्र की मांग की, लेकिन गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले ही संसद में संविधान की शपथ ली है और आरोपों को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर चुनाव आयोग की सख्ती के बाद पार्टी नेताओं ने आयोग पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि राहुल गांधी ने जनता की आवाज उठाई है और अगर चुनाव आयोग को सच्चाई सुनना नागवार गुजर रहा है, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग विपक्ष की आवाज दबाने का औजार बन गया है। वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि राहुल गांधी ने जो कहा है, वह देशभर में आम जनता की राय है। “वोट चोरी” की शिकायतें लगातार आ रही हैं और इस पर चुनाव आयोग को सफाई देनी चाहिए, न कि धमकियां देनी चाहिए। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने भी चुनाव आयोग से सवाल किया क्या आयोग की जिम्मेदारी सत्ताधारी दल को बचाने की है या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना?” उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को चुप कराने का कोई भी प्रयास जनता के बीच और बड़ा मुद्दा बन जाएगा। कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने भी आयोग की मांग को अनुचित बताया और कहा कि यह आयोग की जिम्मेदारी है कि वह इन आरोपों की जांच करे। वहीं, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आयोग की शपथपत्र की मांग को ‘पूरी तरह से बेतुका’ करार दिया और कहा कि यह आयोग की छवि बचाने का प्रयास है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या आयोग ने पहले कभी ऐसे मामलों में शपथपत्र की मांग की है। इस विवाद के बीच, विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि आयोग सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में काम कर रहा है। पार्टी नेताओं ने साफ किया कि कांग्रेस किसी भी हालत में पीछे हटने वाली नहीं है और राहुल गांधी के साथ मजबूती से खड़ी रहेगी। वहीं, भाजपा ने विपक्षी दलों के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि ये आरोप हार की निराशा का परिणाम हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया है और आयोग को आदेश दिया है कि वह 19 अगस्त तक 65 लाख मतदाताओं के नामों की सूची और उनके हटाने के कारण सार्वजनिक करे। यह आदेश विपक्षी दलों के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है। अब देखना यह है कि चुनाव आयोग और राहुल गांधी के बीच यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
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Author: AK
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