जहानाबाद: मगध विश्वविद्यालय की अनुसंधायिका और शब्दाक्षर प्रदेश साहित्य मंत्री कुमारी मानसी ने अपनी कविता “वीरांगना की व्यथा” के माध्यम से एक सैनिक की पत्नी के दर्द और बलिदान को शब्दों में ढाला है। यह कविता न सिर्फ शहीद सैनिकों के प्रति श्रद्धा है, बल्कि उन वीरांगनाओं के जज़्बातों को भी स्वर देती है, जो पति के बलिदान के बाद अकेली रह जाती हैं — नन्हें बच्चों की परवरिश, अधूरे सपनों और सूने जीवन के साथ।
कविता की शुरुआती पंक्तियाँ —
“कितने सपने चूर हुए, और सिंदूर बिंदी गुल हुए…”
— उस गहरे दुख को दर्शाती हैं जिसमें एक पत्नी अपने जीवन के सबसे बड़े सहारे को खो देती है, और साथ ही खो देती है अपने भविष्य के सपनों की रंगीन तस्वीर।
कुमारी मानसी ने लिखा —
“अपने देश की खातिर तुमने अपना फर्ज निभाया है, अपनों से भी बढ़कर तुमने राष्ट्र धर्म दिखलाया है…”
— यह पंक्ति शौर्य और कर्तव्य की सबसे ऊँची मिसाल को दर्शाती है, जहाँ राष्ट्र सेवा हर रिश्ते से ऊपर होती है।
परंतु यह वीरता के पीछे छुपे दुःख की भी कहानी है। कविता के अंतिम छंदों में बच्चों के भविष्य को लेकर जो चिंताएं उठाई गई हैं —
“मां का प्यार मिलेगा बेशक, क्या पिता का प्यार भी पायेगा…?”
— वह हमारे समाज और व्यवस्था से यह सवाल करती है कि क्या हम इन वीर परिवारों को सिर्फ सलामी दे कर भूल जाते हैं, या उनके पुनर्निर्माण में भी साथ खड़े होते हैं?
कुमारी मानसी की यह कविता केवल साहित्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है — जो हमें यह याद दिलाती है कि देश की सीमाओं पर तैनात एक सैनिक के साथ-साथ उसके पीछे खड़ी एक स्त्री भी वीर होती है, जो अपने आंसुओं में भी राष्ट्रगान गुनगुनाती है।
The agony of a brave wife: Hopes and incomplete lives burning on the pyre of valor: Kumari Mansi
Author: AK
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